भारत का संवैधानिक विकास ब्रिटिश शासन के दौरान पारित विभिन्न अधिनियमों और सुधारों की एक लंबी प्रक्रिया है, जिसने अंततः स्वतंत्र भारत के संविधान की नींव रखी। यह विकास ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन (1773-1858) से शुरू होकर ब्रिटिश क्राउन के शासन (1858-1947) तक चला।
1. कंपनी का शासन (1773-1858)
इस अवधि के दौरान, ब्रिटिश संसद ने ईस्ट इंडिया कंपनी के मामलों को विनियमित करने और नियंत्रित करने के लिए कई अधिनियम पारित किए।
1.1. रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 (Regulating Act, 1773)
रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानून था, जिसका उद्देश्य भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी (EIC) के शासन को नियमित और नियंत्रित करना था। यह भारत के संवैधानिक इतिहास में ब्रिटिश संसद द्वारा कंपनी के मामलों में हस्तक्षेप का पहला गंभीर प्रयास था।
अधिनियम पारित होने के प्रमुख कारण
इस अधिनियम को लाने के पीछे कई जटिल और बहुआयामी कारण उत्तरदायी थे, जिन्हें निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
- कंपनी की आर्थिक बदहाली: 1770 के दशक तक ईस्ट इंडिया कंपनी भारी वित्तीय संकट से जूझ रही थी। भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन के बावजूद, कंपनी ने ब्रिटिश सरकार से 10 लाख पाउंड के ऋण की मांग की थी।
- 1770 का बंगाल अकाल: बंगाल में आए विनाशकारी अकाल ने कंपनी की प्रशासनिक विफलता को उजागर कर दिया था, जिसमें लगभग एक-तिहाई जनसंख्या समाप्त हो गई थी।
- द्वैध शासन (Dual Government) की विफलता: रॉबर्ट क्लाइव द्वारा स्थापित द्वैध शासन प्रणाली ने बंगाल में अराजकता और भ्रष्टाचार को चरम पर पहुँचा दिया था।
- कंपनी अधिकारियों का निजी व्यापार: कंपनी के ‘नाबोब’ (Nabobs) यानी कर्मचारी भारत से अकूत संपत्ति लूटकर ब्रिटेन लौट रहे थे, जिससे ब्रिटिश समाज में ईर्ष्या और असंतोष व्याप्त था।
- हैदर अली से पराजय: प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767-1769) में कंपनी की शर्मनाक हार ने इसकी सैन्य और रणनीतिक कमजोरी को स्पष्ट कर दिया था।
अधिनियम के मुख्य प्रावधान (Key Provisions)
इस अधिनियम के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने कंपनी के राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचे में आमूल-चूल परिवर्तन किए।
1. बंगाल के गवर्नर का पदनाम परिवर्तन
इस अधिनियम द्वारा ‘बंगाल के गवर्नर’ को अब “बंगाल का गवर्नर-जनरल” (Governor-General of Bengal) बना दिया गया। वारेन हेस्टिंग्स को बंगाल का प्रथम गवर्नर-जनरल नियुक्त किया गया।
2. गवर्नर-जनरल की कार्यकारी परिषद (Executive Council)
गवर्नर-जनरल की सहायता के लिए 4 सदस्यीय एक कार्यकारी परिषद का गठन किया गया। परिषद के निर्णयों को बहुमत के आधार पर लिया जाना अनिवार्य था। परिषद के प्रारंभिक चार सदस्य निम्नलिखित थे:
- फिलिप फ्रांसिस (Philip Francis)
- क्लेवरिंग (Clavering)
- मोंसन (Monson)
- रिचर्ड बारवेल (Richard Barwell)
3. प्रेसीडेंसियों का केंद्रीकरण
बंबई (बॉम्बे) और मद्रास प्रेसीडेंसियों के गवर्नरों को कुछ विशेष मामलों (जैसे युद्ध और संधि) में बंगाल के गवर्नर-जनरल के अधीन कर दिया गया। यह भारत में प्रशासनिक केंद्रीकरण की दिशा में पहला कदम था।
4. उच्चतम न्यायालय की स्थापना (1774)
अधिनियम के तहत 1774 में कलकत्ता (फोर्ट विलियम) में एक ‘सुप्रीम कोर्ट ऑफ जुडिकेचर’ की स्थापना की गई। इसमें एक मुख्य न्यायाधीश और तीन अन्य न्यायाधीशों का प्रावधान था। सर एलिजा इम्पे इसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किए गए।
प्रशासनिक और नैतिक सुधार
भ्रष्टाचार पर प्रतिबंध
अधिनियम ने कंपनी के कर्मचारियों के लिए निम्नलिखित गतिविधियों को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया:
- निजी व्यापार (Private Trade) करना।
- भारतीय निवासियों से उपहार या रिश्वत स्वीकार करना।
ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण
‘कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स’ (कंपनी की शासी निकाय) के लिए अब यह अनिवार्य कर दिया गया कि वे भारत के राजस्व (Revenue), नागरिक और सैन्य मामलों की रिपोर्ट ब्रिटिश ट्रेजरी और राज्य सचिव को सौंपें।
अधिनियम के दोष और कमियाँ (Demerits and Weaknesses)
यद्यपि यह अधिनियम सुधारवादी था, लेकिन इसमें कई संरचनात्मक दोष थे जिन्होंने प्रशासनिक जटिलताएं पैदा कीं:
गवर्नर-जनरल और परिषद के बीच संघर्ष
गवर्नर-जनरल के पास वीटो पावर (निषेधाधिकार) नहीं था। वह अक्सर अपनी परिषद के बहुमत के खिलाफ असहाय हो जाता था, जिससे निर्णय प्रक्रिया बाधित होती थी।
उच्चतम न्यायालय का अस्पष्ट अधिकार क्षेत्र
सुप्रीम कोर्ट और गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन नहीं था। यह स्पष्ट नहीं था कि कंपनी के कर्मचारी किस कानून (भारतीय या ब्रिटिश) के तहत आएंगे।
दूरस्थ नियंत्रण की समस्या
ब्रिटेन में बैठे निदेशक मंडल और भारत में प्रशासन के बीच संचार में महीनों लग जाते थे, जिससे आपातकालीन स्थितियों में त्वरित निर्णय लेना असंभव हो जाता था।
ऐतिहासिक महत्व और प्रभाव
रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 ने भारत में कंपनी के शासन को पूरी तरह से नहीं बदला, बल्कि उसे एक कानूनी सांचे में ढालने की कोशिश की।
- संवैधानिक आधार: इसने भारत में लिखित संविधान और संसदीय नियंत्रण की नींव रखी।
- प्रशासनिक एकीकरण: तीनों प्रेसीडेंसियों को एक केंद्रीय शक्ति (बंगाल) के अधीन लाने का प्रयास किया गया।
- न्यायिक सुधार: भारतीय कानूनी इतिहास में पहली बार एक आधुनिक न्यायिक प्रणाली (सुप्रीम कोर्ट) की अवधारणा पेश की गई।
- सीमित संप्रभुता: इसने स्पष्ट कर दिया कि कंपनी की शक्तियाँ उसकी स्वयं की नहीं, बल्कि ब्रिटिश क्राउन की ओर से हैं।
विशेष तथ्य: अधिनियम में संशोधन
इस अधिनियम की विसंगतियों को दूर करने के लिए बाद में अधिनियम का निपटान (Act of Settlement), 1781 और पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 पारित किए गए थे।
