परिभाषा
रस का शाब्दिक अर्थ है ‘आनंद’। काव्य को पढ़ने, सुनने या नाटक को देखने से पाठक या श्रोता को जिस आनंद की अनुभूति होती है, उसे रस कहते हैं। रस को काव्य की आत्मा माना गया है।
रस के अंग
रस के चार प्रमुख अंग होते हैं:
स्थायी भाव (Sthayi Bhava)
वे मूल भाव जो मनुष्य के हृदय में स्थायी रूप से विद्यमान रहते हैं और अनुकूल परिस्थितियों में जागृत हो जाते हैं। प्रत्येक रस का एक स्थायी भाव होता है।
- रति (प्रेम) – शृंगार रस
- हास (हँसी) – हास्य रस
- शोक (दुःख) – करुण रस
- क्रोध – रौद्र रस
- उत्साह – वीर रस
- भय – भयानक रस
- जुगुप्सा (घृणा) – बीभत्स रस
- विस्मय (आश्चर्य) – अद्भुत रस
- निर्वेद (वैराग्य) – शांत रस
- वत्सल (संतान प्रेम) – वात्सल्य रस
- देव विषयक रति (ईश्वर प्रेम) – भक्ति रस
विभाव (Vibhava)
वे कारण, वस्तुएँ या परिस्थितियाँ जिनके कारण स्थायी भाव जागृत होते हैं।
- आलंबन विभाव: जिसके प्रति स्थायी भाव जागृत हो (जैसे नायक-नायिका)।
- उद्दीपन विभाव: वे परिस्थितियाँ जो स्थायी भाव को और अधिक उद्दीप्त (तेज) करें (जैसे चाँदनी रात, सुंदर वातावरण)।
अनुभाव (Anubhava)
स्थायी भाव के जागृत होने पर आश्रय (जिसके हृदय में भाव जागृत हुआ) की शारीरिक चेष्टाएँ या क्रियाएँ।
- जैसे: मुस्कुराना, रोना, काँपना, पसीना आना, आँखों से आँसू गिरना।
संचारी भाव / व्यभिचारी भाव (Sanchari Bhava / Vyabhichari Bhava)
वे भाव जो स्थायी भाव के साथ-साथ आते-जाते रहते हैं, पानी के बुलबुलों की तरह उठते और विलीन होते रहते हैं। ये स्थायी भाव को पुष्ट करते हैं। इनकी संख्या 33 मानी गई है।
- जैसे: चिंता, हर्ष, लज्जा, गर्व, मोह, मरण, ग्लानि, शंका, आदि।
रस के प्रकार
भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में 8 रस माने हैं, किंतु बाद में शांत रस को भी मान्यता मिली, जिससे इनकी संख्या 9 हो गई (नवरस)। आधुनिक आचार्यों ने वात्सल्य और भक्ति रस को भी शामिल किया है।
शृंगार रस का परिचय
काव्य शास्त्र में शृंगार रस को रसों का राजा अर्थात् रसराज कहा जाता है। जब नायक और नायिका के मन में एक-दूसरे के प्रति प्रेम या अनुराग उत्पन्न होता है, तब वहां शृंगार रस की निष्पत्ति होती है। इसे आदि रस भी माना जाता है क्योंकि सृष्टि की उत्पत्ति और सौंदर्य का आधार यही रस है।
शृंगार रस के मुख्य अंग
किसी भी रस की पूर्णता के लिए उसके चार अंगों का होना अनिवार्य है। शृंगार रस के संदर्भ में ये अंग निम्नलिखित हैं:
1. स्थायी भाव
शृंगार रस का स्थायी भाव रति है। रति का अर्थ है प्रेम या अनुराग जो स्त्री और पुरुष के मध्य स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहता है।
2. विभाव
विभाव वे कारण होते हैं जो हृदय में सुप्त स्थायी भाव को जाग्रत करते हैं। इसके दो उप-भेद हैं:
- आलंबन विभाव: जिसके प्रति प्रेम उत्पन्न हो, जैसे नायक और नायिका।
- उद्दीपन विभाव: जो प्रेम की भावना को तीव्र करे, जैसे चांदनी रात, एकांत स्थल, पुष्पों की सुगंध, कोयल का कूकना या शीतल पवन।
3. अनुभाव
आलंबन और उद्दीपन के कारण उत्पन्न मानसिक स्थिति की शारीरिक चेष्टाओं को अनुभाव कहते हैं। जैसे:
- मुस्कराना और तिरछी चितवन से देखना।
- लज्जा से पलकें झुका लेना।
- शरीर में रोमांच उत्पन्न होना।
- मधुर वार्तालाप या स्पर्श।
4. संचारी भाव
ये भाव मन में बिजली की तरह आते-जाते रहते हैं। शृंगार रस में मुख्य रूप से हर्ष, लज्जा, मोह, स्मृति, चपलता और उत्सुकता जैसे भाव पाए जाते हैं।
शृंगार रस के भेद
शृंगार रस को मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया गया है:
संयोग शृंगार
जब नायक और नायिका के परस्पर मिलन, स्पर्श, दर्शन या वार्तालाप का वर्णन होता है, तो उसे संयोग शृंगार कहते हैं। इसमें सुखद अनुभूतियों की प्रधानता होती है।
संयोग शृंगार का उदाहरण:
“बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय।
सौंह करै भौहनु हंसे, दैन कहै नटि जाय।”
वियोग (विप्रलंभ) शृंगार
जब नायक और नायिका एक-दूसरे से दूर होते हैं और उनके मन में बिछड़ने की पीड़ा होती है, तो वहां वियोग शृंगार होता है। इसमें प्रेम बना रहता है परंतु मिलन का अभाव होता है।
वियोग शृंगार का उदाहरण:
“निसिदिन बरसत नैन हमारे।
सदा रहति पावस ऋतु हम पर, जब ते स्याम सिधारे।”
महत्वपूर्ण तथ्य
- आचार्य भोजराज ने अपनी पुस्तक ‘सरस्वती कंठाभरण’ में शृंगार को ही एकमात्र रस माना है।
- शृंगार रस का वर्ण श्याम माना जाता है।
- इसके अधिष्ठाता देवता भगवान विष्णु माने जाते हैं।
- भक्ति काल में सूरदास और बिहारी ने इस रस का अत्यधिक सुंदर चित्रण किया है।
- रीति काल को हिंदी साहित्य में शृंगार काल के नाम से भी जाना जाता है।
हास्य रस का स्वरूप
साहित्य शास्त्र में हास्य रस को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। जब किसी व्यक्ति की विकृत वेशभूषा, अनोखी चेष्टा, आकार या वाणी को देखकर हृदय में जो विनोद का भाव उत्पन्न होता है, उसे ही हास्य रस कहा जाता है। यह रस आनंद और मनोरंजन का प्रधान स्रोत है।
हास्य रस का स्थायी भाव हास है। आचार्य भरत मुनि के अनुसार, हास्य रस की उत्पत्ति शृंगार रस की विकृति से मानी गई है।
हास्य रस के प्रमुख अवयव
हास्य रस की निष्पत्ति के लिए निम्नलिखित अंगों का होना आवश्यक है:
- स्थायी भाव: हास
- आलंबन: विकृत वेशभूषा, मूर्खतापूर्ण कार्य, बेढंगा आकार या विचित्र बातें करने वाला व्यक्ति।