1.2 पिट्स इंडिया एक्ट, 1784:
पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित एक अत्यंत महत्वपूर्ण अधिनियम था, जिसका मुख्य उद्देश्य 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट की कमियों को दूर करना और भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन पर ब्रिटिश सरकार का कड़ा नियंत्रण स्थापित करना था। इस अधिनियम का नाम तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री विलियम पिट द यंगर के नाम पर रखा गया था।
वर्ष 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट ने गवर्नर-जनरल और उनकी परिषद के बीच विवादों को जन्म दिया था, जिससे प्रशासनिक कार्यों में बाधा आ रही थी। इसके अलावा, कंपनी के भीतर भ्रष्टाचार और निरंतर चलते युद्धों (जैसे प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध और द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध) ने कंपनी की वित्तीय स्थिति को कमजोर कर दिया था। इन परिस्थितियों में ब्रिटिश क्राउन ने कंपनी के राजनीतिक कार्यों में सीधे हस्तक्षेप करने का निर्णय लिया।
अधिनियम के पारित होने के मुख्य कारण
1. रेगुलेटिंग एक्ट (1773) की विफलता
रेगुलेटिंग एक्ट ने गवर्नर-जनरल को कोई भी निर्णायक शक्ति नहीं दी थी, उसे अपनी परिषद के बहुमत पर निर्भर रहना पड़ता था। इसके कारण वारेन हेस्टिंग्स और उसके पार्षदों के बीच निरंतर संघर्ष बना रहता था।
2. कंपनी की वित्तीय अकर्मण्यता और भ्रष्टाचार
ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारी निजी व्यापार के माध्यम से अत्यधिक धन अर्जित कर रहे थे, जबकि कंपनी स्वयं दिवालिया होने की कगार पर थी और उसे ब्रिटिश सरकार से ऋण की आवश्यकता थी।
3. लॉर्ड नॉर्थ और फॉक्स के इंडिया बिल की विफलता
1783 में फॉक्स इंडिया बिल को हाउस ऑफ लॉर्ड्स में सम्राट जॉर्ज III के हस्तक्षेप के कारण अस्वीकार कर दिया गया था। इसके बाद विलियम पिट ने एक अधिक संतुलित विधेयक पेश किया जिसे 1784 में पारित किया गया।
पिट्स इंडिया एक्ट की प्रमुख विशेषताएं और प्रावधान
1. दोहरी शासन व्यवस्था (Dual System of Control)
इस अधिनियम ने कंपनी के व्यापारिक और राजनीतिक कार्यों को एक-दूसरे से अलग कर दिया। इसके लिए दो अलग-अलग निकायों का गठन किया गया:
- निदेशक मंडल (Court of Directors): यह कंपनी के व्यापारिक मामलों के प्रबंधन के लिए उत्तरदायी बना रहा।
- नियंत्रण बोर्ड (Board of Control): यह एक नया निकाय था जिसका गठन कंपनी के राजनीतिक, नागरिक, सैन्य और राजस्व संबंधी मामलों की निगरानी के लिए किया गया था।
नियंत्रण बोर्ड (Board of Control) की संरचना:
इसमें कुल 6 सदस्य शामिल थे:
- एक चांसलर ऑफ एक्सचेकर (Chancellor of the Exchequer)।
- एक राज्य सचिव (Secretary of State)।
- प्रिवी काउंसिल के चार अन्य सदस्य, जिन्हें ब्रिटिश सम्राट द्वारा नियुक्त किया जाता था।
2. “ब्रिटिश आधिपत्य का क्षेत्र” शब्दावली का प्रयोग
अधिनियम के तहत पहली बार भारत में कंपनी के अधीन क्षेत्रों को “भारत में ब्रिटिश संपत्ति” (British Possessions in India) कहा गया। यह संवैधानिक रूप से स्पष्ट करता था कि भारत पर अंतिम संप्रभुता ब्रिटिश क्राउन की है, न कि केवल एक निजी कंपनी की।
3. गवर्नर-जनरल की परिषद में बदलाव
गवर्नर-जनरल की कार्यकारी परिषद के सदस्यों की संख्या 4 से घटाकर 3 कर दी गई। इसका मुख्य उद्देश्य गवर्नर-जनरल को परिषद के भीतर अधिक प्रभावी बनाना था, क्योंकि अब उसे बहुमत प्राप्त करने के लिए केवल एक सदस्य के समर्थन की आवश्यकता थी।
4. प्रेसीडेंसी पर केंद्रीय नियंत्रण
बंबई और मद्रास प्रेसीडेंसी को युद्ध, कूटनीति और राजस्व के मामलों में पूरी तरह से बंगाल (गवर्नर-जनरल) के अधीन कर दिया गया। गवर्नर-जनरल को अब प्रांतीय सरकारों को बर्खास्त करने का अधिकार भी दिया गया यदि वे उसके निर्देशों का उल्लंघन करती थीं।
सैन्य और वैदेशिक नीति पर प्रतिबंध
धारा 34: आक्रामक युद्धों की मनाही
अधिनियम की धारा 34 में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि “भारत में विजय और साम्राज्य विस्तार की नीति ब्रिटिश राष्ट्र की इच्छा, सम्मान और नीति के विरुद्ध है।” इसके अनुसार, गवर्नर-जनरल को निदेशक मंडल या नियंत्रण बोर्ड की पूर्व अनुमति के बिना भारतीय राजाओं के साथ युद्ध घोषित करने या संधि करने से रोक दिया गया।
अधिनियम का संवैधानिक और प्रशासनिक महत्व
1. ब्रिटिश सरकार का सर्वोच्च नियंत्रण
इस अधिनियम ने कंपनी को ब्रिटिश सरकार का एक विभाग जैसा बना दिया। नियंत्रण बोर्ड के पास कंपनी के सभी नागरिक, सैन्य और राजस्व अभिलेखों तक पहुंच थी और वह किसी भी आदेश को बदलने की शक्ति रखता था।
2. केंद्रीकरण की प्रवृत्ति
इस अधिनियम ने भारत में एक एकीकृत प्रशासन की नींव रखी। मद्रास और बंबई की स्वायत्तता को समाप्त कर उन्हें कलकत्ता के अधीन करना केंद्रीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम था।
3. नियुक्तियों पर नियंत्रण
हालाँकि नियुक्तियाँ अभी भी कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के हाथ में थीं, लेकिन उच्च पदों (जैसे गवर्नर-जनरल और कमांडर-इन-चीफ) की नियुक्ति के लिए सम्राट की स्वीकृति अनिवार्य कर दी गई।
अधिनियम की सीमाएं और आलोचना
पिट्स इंडिया एक्ट ने यद्यपि कई सुधार किए, लेकिन इसमें कुछ अंतर्निहित दोष भी थे:
- दोहरा नियंत्रण प्रणाली: बोर्ड ऑफ कंट्रोल और कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन न होने के कारण अक्सर भ्रम की स्थिति बनी रहती थी। यह व्यवस्था 1858 तक चलती रही, जो जटिल और खर्चीली थी।
- गवर्नर-जनरल की स्थिति: यद्यपि परिषद की संख्या कम की गई थी, लेकिन फिर भी गवर्नर-जनरल को परिषद के विरुद्ध वीटो (Veto) का अधिकार पूरी तरह नहीं मिला था, जिसे बाद में 1786 के अधिनियम द्वारा संशोधित करना पड़ा।
- नियंत्रण बोर्ड की अनभिज्ञता: बोर्ड के सदस्य अक्सर ब्रिटिश राजनेता होते थे जिन्हें भारतीय परिस्थितियों, संस्कृति और प्रशासन का कोई जमीनी अनुभव नहीं होता था।
- संपत्ति का प्रकटीकरण: अधिनियम में प्रावधान था कि भारत से लौटने वाले अधिकारियों को अपनी संपत्ति की घोषणा करनी होगी, लेकिन व्यावहारिक रूप से इसे लागू करना कठिन साबित हुआ।
विशेष तथ्य: 1786 का अनुपूरक अधिनियम
पिट्स इंडिया एक्ट के तुरंत बाद, लॉर्ड कॉर्नवालिस को गवर्नर-जनरल नियुक्त करने के लिए 1786 का अधिनियम लाया गया। कॉर्नवालिस ने दो मांगें रखी थीं:
- उसे विशेष मामलों में अपनी परिषद के निर्णयों को रद्द करने (Veto) की शक्ति दी जाए।
- उसे कमांडर-इन-चीफ (मुख्य सेनापति) का पद भी दिया जाए।
इन मांगों को स्वीकार कर पिट्स इंडिया एक्ट की कार्यक्षमता को बढ़ाया गया और भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के सुदृढ़ीकरण की प्रक्रिया तेज हुई।
1.3. चार्टर अधिनियम, 1813 (Charter Act, 1813)
1813 का चार्टर अधिनियम ब्रिटिश संसद द्वारा पारित एक अत्यंत महत्वपूर्ण वैधानिक दस्तावेज था, जिसने भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (EIC) की प्रकृति और भूमिका में क्रांतिकारी बदलाव किए। इस अधिनियम के पारित होने के पीछे तत्कालीन वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियाँ जिम्मेदार थीं।
अधिनियम के पारित होने के प्रमुख कारण
नेपोलियन की महाद्वीपीय प्रणाली (Continental System)
नेपोलियन बोनापार्ट ने ब्रिटेन को आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए बर्लिन और मिलान डिक्री के माध्यम से ब्रिटिश व्यापार के लिए यूरोपीय बंदरगाह बंद कर दिए थे। इससे ब्रिटिश व्यापारियों और निर्यातकों को भारी नुकसान हो रहा था, जिससे उन्होंने भारत के व्यापारिक द्वार सभी के लिए खोलने की मांग की।
एडम स्मिथ और ‘लायसे-फेयर’ (Laissez-faire) का सिद्धांत
उस समय यूरोप में एडम स्मिथ के ‘मुक्त व्यापार’ के सिद्धांत ने लोकप्रियता हासिल कर ली थी। ब्रिटिश बुद्धिजीवी और व्यापारी कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार (Monopoly) को अनुचित मानते थे और सभी ब्रिटिश नागरिकों के लिए भारत के साथ व्यापार करने की स्वतंत्रता चाहते थे।
ईसाई मिशनरियों का दबाव
ब्रिटेन में ‘इवेंजेलिकल’ समूह, जिसका नेतृत्व विलियम विल्बरफोर्स कर रहे थे, भारत में ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए कानूनी अनुमति की मांग कर रहे थे। उनका मानना था कि कंपनी भारतीयों के धार्मिक मामलों में अत्यधिक तटस्थ है।
अधिनियम के मुख्य प्रावधान और विस्तृत विश्लेषण
1813 के चार्टर अधिनियम ने कंपनी के अधिकारों को अगले 20 वर्षों के लिए बढ़ा दिया, लेकिन इसके साथ ही कई महत्वपूर्ण शर्तें थोप दी गईं।
व्यापारिक एकाधिकार की समाप्ति
इस अधिनियम ने ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत के साथ व्यापार करने के एकाधिकार को समाप्त कर दिया। अब सभी ब्रिटिश व्यापारियों को भारत के साथ व्यापार करने की अनुमति मिल गई। हालांकि, कंपनी को दो क्षेत्रों में विशेष रियायत दी गई:
- चाय का व्यापार: चाय के व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार बना रहा।
- चीन के साथ व्यापार: चीन के साथ होने वाले समस्त व्यापार पर कंपनी का नियंत्रण बरकरार रखा गया।
संवैधानिक स्थिति और संप्रभुता
इस अधिनियम ने पहली बार स्पष्ट रूप से घोषित किया कि कंपनी द्वारा शासित भारतीय क्षेत्र ब्रिटिश क्राउन (Crown) की संप्रभुता के अधीन हैं। यह कंपनी के प्रशासन को ब्रिटिश संसद के प्रत्यक्ष नियंत्रण में लाने की दिशा में एक बड़ा कदम था।
धार्मिक और सामाजिक प्रावधान: मिशनरियों का आगमन
अधिनियम ने ईसाई मिशनरियों को भारत आने और अपने धर्म का प्रचार करने की औपचारिक अनुमति प्रदान की।
- मिशनरियों के लिए भारत में बसने हेतु बोर्ड ऑफ कंट्रोल से लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य बनाया गया।
- कलकत्ता में एक बिशप की नियुक्ति का प्रावधान किया गया, जिसका खर्च कंपनी को वहन करना था।
शिक्षा के लिए वित्तीय आवंटन
अधिनियम की धारा 43 में भारतीय विद्वानों को प्रोत्साहित करने और भारतीयों के बीच आधुनिक विज्ञान के प्रसार के लिए प्रति वर्ष 1 लाख रुपये खर्च करने का प्रावधान किया गया। यह भारत में राज्य-प्रायोजित शिक्षा प्रणाली की औपचारिक शुरुआत थी।
वित्तीय और प्रशासनिक नियंत्रण
राजस्व और खातों का पृथक्करण
अधिनियम ने कंपनी को अपने व्यापारिक खातों (Commercial Accounts) और क्षेत्रीय राजस्व खातों (Territorial Revenue) को अलग-अलग रखने का निर्देश दिया। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि भारतीय राजस्व का उपयोग कंपनी के व्यापारिक घाटे को पाटने के लिए न किया जाए।
कर लगाने की शक्ति
स्थानीय सरकारों (Local Governments) को व्यक्तियों पर कर लगाने का अधिकार दिया गया। यदि कोई व्यक्ति कर का भुगतान नहीं करता था, तो उसे दंडित करने का अधिकार भी स्थानीय निकायों को प्रदान किया गया।
नियुक्ति और नियंत्रण
गवर्नर जनरल, गवर्नरों और प्रधान सेनापति (Commander-in-Chief) की नियुक्ति के लिए ब्रिटिश सम्राट की स्वीकृति अनिवार्य कर दी गई। इसके अतिरिक्त, बोर्ड ऑफ कंट्रोल की शक्तियों का विस्तार किया गया, जिससे कंपनी की स्वायत्तता और कम हो गई।
अधिनियम का प्रभाव और आलोचनात्मक विश्लेषण
भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
एकाधिकार समाप्त होने से भारत में ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं, विशेषकर सूती कपड़ों की बाढ़ आ गई। इसने भारतीय कुटीर उद्योगों और बुनकरों को भारी क्षति पहुँचाई, क्योंकि वे मशीन से बने सस्ते आयातित माल का मुकाबला नहीं कर सके। इसे ‘वि-औद्योगिकीकरण’ (De-industrialization) की प्रक्रिया की शुरुआत माना जाता है।
शिक्षा और सांस्कृतिक प्रभाव
शिक्षा के लिए आवंटित 1 लाख रुपये की राशि ने भविष्य में ‘प्राच्यवादी-आंग्लविद् विवाद’ (Orientalist-Anglicist Controversy) को जन्म दिया। मिशनरियों के आगमन से भारतीयों में अपनी धार्मिक पहचान को लेकर चेतना जागृत हुई, जिसने आगे चलकर 1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार करने में भूमिका निभाई।
प्रशासनिक ढांचे में परिवर्तन
- कंपनी अब केवल एक व्यापारिक इकाई नहीं रही, बल्कि वह क्राउन की ओर से एक ट्रस्टी (Trustee) के रूप में शासन कर रही थी।