- उद्दीपन: आलंबन की अनोखी चेष्टाएँ, हँसाने वाली बातें, अटपटी हरकतें और विचित्र अंग संचालन।
- अनुभाव: चेहरे का खिलना, मुस्कुराहट, आँखों का मिचमिचाना, पेट का फूलना और अट्टहास करना।
- संचारी भाव: हर्ष, चपलता, उत्सुकता, निद्रा और लज्जा।
हास्य रस के भेद
भरत मुनि ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ नाट्यशास्त्र में हास्य रस के मुख्य रूप से छह भेद बताए हैं, जिन्हें तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:
1. उत्तम श्रेणी का हास
- स्मित: इसमें केवल होठों पर हल्की मुस्कान आती है और दाँत नहीं दिखाई देते।
- हसित: इसमें मुख थोड़ा अधिक खिलता है और दाँत थोड़े दिखाई देने लगते हैं।
2. मध्यम श्रेणी का हास
- विहसित: इसमें चेहरे के साथ-साथ मधुर ध्वनि भी उत्पन्न होती है।
- उपहसित: इसमें हँसते समय कंधे और सिर हिलने लगते हैं।
3. अधम श्रेणी का हास
- अपहसित: इसमें हँसते-हँसते आँखों से पानी आ जाता है और शरीर बेकाबू होने लगता है।
- अतिहसित: इसमें ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ करते हुए ठहाके लगाए जाते हैं।
आत्मस्थ और परस्थ हास्य
उत्पत्ति के आधार पर हास्य को दो अन्य भागों में भी बाँटा गया है:
आत्मस्थ हास्य
जब व्यक्ति किसी मनोरंजक वस्तु या स्थिति को देखकर स्वयं बिना किसी बाहरी प्रभाव के हँसता है, तो उसे आत्मस्थ हास्य कहते हैं।
परस्थ हास्य
जब दूसरों को हँसता हुआ देखकर कोई व्यक्ति हँसने लगता है, तो उसे परस्थ हास्य कहा जाता है।
उदाहरण एवं विश्लेषण
उदाहरण 1:
“विन्ध्य के वासी उदासी तपोव्रतधारी महा बिनु नारि दुखारे।
गौतम तीय तरी तुलसी सो कथा सुनि भे मुनि वृन्द सुखारे॥”
इस पद में स्थायी भाव हास है। यहाँ विन्ध्याचल पर्वत पर रहने वाले मुनियों की उस स्थिति का वर्णन है जहाँ वे यह सोचकर खुश हो रहे हैं कि श्री राम के चरण स्पर्श से वहाँ के सभी पत्थर स्त्रियाँ बन जाएँगे। यहाँ मुनि आलंबन हैं और उनकी विचित्र सोच उद्दीपन है।
उदाहरण 2:
“तंबूरा ले मंच पर बैठे प्रेमप्रताप,
साज़ मिले पंद्रह मिनट घंटा भर आलाप।”
यहाँ गायक की स्थिति और उसकी लंबी तैयारी का मज़ाक उड़ाया गया है, जो श्रोताओं के मन में विनोद का भाव जगाता है।
महत्वपूर्ण तथ्य
- हास्य रस को सुखात्मक रस भी कहा जाता है क्योंकि यह मानसिक तनाव को दूर करता है।
- रीतिकाल के कवि बिहारी और मतिराम ने भी अपने काव्यों में हास्य का सुंदर प्रयोग किया है।
- आधुनिक हिंदी साहित्य में काका हाथरसी और हुल्लड़ मुरादाबादी हास्य रस के प्रमुख कवि माने जाते हैं।
करुण रस का परिचय
साहित्य शास्त्र में करुण रस का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। जब किसी प्रिय व्यक्ति के स्थायी विनाश, वियोग, द्रव्य नाश या किसी अनिष्ट की प्राप्ति से हृदय में जो दुख उत्पन्न होता है, उसे शोक कहते हैं। यही शोक नामक स्थायी भाव जब विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से पुष्ट होकर रस रूप में परिणत होता है, तो उसे करुण रस कहा जाता है।
आचार्य भरत मुनि ने अपने ग्रंथ नाट्यशास्त्र में करुण रस की उत्पत्ति रौद्र रस के कर्म के परिणाम के रूप में मानी है। यह रस पाठक या दर्शक के हृदय में करुणा और दया का संचार करता है।
करुण रस के अवयव
किसी भी रस की निष्पत्ति के लिए उसके अंगों का होना अनिवार्य है। करुण रस के मुख्य अंग निम्नलिखित हैं:
1. स्थायी भाव
- करुण रस का स्थायी भाव शोक है।
2. विभाव
विभाव के दो भेद होते हैं जो रस को उद्दीप्त करने का कार्य करते हैं:
आलंबन विभाव
- विनष्ट व्यक्ति या वस्तु (मृत प्रियजन)।
- दयनीय पात्र या पीड़ित व्यक्ति।
उद्दीपन विभाव
- आलंबन के गुणों का स्मरण।
- मृत व्यक्ति के चित्र, उसके द्वारा उपयोग की गई वस्तुएं।
- दाह-संस्कार, तीर्थस्थल या इष्ट की दीन अवस्था।
3. अनुभाव
शोक भाव के जाग्रत होने पर शरीर में होने वाली चेष्टाएं:
- रुदन (रोना), विलाप करना, चीखना।
- भूमि पर गिरना, निश्वास छोड़ना, मूर्च्छा आना।
- छाती पीटना, दैव को कोसना, शरीर का पीला पड़ना।
4. संचारी भाव
हृदय में अल्प समय के लिए आने-जाने वाले भाव:
- निर्वेद, ग्लानि, स्मृति, विषाद।
- दैन्य, जड़ता, उन्माद, मोह, व्याधि।
करुण रस और विप्रलंभ श्रृंगार में अंतर
इन दोनों रसों में दुख की अनुभूति होती है, परंतु इनमें सूक्ष्म अंतर है:
मुख्य अंतर बिंदु:
- विप्रलंभ श्रृंगार में नायक-नायिका के पुनः मिलन की आशा बनी रहती है।
- करुण रस में प्रिय वस्तु या व्यक्ति के वापस मिलने की आशा पूरी तरह समाप्त हो जाती है।
- विप्रलंभ का आधार रति है, जबकि करुण का आधार शोक है।
करुण रस के प्रसिद्ध उदाहरण
उदाहरण 1: अभिमन्यु वध के पश्चात
“अन्याय सहकर बैठ रहना यह महा दुष्कर्म है,
न्यायार्थ अपने बंधु को भी दंड देना धर्म है।”
यहाँ अभिमन्यु की मृत्यु पर पांडवों और उत्तरा का विलाप करुण रस की सृष्टि करता है।
उदाहरण 2: सुदामा की दीन दशा
“देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करिके करुनानिधि रोये।
पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सों पग धोये।”
कवि नरोत्तमदास द्वारा रचित इन पंक्तियों में श्रीकृष्ण की करुणा और सुदामा की निर्धनता का चित्रण है।
उदाहरण 3: श्रवण कुमार की मृत्यु
“मनि खोये भुजंग सी जननी, फन सा पटक रही थी शीश,
अंधी आज बनाकर मुझको, किया न्याय तुमने जगदीश?”