- यूरोपीय लोगों के लिए भारत में आने-जाने और बसने के लिए लाइसेंस प्रणाली लागू की गई, जिससे ब्रिटिश पूंजी का भारत में निवेश बढ़ा।
- भारतीय सेना के खर्च और प्रशासनिक अधिकारियों के वेतन का बोझ भारतीय राजस्व पर और बढ़ गया।
कानूनी अधिकार क्षेत्र
इस अधिनियम के तहत ब्रिटिश अदालतों के अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट किया गया और भारत में रहने वाले ब्रिटिश विषयों पर उनकी पकड़ मजबूत की गई। इसने भारतीय न्याय प्रणाली में यूरोपीय तत्वों के हस्तक्षेप को बढ़ावा दिया।
1.4. चार्टर अधिनियम, 1833 (Charter Act, 1833)
- कंपनी के व्यापारिक कार्यों को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया। यह एक शुद्ध प्रशासनिक निकाय बन गई।
- बंगाल के गवर्नर-जनरल को ‘भारत का गवर्नर-जनरल’ बनाया गया। लॉर्ड विलियम बेंटिंक भारत के पहले गवर्नर-जनरल थे।
- कानून बनाने की शक्ति गवर्नर-जनरल की परिषद में केंद्रित।
- सिविल सेवकों के चयन के लिए खुली प्रतियोगिता प्रणाली शुरू करने का प्रयास किया गया (लेकिन कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के विरोध के कारण लागू नहीं हो सका)।
1.5. चार्टर अधिनियम, 1853 (Charter Act, 1853)
- विधायी और कार्यकारी कार्यों को अलग किया।
- सिविल सेवकों के चयन के लिए खुली प्रतियोगिता प्रणाली शुरू की गई। मैकाले समिति (1854) की नियुक्ति।
- पहली बार भारतीय केंद्रीय विधान परिषद में स्थानीय प्रतिनिधित्व की शुरुआत।
2. क्राउन का शासन (1858-1947)
1857 के विद्रोह के बाद, भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन आ गया।
2.1. भारत सरकार अधिनियम, 1858 (Government of India Act, 1858)
भारत सरकार अधिनियम, 1858- कानून बनाने की प्रक्रिया में भारतीयों के प्रतिनिधित्व की शुरुआत।
- वायसराय की कार्यकारी परिषद में कुछ गैर-सरकारी सदस्यों को शामिल किया गया।
- पोर्टफोलियो प्रणाली (Portfolio System) की शुरुआत (लॉर्ड कैनिंग द्वारा)।
- वायसराय को अध्यादेश जारी करने की शक्ति।
2.3. भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 (Indian Councils Act, 1892)
- केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई।
- विधान परिषदों को बजट पर चर्चा करने और कार्यपालिका से प्रश्न पूछने की शक्ति दी गई (लेकिन मतदान का अधिकार नहीं)।
- चुनाव का अप्रत्यक्ष प्रावधान किया गया।
भारतीय परिषद अधिनियम, 1909: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और परिचय
भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 को भारतीय इतिहास में मार्ले-मिंटो सुधार (Morley-Minto Reforms) के नाम से भी जाना जाता है। इस अधिनियम का नाम तत्कालीन भारत सचिव लॉर्ड मार्ले (Lord Morley) और भारत के वायसराय लॉर्ड मिंटो (Lord Minto) के नाम पर रखा गया था। यह अधिनियम ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया था जिसका मुख्य उद्देश्य भारत में बढ़ती हुई राष्ट्रवादी गतिविधियों को शांत करना और भारतीयों को शासन में सीमित भागीदारी प्रदान करना था।
इस अधिनियम की जड़ें 19वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी की शुरुआत में पनपे राजनीतिक असंतोष में छिपी थीं। 1905 का बंगाल विभाजन और उसके बाद शुरू हुआ स्वदेशी आंदोलन ब्रिटिश राज के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया था। इसके अतिरिक्त, उदारवादी कांग्रेस की संवैधानिक सुधारों की मांग और उग्रवादी गुट का बढ़ता प्रभाव भी इस सुधार प्रक्रिया के पीछे महत्वपूर्ण कारण थे।
अधिनियम के पारित होने के उत्तरदायी कारक
1. उदारवादियों और उग्रवादियों के बीच विभाजन
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में 1907 के सूरत अधिवेशन के दौरान फूट पड़ गई थी। ब्रिटिश सरकार उदारवादियों को खुश करना चाहती थी ताकि उन्हें उग्रवादियों से अलग किया जा सके और शासन को सुचारू रूप से चलाया जा सके।
2. आगा खां के नेतृत्व में शिमला प्रतिनिधिमंडल (1906)
1 अक्टूबर 1906 को, आगा खां के नेतृत्व में मुस्लिमों का एक प्रतिनिधिमंडल वायसराय लॉर्ड मिंटो से शिमला में मिला। उन्होंने मुसलमानों के लिए ‘सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व’ और पृथक निर्वाचन मंडल की मांग की। लॉर्ड मिंटो ने इस मांग का समर्थन किया, जो आगे चलकर फूट डालो और राज करो की नीति का आधार बना।
3. क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का उदय
बंगाल विभाजन के बाद भारत में क्रांतिकारी गतिविधियों में तेजी आई थी। ब्रिटिश सरकार दमनकारी नीतियों के साथ-साथ कुछ प्रशासनिक सुधारों का दिखावा करना चाहती थी ताकि जनता के आक्रोश को कम किया जा सके।
अधिनियम की मुख्य विशेषताएं और प्रावधान
1. विधान परिषदों के आकार में वृद्धि
इस अधिनियम ने केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों के आकार में भारी वृद्धि की:
- केंद्रीय विधान परिषद: अतिरिक्त सदस्यों की संख्या 16 से बढ़ाकर 60 कर दी गई।
- प्रांतीय विधान परिषद: बंगाल, मद्रास और बॉम्बे जैसे बड़े प्रांतों के लिए सदस्यों की संख्या 50 निर्धारित की गई, जबकि छोटे प्रांतों के लिए यह संख्या 30 रखी गई।
2. निर्वाचन प्रणाली और सदस्यता के प्रकार
परिषदों में चार प्रकार के सदस्य होते थे:
- पदेन सदस्य: वायसराय और उसकी कार्यकारी परिषद के सदस्य।
- मनोनीत सरकारी सदस्य: सरकारी अधिकारी जिन्हें वायसराय द्वारा नामित किया जाता था।
- मनोनीत गैर-सरकारी सदस्य: ऐसे सदस्य जो सरकारी अधिकारी नहीं थे लेकिन वायसराय द्वारा नामित किए जाते थे।
- निर्वाचित सदस्य: जो विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों से चुनकर आते थे।
3. पृथक निर्वाचन मंडल (Separate Electorate)
यह इस अधिनियम का सबसे विवादास्पद हिस्सा था। मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की व्यवस्था की गई, जिसका अर्थ था कि मुस्लिम उम्मीदवारों का चुनाव केवल मुस्लिम मतदाता ही कर सकते थे। इसने भारत में ‘सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व’ के बीज बोए।
लॉर्ड मिंटो का दृष्टिकोण:
लॉर्ड मिंटो ने लॉर्ड मार्ले को लिखे पत्र में कहा था, “हम ड्रैगन के दांत बो रहे हैं और इसकी फसल बहुत कड़वी होगी।” इसीलिए मिंटो को “सांप्रदायिक निर्वाचन के जनक” के रूप में जाना जाता है।
कार्यकारी परिषदों में भारतीयों का प्रवेश
अधिनियम ने पहली बार भारतीयों को वायसराय और गवर्नरों की कार्यकारी परिषद (Executive Council) के साथ जुड़ने का अवसर प्रदान किया।
सत्येंद्र प्रसाद सिन्हा का ऐतिहासिक नामांकन
सत्येंद्र प्रसाद सिन्हा (S.P. Sinha) वायसराय की कार्यकारी परिषद में शामिल होने वाले पहले भारतीय बने। उन्हें विधि सदस्य (Law Member) के रूप में नियुक्त किया गया था।
विधान परिषदों की शक्तियों में विस्तार
अधिनियम ने विधान परिषदों के सदस्यों को निम्नलिखित अधिकार प्रदान किए:
- अनुपूरक प्रश्न: सदस्य अब मूल प्रश्न के बाद अनुपूरक प्रश्न (Supplementary Questions) पूछ सकते थे।
- बजट पर चर्चा: सदस्य बजट पर संकल्प (Resolution) ला सकते थे और लोकहित के मामलों पर प्रस्ताव रख सकते थे।
- सीमाएं: वे अभी भी विदेशी मामलों, रक्षा और रियासतों जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर मतदान या चर्चा नहीं कर सकते थे।
अधिनियम की आलोचना और कमियां
1. अप्रत्यक्ष निर्वाचन
निर्वाचन की प्रक्रिया अत्यंत जटिल और अप्रत्यक्ष थी। जनता पहले स्थानीय निकायों को चुनती थी, वे प्रांतीय परिषदों के सदस्यों को और वे केंद्रीय परिषद के सदस्यों को चुनते थे। प्रत्यक्ष लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अभाव था।
2. उत्तरदायी शासन का अभाव
इस अधिनियम ने परिषदों का विस्तार तो किया, लेकिन वास्तविक शक्ति अभी भी ब्रिटिश अधिकारियों के पास थी। कार्यकारी परिषद के पास वीटो शक्ति थी और वे विधान परिषद के फैसलों को पलटने में सक्षम थे।
3. सांप्रदायिकता को वैधानिकता
पृथक निर्वाचन मंडल ने हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच खाई को और गहरा कर दिया। इसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की एकता को खंडित करने का प्रयास किया और अंततः द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के आधार को मजबूती दी।
4. सरकारी बहुमत का वर्चस्व
हालांकि प्रांतीय परिषदों में गैर-सरकारी बहुमत की अनुमति दी गई थी, लेकिन केंद्रीय विधान परिषद में सरकारी बहुमत (Official Majority) को बनाए रखा गया था, जिससे कोई भी क्रांतिकारी विधेयक पारित करना असंभव था।
सांख्यिकीय और संरचनात्मक विवरण
केंद्रीय विधान परिषद (60 निर्वाचित/नामित सदस्य) की संरचना:
- 28 – सरकारी अधिकारी।
- 5 – वायसराय द्वारा मनोनीत गैर-सरकारी सदस्य।
- 27 – निर्वाचित सदस्य (इनमें से 8 मुस्लिम पृथक निर्वाचन मंडल के लिए, 6 जमींदारों के लिए, 2 वाणिज्य मंडलों के लिए और 13 अन्य)।
मद्रास, बॉम्बे और बंगाल की प्रांतीय परिषदों में कार्यकारी सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 4 कर दी गई। इसके अतिरिक्त, बर्मा और पंजाब जैसे छोटे प्रांतों को भी परिषद विस्तार में शामिल किया गया था।
लॉर्ड मार्ले का सुधारों पर दृष्टिकोण
लॉर्ड मार्ले ने स्पष्ट किया था कि इन सुधारों का उद्देश्य भारत में संसदीय शासन प्रणाली की स्थापना करना बिल्कुल नहीं था। उन्होंने हाउस ऑफ लॉर्ड्स में कहा था, “यदि यह कहा जाए कि सुधारों के इस अध्याय का उद्देश्य भारत में संसदीय प्रणाली की स्थापना करना है, तो मेरा इससे कोई लेना-देना नहीं होगा।” इससे स्पष्ट होता है कि ब्रिटिश सरकार केवल दिखावे के सुधार कर रही थी।
भारत सरकार अधिनियम, 1919: एक विस्तृत ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत सरकार अधिनियम, 1919, जिसे मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार (Montagu-Chelmsford Reforms) के रूप में भी जाना जाता है, ब्रिटिश संसद द्वारा पारित एक अत्यंत महत्वपूर्ण अधिनियम था। इसका मुख्य उद्देश्य भारत में धीरे-धीरे उत्तरदायी सरकार (Responsible Government) की स्थापना करना था। यह अधिनियम तत्कालीन भारत सचिव एडविन मोंटेग्यू और वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड की रिपोर्ट पर आधारित था।
अधिनियम के पारित होने के कारण
- प्रथम विश्व युद्ध (1914-18): युद्ध के दौरान भारतीयों द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य को दिए गए समर्थन के बदले में वे स्वशासन की उम्मीद कर रहे थे।
- होम रूल आंदोलन: बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट के नेतृत्व में स्वशासन की मांग ने ब्रिटिश सरकार पर दबाव डाला।
- लखनऊ समझौता (1916): कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच हुए समझौते ने राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया, जिससे अंग्रेजों को संवैधानिक सुधारों के लिए विवश होना पड़ा।
- 1909 के सुधारों की विफलता: मार्ले-मिंटो सुधार भारतीयों की आकांक्षाओं को पूरा करने में पूरी तरह विफल रहे थे।
20 अगस्त, 1917 की मोंटेग्यू घोषणा
एडविन मोंटेग्यू ने ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स में एक ऐतिहासिक घोषणा की, जिसे अगस्त घोषणा कहा जाता है। इसमें स्पष्ट किया गया कि ब्रिटिश सरकार का लक्ष्य भारत में प्रशासन की हर शाखा में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाना और स्वशासी संस्थानों का क्रमिक विकास करना है।
अधिनियम की प्रस्तावना (Preamble)
इस अधिनियम की अपनी एक अलग प्रस्तावना थी, जिसमें निम्नलिखित सिद्धांतों को रेखांकित किया गया था:
- भारत ब्रिटिश साम्राज्य का एक अभिन्न अंग रहेगा।
- प्रशासन में भारतीयों का सहयोग और उत्तरदायी शासन की क्रमिक स्थापना।
- प्रांतों को स्वायत्तता प्रदान करना लेकिन केंद्र का नियंत्रण बनाए रखना।
प्रांतीय शासन में द्वैध शासन (Dyarchy)
अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता प्रांतों में द्वैध शासन प्रणाली की शुरुआत थी। प्रशासन के विषयों को दो भागों में विभाजित किया गया था:
1. आरक्षित विषय (Reserved Subjects)
इन विषयों का प्रशासन गवर्नर अपनी कार्यकारी परिषद की सहायता से करता था और वह विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी नहीं था।