यहाँ श्रवण कुमार की मृत्यु पर उनकी माता का विलाप प्रदर्शित है। इसमें स्थायी भाव शोक स्पष्ट झलक रहा है।
साहित्यिक महत्व
संस्कृत कवि भवभूति ने करुण रस को एको रसः करुण एव कहकर इसे सभी रसों में प्रधान माना है। उनके अनुसार अन्य सभी रस करुण रस के ही विभिन्न रूप हैं। यह रस मानव संवेदनाओं को झकझोरने और आध्यात्मिक शुद्धि का माध्यम बनता है।
रौद्र रस की परिभाषा
जब किसी व्यक्ति के द्वारा अपने गुरु, धर्म, देश या स्वयं का अपमान होने पर मन में जो क्षोभ या आवेश उत्पन्न होता है, उसे रौद्र रस कहते हैं। काव्य में जहाँ किसी के द्वारा किए गए अन्याय, अत्याचार या अपमान के प्रतिशोध की भावना जागृत होती है, वहाँ रौद्र रस की निष्पत्ति होती है।
भरत मुनि ने अपने ग्रंथ नाट्यशास्त्र में रौद्र रस को प्रधान रसों में स्थान दिया है। इसका प्रभाव विनाशकारी और उग्र होता है।
रौद्र रस के प्रमुख अवयव
स्थायी भाव
रौद्र रस का स्थायी भाव क्रोध है। यह मन की वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति प्रतिकूल परिस्थितियों या व्यक्तियों के प्रति आक्रामक हो जाता है।
विभाव
आलम्बन विभाव
- अपराधी व्यक्ति
- शत्रु या विपक्षी
- दुराचारी या अत्याचारी
- गुरु या धर्म की निंदा करने वाला व्यक्ति
उद्दीपन विभाव
- शत्रु द्वारा किए गए अपराध
- कटु और अपमानजनक वचन
- शत्रु की गर्वोक्तियाँ या अहंकारपूर्ण बातें
- किसी के मान-सम्मान को ठेस पहुँचाने वाली क्रियाएँ
अनुभाव और संचारी भाव
अनुभाव (शारीरिक चेष्टाएँ)
क्रोध की अवस्था में शरीर में होने वाले परिवर्तन अनुभाव कहलाते हैं:
- नेत्रों का लाल होना
- दाँत पीसना और होंठ चबाना
- मुख का तमतमाना
- शस्त्र उठाना या प्रहार करना
- भौंहें टेढ़ी करना और गर्जन-तर्जन करना
संचारी भाव
वे अल्पकालिक मानसिक अवस्थाएँ जो क्रोध को पुष्ट करती हैं:
- अमर्ष (असहनीयता)
- उग्रता
- गर्व और चपलता
- स्मृति और मोह
- आवेग
रौद्र रस के उदाहरण
लक्ष्मण-परशुराम संवाद
“सुनहु राम जेहि शिवधनु तोरा, सहसबाहू सम सो रिपु मोरा।
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा, न त मारे जैहहिं सब राजा।।”
यहाँ शिवधनुष टूटने पर परशुराम का क्रोध आलम्बन है और उनके कठोर वचन उद्दीपन का कार्य कर रहे हैं।
मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियाँ
“उस काल मारे क्रोध के तन काँपने उनका लगा,
मानो हवा के जोर से सोता हुआ सागर जगा।”
इन पंक्तियों में अर्जुन के क्रोध का वर्णन है, जहाँ अभिमन्यु की मृत्यु का समाचार आलम्बन है और अर्जुन का शरीर काँपना अनुभाव है।
महत्वपूर्ण तथ्य
- रौद्र रस का देवता रुद्र को माना जाता है।
- इसका वर्ण रक्त (लाल) माना गया है।
- यह रस मुख्य रूप से वीर रस से भिन्न है क्योंकि वीर रस में उत्साह होता है जबकि रौद्र रस में विनाशकारी क्रोध होता है।
- काव्य में ओज गुण की प्रधानता रौद्र रस को और अधिक प्रभावशाली बनाती है।
वीर रस की परिभाषा और स्वरूप
साहित्य शास्त्र के अनुसार, जब काव्य में उत्साह नामक स्थायी भाव का विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के साथ संयोग होता है, तब वह वीर रस की निष्पत्ति करता है। यह रस ओज गुण से परिपूर्ण होता है और पाठक या श्रोता के मन में साहस, शौर्य और उमंग का संचार करता है।
आचार्य भरतमुनि ने अपने ग्रंथ नाट्यशास्त्र में वीर रस को प्रमुख रसों में स्थान दिया है। यह रस मुख्य रूप से युद्ध, दान, दया और धर्म के कठिन कार्यों को करने के लिए प्रेरित करने वाले मानसिक उत्साह को प्रदर्शित करता है।
वीर रस के अवयव (अंग)
किसी भी रस की पूर्णता के लिए उसके अंगों का होना आवश्यक है। वीर रस के प्रमुख अंग निम्नलिखित हैं:
1. स्थायी भाव
वीर रस का स्थायी भाव उत्साह है। यह वह मानसिक अवस्था है जो मनुष्य को किसी कठिन कार्य को करने के लिए प्रेरित करती है।
2. विभाव
विभाव के दो भेद होते हैं जो उत्साह को जाग्रत करते हैं:
- आलंबन विभाव: शत्रु, अत्याचारी व्यक्ति, दुष्ट, या वह लक्ष्य जिसे प्राप्त करना है।
- उद्दीपन विभाव: शत्रु की ललकार, रणभेरी, युद्ध के नगाड़े, शत्रुओं का पराक्रम, यश की इच्छा, या पूर्वजों का गौरव।
3. अनुभाव
उत्साह जाग्रत होने पर शरीर में होने वाली चेष्टाएं अनुभाव कहलाती हैं:
- भुजाओं का फड़कना
- आंखों का लाल होना
- गर्वपूर्ण उक्ति या गर्जना करना
- रोमांच और उत्साहपूर्वक आगे बढ़ना
4. संचारी भाव
स्थायी भाव के साथ आने-जाने वाले भावों को संचारी भाव कहते हैं:
- आवेग, गर्व, हर्ष, मति, धृति, स्मृति और चपलता।
वीर रस के भेद
साहित्यिक विद्वानों ने उत्साह के आधार पर वीर रस के मुख्य रूप से चार भेद माने हैं:
1. युद्धवीर
जहाँ युद्ध के मैदान में वीरता का प्रदर्शन किया जाता है। उदाहरण के लिए, छत्रपति शिवाजी महाराज या महाराणा प्रताप के युद्ध प्रसंग।
2. दानवीर
जहाँ दान देने में अत्यधिक उत्साह और त्याग दिखाया जाता है। राजा बलि और कर्ण इसके सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं।
3. दयावीर
जहाँ किसी दुखी या पीड़ित की रक्षा के लिए प्राणों की बाजी लगा दी जाती है। जीमूतवाहन की कथा इसका उदाहरण है।
4. धर्मवीर
जहाँ धर्म की रक्षा और सत्य के पालन के लिए कठिन संघर्ष किया जाता है। राजा हरिश्चंद्र को धर्मवीर की श्रेणी में रखा जाता है।
वीर रस के प्रमुख उदाहरण
उदाहरण 1:
“बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।”
उदाहरण 2:
“वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो,
सामने पहाड़ हो, सिंह की दहाड़ हो।”
उदाहरण 3:
“चढ़ चेतक पर तलवार उठा, रखता था भूतल पानी को,
राणा प्रताप सिर काट-काट, करता था सफल जवानी को।”
वीर रस और ओज गुण
वीर रस की रचनाओं में प्रायः ओज गुण की प्रधानता होती है। इसमें संयुक्त अक्षरों (जैसे- क्र, त्र, प्र) और टवर्ग (ट, ठ, ड, ढ) के वर्णों का अधिक प्रयोग किया जाता है ताकि भाषा में कठोरता और प्रभाव पैदा हो सके। महाकवि भूषण वीर रस के सबसे प्रसिद्ध कवियों में से एक माने जाते हैं, जिन्होंने अपनी रचनाओं में छत्रसाल और शिवाजी के शौर्य का वर्णन किया है।
भयानक रस
साहित्य शास्त्र के अनुसार, जब किसी भयंकर वस्तु, व्यक्ति या दृश्य को देखने अथवा उससे संबंधित वर्णन सुनने से मन में व्याकुलता उत्पन्न होती है, तो उसे भयानक रस कहा जाता है। इस रस का आधार मन में व्याप्त डर की भावना होती है जो प्रतिकूल परिस्थितियों में जागृत होती है।
भयानक रस की परिभाषा
किसी विनाशकारी वस्तु या प्रबल शत्रु को देखने से जब हृदय में भय नामक स्थायी भाव विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के संयोग से रस रूप में परिणत होता है, तब भयानक रस की निष्पत्ति होती है। आचार्य भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में इसका वर्णन प्रमुख रसों के अंतर्गत किया है।
भयानक रस के प्रमुख अंग (अवयव)
1. स्थायी भाव
भयानक रस का स्थायी भाव भय है। यह मनुष्य के चित्त में सुप्त अवस्था में रहता है और डरावनी परिस्थितियों को देखकर सक्रिय हो जाता है।
2. विभाव
आलम्बन विभाव:
- भयानक दृश्य या हिंसक जंतु (जैसे सिंह, सांप)।
- शक्तिशाली शत्रु या अत्याचारी व्यक्ति।
- शून्य स्थान या भयानक निर्जन वन।
- प्रलयंकारी प्राकृतिक आपदाएँ।
उद्दीपन विभाव:
- शत्रु की भीषण गर्जना या उसकी क्रूर चेष्टाएँ।
- भयानक आवाज़ें और सन्नाटा।
- रात का गहरा अंधेरा।
- अहायता की स्थिति।
3. अनुभाव
भय के कारण शरीर पर जो बाह्य प्रभाव दिखाई देते हैं, उन्हें अनुभाव कहते हैं:
- शरीर का कांपना (कम्पन)।
- पसीना आना (स्वेद)।
- चेहरे का रंग पीला पड़ जाना (विवर्णता)।
- मुँह सूखना और आवाज़ न निकलना।
- मूर्च्छा या बेहोशी आना।
- पलायन करना या भाग जाना।
4. संचारी भाव
भय की स्थिति में मन में उठने वाले अस्थिर भाव:
- दैन्य (बेचारगी)।
- शंका और चिंता।
- मोह और जड़ता।
- त्रास (घबराहट)।
- मरण की आशंका।
साहित्यिक उदाहरण
प्रसिद्ध काव्य पंक्ति
“एक ओर अजगरहि लखि, एक ओर मृगराय।
विकट बटोही बीच ही, परयो मूर्छा खाय।।”
उदाहरण का विश्लेषण:
- आश्रय: बटोही (रास्ते पर चलने वाला यात्री)।
- आलम्बन: एक ओर अजगर और दूसरी ओर मृगराय (सिंह)।
- उद्दीपन: अजगर और सिंह की डरावनी उपस्थिति।
- अनुभाव: मूर्च्छा खाकर गिर पड़ना।
- स्थायी भाव: भय।
अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
- भयानक रस का प्रयोग वीर रस के विपरीत स्थितियों में अधिक प्रभावी होता है।
- नाटक और सिनेमा में डरावने संगीत का प्रयोग उद्दीपन विभाव के रूप में किया जाता है।
- इस रस का वर्ण (रंग) कृष्ण (काला) माना गया है।
- इसके अधिष्ठाता देवता यमराज (काल) माने जाते हैं।
बीभत्स रस की परिभाषा और स्वरूप
साहित्य शास्त्र के अनुसार, जब किसी अत्यंत घृणित वस्तु, दुर्गंधयुक्त पदार्थ या अरुचिकर दृश्यों को देखकर अथवा उनके संबंध में सुनकर मन में जो जुगुप्सा या घृणा का भाव जाग्रत होता है, उसे बीभत्स रस कहा जाता है। यह रस मन में विरक्ति उत्पन्न करने वाला होता है और इसका मुख्य उद्देश्य दर्शक या पाठक के हृदय में ग्लानि का भाव पैदा करना है।
भरत मुनि ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ नाट्यशास्त्र में आठ रसों का वर्णन किया है, जिनमें बीभत्स रस को भी स्थान दिया गया है। विद्वानों के अनुसार, इस रस का देवता महाकाल को माना गया है और इसका रंग नील वर्ण बताया गया है।
बीभत्स रस के प्रमुख अंग
किसी भी रस की निष्पत्ति के लिए उसके अंगों का होना अनिवार्य है। बीभत्स रस के अवयव निम्नलिखित हैं:
1. स्थायी भाव
बीभत्स रस का स्थायी भाव जुगुप्सा (घृणा) है। यह भाव मनुष्य के चित्त में सुप्त अवस्था में विद्यमान रहता है और अनुकूल परिस्थितियाँ मिलने पर जाग्रत हो जाता है।
2. विभाव
विभाव के दो भेद होते हैं जो बीभत्स रस को उद्दीप्त करते हैं:
आलम्बन विभाव
- सड़ती हुई लाशें या मांस के लोथड़े।
- रक्त, मज्जा, चर्बी और हड्डियाँ।
- मल-मूत्र या दुर्गंधयुक्त अपशिष्ट पदार्थ।
- कीड़े-मकोड़ों से युक्त सड़ा हुआ भोजन।
उद्दीपन विभाव
- पशु-पक्षियों (जैसे गिद्ध, कौआ, कुत्ता) द्वारा शवों को नोचना।
- घावों से पीप या मवाद का निकलना।
- सड़न से उत्पन्न होने वाली तीव्र दुर्गंध।
- मक्खियों का भिनभिनाना।
3. अनुभाव
आश्रय की वे चेष्टाएं जो घृणा के कारण प्रकट होती हैं:
- मुँह बनाना या चेहरा बिगाड़ना।
- नाक-भौं सिकोड़ना।
- आँखें बंद कर लेना या थूकना।
- वमन (उल्टी) की इच्छा होना।
4. संचारी भाव
बीभत्स रस के साथ आने वाले अस्थिर मनोभाव:
- मोह, ग्लानि और चिंता।
- आवेग, व्याधि (बीमारी का अनुभव) और मरण।
- जड़ता और दीनता।
बीभत्स रस के प्रकार
साहित्यिक ग्रंथों में बीभत्स रस के मुख्य रूप से दो प्रकार बताए गए हैं:
क्षोभज बीभत्स
यह वह स्थिति है जहाँ रुधिर, मांस आदि के दर्शन से मन में विक्षोभ या घबराहट उत्पन्न होती है। युद्ध भूमि के दृश्य अक्सर इस श्रेणी में आते हैं।
शुद्ध बीभत्स
इसमें केवल घृणा का भाव प्रधान होता है, जैसे किसी गंदी नाली या सड़न को देखकर होने वाली अनुभूति।
बीभत्स रस का उदाहरण
“सिर पर बैठ्यो काग, आँखि दोउ खात खींचत।
जीभहिं सार खींचत, अतिहिं आनंद उर धारत।
गीध जाँघ को खोदि-खोदि कै मांस उपारत,
स्वान अंगुरिन काटि-काटि कै खात विदारत।”
उदाहरण का स्पष्टीकरण:
- स्थायी भाव: जुगुप्सा।
- आलम्बन: मृत शरीर (शव)।
- उद्दीपन: कौआ, गीध और कुत्तों द्वारा मांस नोचना।
- अनुभाव: पाठक द्वारा दृश्य की कल्पना कर घृणा करना।
अद्भुत रस का परिचय
साहित्य शास्त्र के अनुसार, जब किसी व्यक्ति के मन में आश्चर्यजनक या अलौकिक वस्तुओं को देखकर जो विस्मय का भाव उत्पन्न होता है, उसे अद्भुत रस कहा जाता है। यह रस तब जागृत होता है जब कोई ऐसी घटना या दृश्य सामने आता है जो तर्क से परे हो और कल्पना से बाहर हो। भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में आठ मूल रसों में अद्भुत रस को महत्वपूर्ण स्थान दिया है।
अद्भुत रस के प्रमुख अवयव
किसी भी रस की निष्पत्ति के लिए उसके अंगों का होना अनिवार्य है। अद्भुत रस के प्रमुख अवयव निम्नलिखित हैं:
1. स्थायी भाव
अद्भुत रस का स्थायी भाव विस्मय है। हृदय में स्थित यही भाव जब विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से पुष्ट होता है, तब रस का रूप धारण कर लेता है।
2. विभाव (आलम्बन और उद्दीपन)
- आलम्बन विभाव: कोई आश्चर्यजनक व्यक्ति, अलौकिक दृश्य, दिव्य शक्ति या विचित्र वस्तु जिसे देखकर आश्चर्य हो।
- उद्दीपन विभाव: उस विचित्र वस्तु का वर्णन, उसके गुणों की चर्चा, उसकी महिमा या उसकी असाधारण क्रियाएँ।
3. अनुभाव
आश्रय के शरीर में होने वाली बाहरी चेष्टाओं को अनुभाव कहते हैं। अद्भुत रस में प्रमुख अनुभाव ये हैं:
- दाँतों तले उँगली दबाना
- आँखें फाड़कर देखना या आँखों का फैल जाना
- गद्गद होना या शरीर में कंपन होना
- रोमांच (रोंगटे खड़े होना)
- स्तब्ध रह जाना या जड़ हो जाना
4. संचारी भाव
मन में उठने वाले अस्थायी भावों को संचारी भाव कहते हैं। इसमें मुख्य रूप से वितर्क, आवेग, भ्रांति, हर्ष, मोह और उत्सुकता जैसे भाव शामिल होते हैं।
अद्भुत रस के उदाहरण और व्याख्या
प्रसिद्ध काव्य उदाहरण
हिंदी साहित्य में भक्ति काल और रीति काल के कवियों ने इस रस का व्यापक प्रयोग किया है। नीचे कुछ विशिष्ट उदाहरण दिए गए हैं:
उदाहरण 1: भगवान कृष्ण का मुख दर्शन
“अखिल भुवन चर-अचर सब, हरि मुख में लखि मातु।
चकित भई गदगद वचन, विकसित दृग पुलकातु॥”
व्याख्या:
यहाँ जब माता यशोदा बालक कृष्ण के मुख में समस्त ब्रह्मांड को देखती हैं, तब उनके मन में विस्मय उत्पन्न होता है। इसमें कृष्ण का मुख आलम्बन है, चकित होना और आँखों का विकसित होना अनुभाव है।
उदाहरण 2: लंका दहन का दृश्य
“हाथी, हय, रथी, पादाति की कौन कहे,
कपि की पूँछ में न लगन पाई आग।
सिगरी लंका जरि गई, गए निसाचर भाग॥”
व्याख्या:
हनुमान जी की पूँछ में आग लगने से पहले ही पूरी लंका का जल जाना एक अलौकिक घटना है, जो अद्भुत रस की सृष्टि करती है।
अद्भुत रस की विशेषताएँ
- यह रस अतिशयोक्ति अलंकार के साथ मिलकर बहुत प्रभावशाली हो जाता है।
- इसका वर्ण पीला (पीत) माना गया है।
- इसके देवता गंधर्व माने जाते हैं।
- यह रस जीवन में जिज्ञासा और नवीनता का संचार करता है।
- अद्भुत रस का प्रयोग अक्सर वीरता के कार्यों या दिव्य चमत्कारों के वर्णन में अधिक होता है।
शांत रस का परिचय
काव्यशास्त्र में शांत रस को नौवें रस के रूप में स्वीकार किया गया है। यह रस संसार की अनित्यता, सांसारिक सुखों के प्रति विरक्ति और तत्व ज्ञान की प्राप्ति से उत्पन्न होता है। जब मनुष्य का चित्त समस्त सांसारिक वासनाओं से मुक्त होकर पूर्णतः शांत हो जाता है, तब इस रस की निष्पत्ति होती है।
शांत रस की परिभाषा
संसार और जीवन की नश्वरता का बोध होने पर मन में जो विराग उत्पन्न होता है, उसे ही शांत रस कहा जाता है। इसमें किसी प्रकार का क्रोध, भय या उत्साह नहीं होता, बल्कि केवल आत्मिक शांति और परमात्मा के प्रति समर्पण का भाव होता है।
शांत रस के प्रमुख अवयव
स्थायी भाव
शांत रस का स्थायी भाव निर्वेद (शम) है। निर्वेद का अर्थ है स्वयं को संसार से विलग कर लेना और मानसिक शांति प्राप्त करना।
विभाव
आलंबन विभाव
- संसार की असारता और नश्वरता।
- परमात्मा का वास्तविक स्वरूप।
- आध्यात्मिक उपदेश और दार्शनिक विचार।
उद्दीपन विभाव
- सत्संग और ऋषियों का सान्निध्य।
- पवित्र तीर्थस्थलों की यात्रा।
- एकांत स्थान या तपोवन का शांत वातावरण।
- धार्मिक ग्रंथों और शास्त्रों का अनुशीलन।
अनुभाव
शांत रस के अनुभव शरीर पर निम्नलिखित रूपों में प्रकट होते हैं:
- पूरे शरीर में रोमांच होना।
- आंखों से आनंद के अश्रु बहना।
- मुख पर प्रसन्नता और सौम्यता का भाव।
- ईश्वर की भक्ति में तल्लीनता।
संचारी भाव
इसमें निम्नलिखित अल्पकालिक भाव जाग्रत होते हैं:
- धृति (धैर्य)
- मति (बुद्धि)
- हर्ष और स्मृति
- विबोध (ज्ञान की प्राप्ति)
साहित्यिक महत्व और आचार्य
विद्वानों के मत
प्राचीन काल में भरत मुनि ने अपने ग्रंथ ‘नाट्यशास्त्र’ में केवल आठ रसों का उल्लेख किया था। उन्होंने शांत रस को नाट्य प्रयोग के योग्य नहीं माना था। किंतु बाद में उद्भट और अभिनवगुप्त जैसे आचार्यों ने शांत रस को न केवल स्वीकार किया, बल्कि इसे रसों में उत्तम स्थान प्रदान किया।
आचार्य मम्मट ने भी अपने ग्रंथ ‘काव्यप्रकाश’ में निर्वेद को शांत रस का स्थायी भाव मानते हुए इसकी विस्तृत व्याख्या की है।
शांत रस के प्रमुख उदाहरण
कबीरदास की पंक्तियाँ
“मन रे तन कागद का पुतला।
लागै बूंद बिनसि जाय छिन में, गरब करै क्या इतना।।”
यहाँ कबीरदास शरीर को कागज के पुतले के समान नश्वर बताकर संसार से विरक्ति और परम तत्व की ओर संकेत कर रहे हैं।
तुलसीदास की पंक्तियाँ
“अब लौं नसानी, अब न नसैहौं।
राम कृपा भव निसा सिरानी, जागे फिरि न डसैहौं।।”
इन पंक्तियों में तुलसीदास ने राम की कृपा से मोह-माया रूपी रात्रि के समाप्त होने और आत्म-बोध के जाग्रत होने का वर्णन किया है।
वात्सल्य रस की परिभाषा और स्वरूप
काव्य शास्त्र में वात्सल्य रस का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। माता-पिता का अपनी संतान के प्रति, गुरु का अपने शिष्य के प्रति अथवा बड़ों का छोटों के प्रति जो स्वाभाविक प्रेम, स्नेह और ममता का भाव होता है, वही परिपक्व होकर वात्सल्य रस के रूप में परिणत होता है। प्रारंभ में आचार्यों ने इसे केवल श्रृंगार रस के अंतर्गत ही माना था, किंतु बाद के विद्वानों ने इसे दसवें रस के रूप में मान्यता प्रदान की।
वात्सल्य रस के प्रमुख अंग
किसी भी रस की निष्पत्ति के लिए उसके अंगों का होना अनिवार्य है। वात्सल्य रस के मुख्य अवयव निम्नलिखित हैं:
1. स्थायी भाव
वात्सल्य रस का स्थायी भाव वत्सलता अथवा स्नेह है। यह संतान या छोटों के प्रति प्रेम की भावना को दर्शाता है।
2. विभाव
आलम्बन विभाव
- आलम्बन (विषय): पुत्र, शिष्य, छोटा भाई या कोई भी बालक जिसकी चेष्टाएँ प्रेम उत्पन्न करती हैं।
- आश्रय: माता-पिता, गुरु या बड़े बुजुर्ग जिनके हृदय में प्रेम उमड़ता है।