- मुख्य विषय: न्याय, पुलिस, भू-राजस्व, वित्त, सिंचाई, और कानून व्यवस्था।
- इन विषयों पर पूर्ण नियंत्रण अंग्रेजों का बना रहा क्योंकि ये शासन के आधारभूत स्तंभ थे।
2. हस्तांतरित विषय (Transferred Subjects)
इन विषयों का प्रशासन गवर्नर उन भारतीय मंत्रियों की सहायता से करता था जो विधान परिषद के निर्वाचित सदस्यों के प्रति उत्तरदायी थे।
- मुख्य विषय: शिक्षा, स्वास्थ्य, स्थानीय स्वशासन, कृषि, और सार्वजनिक निर्माण।
- इन मंत्रियों का कार्यकाल विधान परिषद के विश्वास पर निर्भर था।
केंद्रीय सरकार का ढांचा
केंद्र में अभी भी अनुत्तरदायी सरकार बनी रही, लेकिन विधायी संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए।
द्विसदनीय विधायिका (Bicameral Legislature)
केंद्र में पहली बार द्विसदनीय व्यवस्था शुरू की गई, जिसमें दो सदन थे:
क. राज्य परिषद (Council of State – उच्च सदन)
- कुल सदस्य संख्या: 60 (33 निर्वाचित और 27 मनोनीत)।
- कार्यकाल: 5 वर्ष।
- इसमें केवल पुरुष सदस्य ही चुने जा सकते थे।
ख. केंद्रीय विधानसभा (Legislative Assembly – निम्न सदन)
- कुल सदस्य संख्या: 145 (104 निर्वाचित और 41 मनोनीत)।
- कार्यकाल: 3 वर्ष।
- निर्वाचित सदस्यों में 52 सामान्य, 30 मुस्लिम, 2 सिख और 20 विशेष निर्वाचन क्षेत्रों से थे।
वायसराय की शक्तियां
वायसराय की कार्यकारी परिषद के 8 सदस्यों में से 3 सदस्य भारतीय होना अनिवार्य कर दिया गया। हालांकि, वायसराय को वीटो पावर और अध्यादेश जारी करने की असीमित शक्तियां प्राप्त थीं।
निर्वाचन प्रणाली और सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व
इस अधिनियम ने सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का विस्तार किया, जो राष्ट्रीय एकता के लिए घातक सिद्ध हुआ।
- विस्तार: 1909 में केवल मुसलमानों को दिया गया पृथक निर्वाचन अब सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियन्स और यूरोपियों तक बढ़ा दिया गया।
- मताधिकार: मताधिकार बहुत सीमित था। संपत्ति, कर भुगतान या शिक्षा के आधार पर केवल 1-3% जनसंख्या को ही वोट देने का अधिकार था।
- प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली की शुरुआत की गई।
अन्य प्रमुख संवैधानिक प्रावधान
लोक सेवा आयोग की स्थापना
अधिनियम में सिविल सेवकों की भर्ती के लिए एक केंद्रीय लोक सेवा आयोग (Central Public Service Commission) की स्थापना का प्रावधान था, जो अंततः 1926 में ली आयोग की सिफारिश पर स्थापित हुआ।
लंदन में भारतीय उच्चायुक्त (High Commissioner)
भारत सचिव के कुछ कार्यों को स्थानांतरित करने के लिए लंदन में भारतीय उच्चायुक्त का नया पद सृजित किया गया। इसका वेतन भारत के राजस्व से दिया जाना तय हुआ।
सांविधिक आयोग (Statutory Commission)
अधिनियम में प्रावधान था कि 10 वर्ष बाद एक आयोग नियुक्त किया जाएगा जो इन सुधारों की कार्यप्रणाली की जांच करेगा। इसी प्रावधान के तहत 1927 में साइमन कमीशन की नियुक्ति हुई।
बजट का पृथक्करण
पहली बार प्रांतीय बजट को केंद्रीय बजट से अलग कर दिया गया। अब राज्य विधानसभाएं अपना बजट स्वयं बना सकती थीं।
अधिनियम का विश्लेषण और कमियां
द्वैध शासन की विफलता के कारण
- विषयों का अतार्किक विभाजन: कृषि हस्तांतरित विषय था, लेकिन सिंचाई (जो कृषि के लिए आवश्यक है) आरक्षित विषय था।
- वित्त का अभाव: हस्तांतरित विषयों के मंत्रियों के पास धन की कोई शक्ति नहीं थी; वित्त विभाग आरक्षित श्रेणी में था।
- गवर्नर का अत्यधिक हस्तक्षेप: गवर्नर के पास मंत्रियों के निर्णयों को पलटने की शक्ति थी।
- सिविल सेवा के अधिकारी भारतीय मंत्रियों के निर्देशों का पालन करने में आनाकानी करते थे।
भारतीय प्रतिक्रिया
- कांग्रेस ने इसे “निराशाजनक और असंतोषजनक” बताया।
- बाल गंगाधर तिलक ने इसे “बिना सूरज का सवेरा” कहा।
- उदारवादी नेताओं (जैसे सुरेन्द्रनाथ बनर्जी) ने इसका स्वागत किया और ‘इंडियन लिबरल फेडरेशन’ की स्थापना की।
ऐतिहासिक महत्व
इस अधिनियम ने भारत में संसदीय व्यवस्था की नींव रखी। यद्यपि यह भारतीयों को पूर्ण स्वशासन देने में विफल रहा, लेकिन इसने प्रत्यक्ष चुनाव और महिला मताधिकार (सीमित स्तर पर) जैसी अवधारणाओं को जन्म दिया। इसने प्रदर्शित किया कि ब्रिटिश सरकार अब दबाव में आकर कुछ शक्तियां भारतीयों को सौंपने के लिए तैयार थी। अधिनियम ने प्रांतीय स्वायत्तता की दिशा में पहला कदम बढ़ाया, जिसे बाद में 1935 के अधिनियम में और अधिक विस्तारित किया गया।
महत्वपूर्ण तथ्य एक नज़र में
- भारत सचिव का वेतन अब ब्रिटिश राजस्व से दिया जाना शुरू हुआ (पहले यह भारतीय राजस्व से दिया जाता था)।
- नरेश मंडल (Chamber of Princes) की स्थापना 1921 में इसी अधिनियम के प्रावधानों के तहत की गई।
- संसदीय उत्तरदायित्व का सीमित प्रयोग पहली बार प्रांतीय स्तर पर देखा गया।
- भारत में लोक सेवा आयोग की स्थापना की नींव इसी अधिनियम ने रखी।
भारत सरकार अधिनियम, 1935: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और परिचय
भारत सरकार अधिनियम, 1935 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित अब तक का सबसे लंबा और विस्तृत दस्तावेज़ था। इसमें कुल 321 धाराएं और 10 अनुसूचियां शामिल थीं। इस अधिनियम का निर्माण केवल एक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि यह वर्षों की चर्चाओं और राजनीतिक आंदोलनों का संकलन था।
अधिनियम के निर्माण के प्रमुख कारक
- साइमन कमीशन (1927): इसकी रिपोर्ट ने संवैधानिक सुधारों की आधारशिला रखी, जिसमें द्वैध शासन की समाप्ति की सिफारिश की गई थी।
- गोलमेज सम्मेलन (1930-1932): लंदन में आयोजित तीन सम्मेलनों में भारतीय नेताओं और ब्रिटिश सरकार के बीच संवैधानिक मुद्दों पर चर्चा हुई।
- श्वेत पत्र (1933): ब्रिटिश सरकार द्वारा जारी इस पत्र में भावी संवैधानिक ढांचे के प्रस्ताव शामिल थे।
- लोथियन समिति की रिपोर्ट: जिसने मताधिकार के विस्तार पर अपनी सिफारिशें दी थीं।
अधिनियम की मुख्य विशेषताएं
1935 का अधिनियम भारतीय संवैधानिक इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ क्योंकि इसने भारत के लिए एक “संघात्मक ढांचे” की परिकल्पना की थी।