उद्दीपन विभाव
बालक की तोतली बोली, घुटनों के बल चलना, धूल धूसरित शरीर, उसकी मुस्कान, किलकारियां और चंचल क्रीड़ाएं उद्दीपन का कार्य करती हैं जो प्रेम को तीव्र करती हैं।
3. अनुभाव
आश्रय की वे बाह्य चेष्टाएँ जो प्रेम को प्रकट करती हैं:
- बालक को गोद में लेना या आलिंगन करना।
- सिर पर हाथ फेरना या चूमना।
- गदगद होना और आँखों में आँसू आ जाना।
- मुस्कुराना और लाड-प्यार करना।
4. संचारी भाव
इसमें हर्ष, गर्व, मोह, शंका (बालक को चोट न लग जाए), चपलता और आवेग जैसे भाव संचारी रूप में विद्यमान रहते हैं।
वात्सल्य रस के भेद
वात्सल्य रस को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया गया है:
1. संयोग वात्सल्य
जब माता-पिता का संतान के साथ प्रत्यक्ष मिलन और उनकी क्रीड़ाओं का वर्णन होता है, तो वहां संयोग वात्सल्य होता है। उदाहरण के लिए, माता यशोदा का बालक कृष्ण को लोरी सुनाना।
2. वियोग वात्सल्य
जब संतान दूर हो और माता-पिता उसके वियोग में व्याकुल हों, तो उसे वियोग वात्सल्य कहते हैं। जैसे कृष्ण के मथुरा चले जाने पर माता यशोदा की स्थिति।
प्रमुख कवि और उदाहरण
महाकवि सूरदास
सूरदास को वात्सल्य रस का सम्राट माना जाता है। उन्होंने कृष्ण के बाल रूप का इतना सूक्ष्म वर्णन किया है कि कहा जाता है कि वे वात्सल्य का कोना-कोना झाँक आए हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने उनकी प्रशंसा में लिखा है कि सूरदास ने वात्सल्य भाव को जो ऊँचाई दी है, वह अद्वितीय है।
तुलसीदास
गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी कृतियों (जैसे कवितावली) में भगवान राम के बाल रूप का अत्यंत मनोहारी वर्णन किया है, जो वात्सल्य रस का उत्कृष्ट उदाहरण है।
महत्वपूर्ण तथ्य
- वात्सल्य रस को भक्ति रस के निकट माना जाता है।
- आचार्य विश्वनाथ ने साहित्य दर्पण में वात्सल्य को स्वतंत्र रस के रूप में प्रतिष्ठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- संस्कृत साहित्य में बालक की चेष्टाओं को मुग्ध भाव के रूप में भी वर्णित किया गया है।
भक्ति रस का स्वरूप
काव्य शास्त्र में भक्ति रस को वह अवस्था माना गया है जहाँ भक्त का मन पूरी तरह से ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाता है। जब काव्य या नाटक में ईश्वर के प्रति अनुराग का वर्णन किया जाता है, तो वहाँ भक्ति रस की निष्पत्ति होती है। इसे प्रायः शांत और श्रृंगार रस से अलग एक स्वतंत्र रस के रूप में मान्यता प्राप्त है।
प्राचीन आचार्यों ने आरम्भ में केवल 9 रसों को ही स्वीकार किया था, परन्तु परवर्ती आचार्यों जैसे रूप गोस्वामी और मधुसूदन सरस्वती ने भक्ति को एक स्वतंत्र रस के रूप में स्थापित किया।
भक्ति रस के अवयव (अंग)
किसी भी रस की पूर्णता उसके अंगों पर निर्भर करती है। भक्ति रस के मुख्य अंग निम्नलिखित हैं:
स्थायी भाव
भक्ति रस का स्थायी भाव भगवद्-विषयक रति या ईश्वर अनुराग है। यह श्रृंगार रस की कामुक रति से भिन्न, पूर्णतः सात्विक और आध्यात्मिक होती है।
आलम्बन विभाव
जिसके प्रति भक्ति भाव जागृत होता है, उसे आलम्बन कहते हैं। इसमें परमात्मा, भगवान के अवतार जैसे श्री राम, श्री कृष्ण या कोई भी आराध्य देव आलम्बन होते हैं।
उद्दीपन विभाव
जो परिस्थितियाँ भक्ति भाव को तीव्र करती हैं, उन्हें उद्दीपन कहते हैं। जैसे:
- भगवान के गुणों का श्रवण करना।
- मंदिरों का वातावरण और सत्संग।
- पवित्र तीर्थ स्थानों की यात्रा।
- भजन, कीर्तन और दिव्य लीलाओं का दर्शन।
अनुभाव
भक्ति के कारण शरीर पर दिखने वाली प्रतिक्रियाएं अनुभाव कहलाती हैं:
- नेत्रों से अश्रु प्रवाहित होना।
- गदगद कंठ होना और शरीर का पुलकित होना।
- भगवान की प्रतिमा के सामने नृत्य करना या विह्वल होकर गिर पड़ना।
संचारी भाव
मन में उठने वाले अस्थिर मनोविकार संचारी भाव कहलाते हैं। भक्ति रस में प्रमुख संचारी भाव हैं:
- निर्वेद (सांसारिक मोह का त्याग)
- हर्ष, धृति, मति और दैन्य (अत्यधिक विनम्रता)
भक्ति रस के प्रमुख भेद
साधना और भाव की दृष्टि से भक्ति रस को विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया गया है:
- शान्त भक्ति: भगवान के ऐश्वर्य और शांति स्वरूप का ध्यान।
- दास्य भक्ति: स्वयं को भगवान का सेवक मानना, जैसे हनुमान जी की भक्ति।
- सख्य भक्ति: भगवान को मित्र मानना, जैसे अर्जुन या सुदामा का भाव।
- वात्सल्य भक्ति: भगवान को पुत्र रूप में प्रेम करना, जैसे माता यशोदा का प्रेम।