1. अखिल भारतीय संघ (All-India Federation)
अधिनियम में एक अखिल भारतीय संघ की स्थापना का प्रावधान किया गया था, जिसमें ब्रिटिश भारत के प्रांत और देशी रियासतें दोनों शामिल होनी थीं।
- देशी रियासतों के लिए संघ में शामिल होना स्वैच्छिक था, जबकि प्रांतों के लिए यह अनिवार्य था।
- यह संघ कभी अस्तित्व में नहीं आ सका क्योंकि रियासतों ने इसमें शामिल होने के लिए आवश्यक ‘एक्सेशन के दस्तावेजों’ (Instruments of Accession) पर हस्ताक्षर नहीं किए।
2. शक्तियों का विभाजन (Division of Powers)
केंद्र और इकाइयों के बीच शक्तियों को तीन सूचियों में विभाजित किया गया था:
क. संघीय सूची (Federal List)
इसमें 59 विषय थे, जैसे रक्षा, विदेशी मामले, मुद्रा और नौसेना।
ख. प्रांतीय सूची (Provincial List)
इसमें 54 विषय थे, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस और कृषि।
ग. समवर्ती सूची (Concurrent List)
इसमें 36 विषय थे, जिन पर केंद्र और प्रांत दोनों कानून बना सकते थे, जैसे नागरिक प्रक्रिया, विवाह और तलाक।
अवशिष्ट शक्तियां (Residuary Powers)
अवशिष्ट शक्तियां वायसराय (गवर्नर जनरल) के पास सुरक्षित रखी गई थीं।
शासन व्यवस्था में परिवर्तन
3. प्रांतीय स्वायत्तता (Provincial Autonomy)
यह अधिनियम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा था। प्रांतों में द्वैध शासन (Dyarchy) को समाप्त कर दिया गया और उन्हें अपने निर्धारित क्षेत्रों में स्वतंत्र और स्वायत्त बना दिया गया।
- प्रांतों में ‘जिम्मेदार सरकार’ की स्थापना की गई।
- गवर्नर को सलाह देने के लिए मंत्रियों की परिषद अनिवार्य की गई, जो प्रांतीय विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी थी।
- यह प्रावधान 1937 में लागू हुआ और 1939 तक प्रभावी रहा।
4. केंद्र में द्वैध शासन (Dyarchy at the Centre)
अधिनियम ने केंद्र स्तर पर द्वैध शासन की शुरुआत की। संघीय विषयों को दो भागों में बांटा गया:
- आरक्षित विषय: रक्षा, विदेशी मामले, और जनजातीय क्षेत्र। इनका प्रशासन गवर्नर जनरल अपनी परिषद की सहायता से करता था।
- हस्तांतरित विषय: अन्य सभी विषय, जिनका प्रशासन गवर्नर जनरल मंत्रियों की सहायता से करता था।
संस्थागत और प्रशासनिक सुधार
5. संघीय न्यायालय (Federal Court)
अधिनियम के तहत 1 अक्टूबर 1937 को दिल्ली में एक संघीय न्यायालय की स्थापना की गई।
- इसमें एक मुख्य न्यायाधीश और अधिकतम छह अन्य न्यायाधीशों का प्रावधान था।
- सर मॉरिस ग्वेयर इसके पहले मुख्य न्यायाधीश थे।
6. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की स्थापना
देश की मुद्रा और साख को नियंत्रित करने के लिए अधिनियम ने भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।
7. लोक सेवा आयोग (Public Service Commission)
अधिनियम ने न केवल एक संघीय लोक सेवा आयोग (UPSC का पूर्ववर्ती) की स्थापना की, बल्कि प्रांतीय लोक सेवा आयोग और दो या दो से अधिक प्रांतों के लिए संयुक्त लोक सेवा आयोग की भी व्यवस्था की।
8. सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का विस्तार
सांप्रदायिक चुनाव प्रणाली को और बढ़ाते हुए इसे दलित जातियों (अनुसूचित जातियों), महिलाओं और श्रम/मजदूर वर्ग के लिए भी अलग निर्वाचन क्षेत्र प्रदान किए गए।
क्षेत्रीय और विधायी परिवर्तन
9. राज्यों का पुनर्गठन
- बर्मा (म्यांमार): इसे भारत से पूरी तरह अलग कर दिया गया।
- अदन: इसे भारत सरकार के नियंत्रण से हटाकर ब्रिटिश उपनिवेश कार्यालय के अधीन कर दिया गया।
- सिंध और ओडिशा: दो नए प्रांतों का निर्माण किया गया।
10. मताधिकार का विस्तार
संपत्ति, कर और शिक्षा के आधार पर मताधिकार को बढ़ाया गया, जिससे कुल जनसंख्या का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा वोट देने का अधिकार पा सका।
11. भारत परिषद की समाप्ति
1858 के अधिनियम द्वारा स्थापित ‘इंडिया काउंसिल’ (Council of India) को समाप्त कर दिया गया। भारत सचिव को अब केवल परामर्शदाताओं की एक टीम दी गई।
12. द्विसदनीय व्यवस्था (Bicameralism)
11 प्रांतों में से 6 प्रांतों (बंगाल, बॉम्बे, मद्रास, बिहार, संयुक्त प्रांत और असम) में द्विसदनीय विधायिका (विधान परिषद और विधानसभा) की शुरुआत की गई।
आलोचनाएं और प्रतिक्रियाएं
यद्यपि यह अधिनियम व्यापक था, लेकिन भारतीय नेताओं ने इसकी कड़ी आलोचना की क्योंकि इसमें ‘डोमिनियन स्टेटस’ का कोई उल्लेख नहीं था और वास्तविक शक्ति अभी भी अंग्रेजों के पास थी।
जवाहरलाल नेहरू के विचार
उन्होंने इसे “अनेक ब्रेकों वाली इंजन रहित गाड़ी” कहा। उन्होंने इसे “दास्ता का नया अधिकार पत्र” (Charter of Slavery) भी बताया।
मोहम्मद अली जिन्ना के विचार
उन्होंने इस योजना को “पूर्णतः सड़ा हुआ, मूल रूप से खराब और अस्वीकार्य” करार दिया।
मदन मोहन मालवीय के विचार
उन्होंने कहा कि “यह अधिनियम बाहर से देखने में कुछ हद तक लोकतांत्रिक लगता है लेकिन भीतर से यह पूरी तरह खोखला है।”
अधिनियम का महत्व और भारतीय संविधान पर प्रभाव
भारत के वर्तमान संविधान का लगभग 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से 1935 के अधिनियम से लिया गया है।
- संघीय ढांचा: केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का बंटवारा।
- न्यायपालिका: सर्वोच्च न्यायालय की संरचना संघीय न्यायालय के मॉडल पर आधारित है।
- आपातकालीन प्रावधान: गवर्नर जनरल की विशेष शक्तियों ने संविधान में आपातकालीन प्रावधानों के लिए आधार तैयार किया।
- लोक सेवा आयोग: संवैधानिक दर्जा और कार्यप्रणाली इसी अधिनियम से प्रेरित है।
- प्रशासनिक विवरण: शासन की कार्यप्रणाली के सूक्ष्म विवरण सीधे इस दस्तावेज़ से ग्रहण किए गए हैं।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947: एक ऐतिहासिक परिचय
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधायी दस्तावेज था, जिसने भारत में 200 वर्षों के ब्रिटिश शासन का अंत किया। यह अधिनियम माउंटबेटन योजना (3 जून योजना) पर आधारित था और इसने भारतीय उपमहाद्वीप को दो स्वतंत्र डोमिनियनों—भारत और पाकिस्तान—में विभाजित करने का कानूनी ढांचा प्रदान किया।
अधिनियम की पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक कारण
1. एटली की घोषणा (20 फरवरी, 1947)
ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने हाउस ऑफ कॉमन्स में घोषणा की कि ब्रिटिश सरकार 30 जून, 1948 तक सत्ता भारतीयों को हस्तांतरित कर देगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि भारतीय दल आपस में सहमत नहीं होते हैं, तो ब्रिटिश सरकार यह तय करेगी कि सत्ता किसे सौंपी जाए।
2. माउंटबेटन योजना (3 जून, 1947)
सांप्रदायिक दंगों और मुस्लिम लीग की हठधर्मिता के कारण लॉर्ड माउंटबेटन ने विभाजन की योजना पेश की। इस योजना को कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने स्वीकार कर लिया। इसी योजना को वैधानिक रूप देने के लिए ब्रिटिश संसद में भारतीय स्वतंत्रता विधेयक पेश किया गया।
3. विधायी प्रक्रिया की गति
- विधेयक को 4 जुलाई, 1947 को ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत किया गया।
- इसे 18 जुलाई, 1947 को शाही स्वीकृति (Royal Assent) प्राप्त हुई।
- इतनी त्वरित गति ब्रिटिश सरकार की भारत छोड़ने की हड़बड़ाहट और बढ़ते जन-दबाव को दर्शाती है।
अधिनियम की मुख्य धाराएं और प्रावधान
1. दो स्वतंत्र डोमिनियनों की स्थापना
अधिनियम के अनुसार, 15 अगस्त, 1947 को भारत और पाकिस्तान नामक दो स्वतंत्र संप्रभु डोमिनियन स्थापित किए जाने थे। पाकिस्तान में पूर्वी बंगाल, पश्चिमी पंजाब, सिंध, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत (NWFP) और असम का सिलहट जिला शामिल होना था।
2. गवर्नर-जनरल का पद
प्रत्येक डोमिनियन के लिए एक गवर्नर-जनरल होगा, जिसकी नियुक्ति ब्रिटिश सम्राट द्वारा उस डोमिनियन की कैबिनेट की सलाह पर की जाएगी।
- भारत के लिए लॉर्ड माउंटबेटन प्रथम गवर्नर-जनरल बने।
- पाकिस्तान के लिए मोहम्मद अली जिन्ना प्रथम गवर्नर-जनरल बने।
3. संविधान सभाओं की संप्रभुता
दोनों देशों की संविधान सभाओं को अपने-अपने देशों के लिए संविधान बनाने की पूर्ण शक्ति दी गई। वे ब्रिटिश संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून को रद्द कर सकती थीं, जिसमें स्वयं स्वतंत्रता अधिनियम 1947 भी शामिल था।
4. ब्रिटिश संप्रभुता का अंत (Lapse of Paramountcy)
A. रियासतों की स्थिति
ब्रिटिश सर्वोच्चता (Paramountcy) समाप्त कर दी गई। रियासतों को यह विकल्प दिया गया कि वे या तो भारत डोमिनियन में शामिल हों, पाकिस्तान डोमिनियन में शामिल हों या फिर स्वतंत्र रहें।
B. आदिवासी क्षेत्र
आदिवासी क्षेत्रों के साथ किए गए सभी ब्रिटिश समझौते भी 15 अगस्त, 1947 से समाप्त मान लिए गए।
5. भारत सचिव के पद की समाप्ति
सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया (भारत सचिव) का पद समाप्त कर दिया गया और उसकी शक्तियां राष्ट्रमंडल मामलों के सचिव (Secretary of State for Commonwealth Affairs) को हस्तांतरित कर दी गईं।
6. शासन संचालन (1935 के अधिनियम के तहत)
जब तक नए संविधान का निर्माण नहीं हो जाता, तब तक दोनों डोमिनियनों का शासन भारत शासन अधिनियम, 1935 के अनुसार चलाया जाएगा। हालांकि, डोमिनियनों को इस अधिनियम में संशोधन करने का अधिकार दिया गया।
7. ब्रिटिश सम्राट की उपाधि में परिवर्तन
ब्रिटेन के राजा की शाही उपाधि से ‘भारत का सम्राट’ (Emperor of India) शब्द हटा दिया गया।
सीमा निर्धारण और प्रशासनिक विभाजन
1. सीमा आयोग (Boundary Commission)
पंजाब और बंगाल के विभाजन के लिए सर सिरिल रेडक्लिफ की अध्यक्षता में दो सीमा आयोग गठित किए गए। इन आयोगों का कार्य धार्मिक बहुसंख्या के आधार पर भौगोलिक सीमाओं का निर्धारण करना था।
2. लोक सेवाओं की सुरक्षा
जिन सिविल सेवा अधिकारियों की नियुक्ति 15 अगस्त, 1947 से पहले हुई थी, उन्हें वे सभी लाभ और अधिकार प्राप्त होते रहेंगे जो उन्हें पहले मिलते थे। हालांकि, भविष्य की नियुक्तियों पर ब्रिटिश नियंत्रण समाप्त हो गया।
3. सैन्य बलों का विभाजन
भारतीय सेना का भी दोनों देशों के बीच विभाजन किया गया। इसके लिए एक विभाजन परिषद (Partition Council) बनाई गई थी, जिसकी अध्यक्षता लॉर्ड माउंटबेटन ने की थी।
अधिनियम का प्रभाव और आलोचनात्मक विश्लेषण
सकारात्मक पक्ष
- इसने सदियों पुरानी गुलामी की बेड़ियों को तोड़ा और संवैधानिक तरीके से सत्ता का हस्तांतरण सुनिश्चित किया।
- भारत एक पूर्ण संप्रभु राष्ट्र बना, जिसे अपना संविधान बनाने की स्वतंत्रता मिली।
नकारात्मक पक्ष एवं चुनौतियाँ
- विभाजन की त्रासदी: इस अधिनियम ने देश को सांप्रदायिक आधार पर विभाजित किया, जिससे बड़े पैमाने पर हिंसा और विस्थापन हुआ।
- रियासतों की समस्या: रियासतों को स्वतंत्र रहने की छूट देने से भारत की अखंडता को खतरा पैदा हुआ, जिसे बाद में सरदार पटेल ने सुलझाया।
- रेडक्लिफ रेखा की विसंगतियां: सीमाओं का निर्धारण जल्दबाजी में किया गया, जिससे कश्मीर और अन्य सीमावर्ती विवादों ने जन्म लिया।
अंतिम प्रभावी तिथि
14 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि को ब्रिटिश शासन समाप्त हो गया और समस्त शक्तियां दोनों नए डोमिनियनों की संविधान सभाओं को सौंप दी गईं। पाकिस्तान 14 अगस्त को और भारत 15 अगस्त को स्वतंत्र हुआ।
भारत का संवैधानिक विकास ब्रिटिश शासन के दौरान पारित विभिन्न अधिनियमों और सुधारों की एक लंबी और जटिल प्रक्रिया थी। इन अधिनियमों ने भारत में शासन की नींव रखी, जिसमें केंद्रीयकरण से लेकर प्रांतीय स्वायत्तता और सीमित प्रतिनिधित्व से लेकर पूर्ण स्वशासन तक का विकास हुआ। 1857 के विद्रोह के बाद क्राउन का शासन, मॉर्ले-मिंटो सुधारों में पृथक निर्वाचन मंडल, मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों में द्वैध शासन, और भारत सरकार अधिनियम, 1935 में संघीय ढांचा और प्रांतीय स्वायत्तता जैसे प्रावधानों ने भारतीय संवैधानिक इतिहास को आकार दिया। अंततः, भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 ने ब्रिटिश शासन को समाप्त किया और संविधान सभा ने स्वतंत्र भारत के लिए एक व्यापक संविधान का निर्माण किया, जो देश के लोकतांत्रिक और गणतांत्रिक मूल्यों को दर्शाता है।