- माधुर्य भक्ति: भगवान को पति या प्रेमी के रूप में देखना, जैसे मीराबाई की भक्ति।
प्रसिद्ध उदाहरण
उदाहरण 1: मीराबाई
“मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोइ।
जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोइ।”
उदाहरण 2: सूरदास
“अविगत गति कछु कहत न आवै।
ज्यों गूँगे मीठे फल को रस, अंतरगत ही भावै।”
उदाहरण 3: तुलसीदास
“राम जपु, राम जपु, राम जपु बावरे।
घोर भव नीरनिधि नाम निज नाव रे।”
श्रृंगार और भक्ति रस में अंतर
यद्यपि दोनों का आधार ‘रति’ (प्रेम) है, फिर भी इनमें मौलिक अंतर है:
- श्रृंगार रस में प्रेम लौकिक और इन्द्रियजन्य होता है, जबकि भक्ति में प्रेम अलौकिक और आध्यात्मिक होता है।
- श्रृंगार का आलम्बन नायक-नायिका होते हैं, जबकि भक्ति का आलम्बन परमेश्वर होता है।
- श्रृंगार रस में काम भाव की प्रधानता रहती है, जबकि भक्ति रस में निस्वार्थ समर्पण और आत्मनिवेदन की प्रधानता होती है।
परीक्षा में भ्रमित करने वाले बिंदु
हिंदी साहित्य और काव्य शास्त्र में रस को काव्य की आत्मा माना गया है। रस के अंगों और उनकी संख्या को लेकर विद्वानों में सदैव मतभेद रहे हैं, जो अक्सर परीक्षा में भ्रम की स्थिति उत्पन्न करते हैं।
रसों की संख्या से जुड़े भ्रमित तथ्य
- भरतमुनि ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ नाट्यशास्त्र में केवल 8 रसों का वर्णन किया है। उन्होंने शांत रस को रस की श्रेणी में नहीं गिना था।
- आचार्य उद्भट ने सर्वप्रथम नवें रस के रूप में शांत रस को स्वीकार किया।
- वर्तमान में कुल रसों की संख्या 11 मानी जाती है, जिसमें वात्सल्य रस और भक्ति रस को शामिल किया गया है।
- यदि मूल रसों की संख्या पूछी जाए तो उत्तर 9 होगा, जिन्हें नवरस कहा जाता है।
समान लगने वाले रसों में सूक्ष्म अंतर
कुछ रसों के स्थाई भाव और उनके लक्षण इतने मिलते-जुलते हैं कि उनमें अंतर कर पाना कठिन हो जाता है। परीक्षा की दृष्टि से निम्नलिखित अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:
वियोग श्रृंगार बनाम करुण रस
इन दोनों रसों में शोक और दुःख की अनुभूति होती है, परंतु इनका आधार भिन्न है:
- वियोग श्रृंगार में नायक और नायिका के बिछड़ने का वर्णन होता है, लेकिन यहाँ भविष्य में पुनर्मिलन की आशा बनी रहती है।
- करुण रस में किसी प्रिय वस्तु या व्यक्ति के स्थाई विनाश या मृत्यु का बोध होता है, जहाँ मिलन की संभावना समाप्त हो जाती है।
वीर रस बनाम रौद्र रस
उत्साह और क्रोध की शारीरिक प्रतिक्रियाएं प्रायः समान दिखती हैं, जिससे इन रसों में भ्रम होता है:
- वीर रस का स्थाई भाव उत्साह है। इसमें धैर्य, गर्व और धर्म की रक्षा का भाव प्रधान होता है।
- रौद्र रस का स्थाई भाव क्रोध है। इसमें शत्रु के प्रति प्रतिशोध, अपमान का बदला और अनियंत्रित उत्तेजना होती है।
श्रृंगार, वात्सल्य और भक्ति रस
इन तीनों रसों का मूल आधार रति (प्रेम) ही है, किंतु आलंबन बदलने से रस बदल जाता है:
- श्रृंगार रस में रति का आधार नायक-नायिका का प्रेम है।
- वात्सल्य रस में रति का आधार संतान या अनुज के प्रति प्रेम है।
- भक्ति रस में रति का आधार ईश्वर या आराध्य के प्रति प्रेम है।
स्थाई भाव और संचारी भाव संबंधी जटिलताएँ
स्थाई भावों की भ्रमित स्थितियाँ
प्रत्येक रस का एक निश्चित स्थाई भाव होता है, किंतु कुछ रसों के स्थाई भावों के नाम परस्पर भ्रम पैदा करते हैं:
- अद्भुत रस का स्थाई भाव विस्मय है।
- वीभत्स रस का स्थाई भाव जुगुप्सा या घृणा है।
- भयानक रस का स्थाई भाव भय है।
- शांत रस का स्थाई भाव निर्वेद है।
संचारी भावों की संख्या और स्वभाव
संचारी भावों को व्यभिचारी भाव भी कहा जाता है। इनकी कुल संख्या 33 निश्चित की गई है।
छल नामक 34वें संचारी भाव की कल्पना महाकवि देव ने की थी, परंतु इसे शास्त्रीय मान्यता प्राप्त नहीं हुई। यह बिंदु परीक्षाओं में बार-बार पूछा जाता है।
विभाव और अनुभाव में अंतर
आलंबन और उद्दीपन का भ्रम
विभाव के दो भेद होते हैं: आलंबन और उद्दीपन। आलंबन वह व्यक्ति या वस्तु है जिसके कारण भाव जागता है, जबकि उद्दीपन वे परिस्थितियाँ हैं जो जगे हुए भाव को और तीव्र करती हैं।
सात्त्विक अनुभाव
अनुभावों में सर्वाधिक भ्रम सात्त्विक अनुभावों को लेकर होता है। ये वे शारीरिक चेष्टाएँ हैं जो स्वतः घटित होती हैं और इन पर व्यक्ति का नियंत्रण नहीं होता। इनकी संख्या 8 है:
- स्तंभ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, कंप, विवर्णता, अश्रु और प्रलय।