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संरक्षण प्रयास (Conservation Efforts)

परिचय: संरक्षण की आवश्यकता

भारत की समृद्ध जैव विविधता न केवल एक प्राकृतिक विरासत है, बल्कि यह देश की पारिस्थितिक सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और लाखों लोगों की आजीविका के लिए भी महत्वपूर्ण है। तीव्र जनसंख्या वृद्धि, शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ा है, जिससे वन्यजीवों के आवास नष्ट हो रहे हैं। इन चुनौतियों का सामना करने के लिए भारत ने संरक्षण के लिए एक मजबूत ढाँचा विकसित किया है।

1. संरक्षण के दृष्टिकोण

जैव विविधता के संरक्षण के लिए मुख्य रूप से दो दृष्टिकोण अपनाए जाते हैं:

  • स्व-स्थाने संरक्षण (In-situ Conservation): इसका अर्थ है प्रजातियों का उनके प्राकृतिक आवास में ही संरक्षण करना। यह सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है। इसके तहत राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य और बायोस्फीयर रिजर्व जैसे संरक्षित क्षेत्र स्थापित किए जाते हैं।
  • बाह्य-स्थाने संरक्षण (Ex-situ Conservation): इसका अर्थ है संकटग्रस्त प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवास से बाहर निकालकर एक सुरक्षित और कृत्रिम आवास में संरक्षित करना। इसके तहत चिड़ियाघर, वनस्पति उद्यान, जीन बैंक और बीज बैंक आते हैं।

2. कानूनी और नीतिगत ढाँचा

भारत में संरक्षण प्रयासों को दिशा देने के लिए कई महत्वपूर्ण कानून और नीतियां बनाई गई हैं, जो एक मजबूत कानूनी आधार प्रदान करते हैं:

  • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (Wildlife Protection Act, 1972):
    • यह भारत में वन्यजीव संरक्षण की आधारशिला है। यह पौधों और जानवरों की प्रजातियों को उनके खतरे के स्तर के आधार पर छह अनुसूचियों (Schedules) में वर्गीकृत करता है।
    • अनुसूची I और II की प्रजातियों को उच्चतम स्तर की सुरक्षा प्राप्त है, और इनके शिकार पर कठोर दंड का प्रावधान है (जैसे बाघ, हाथी, हिम तेंदुआ)।
    • यह अधिनियम राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (National Board for Wildlife) और केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (Central Zoo Authority) जैसी वैधानिक संस्थाओं की स्थापना भी करता है।
    • इसने राष्ट्रीय उद्यानों, अभयारण्यों और संरक्षण रिजर्व की घोषणा के लिए कानूनी ढाँचा प्रदान किया।
  • वन संरक्षण अधिनियम, 1980 (Forest Conservation Act, 1980):
    • इसका मुख्य उद्देश्य वनों की कटाई को नियंत्रित करना है।
    • इस कानून के तहत, किसी भी वन भूमि को गैर-वानिकी उद्देश्यों (जैसे खनन, बांध निर्माण, या उद्योग) के लिए उपयोग करने से पहले केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य है।
  • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 (Environment Protection Act, 1986):
    • यह एक “छाता कानून” (Umbrella Act) है जो पर्यावरण संरक्षण के सभी पहलुओं को कवर करता है।
    • यह भोपाल गैस त्रासदी के बाद बनाया गया था और केंद्र सरकार को पर्यावरण की गुणवत्ता की रक्षा और सुधार के लिए नियम बनाने की व्यापक शक्तियाँ प्रदान करता है।
    • इसके तहत वायु, जल और मृदा प्रदूषण के मानक निर्धारित किए गए हैं।
  • जैव विविधता अधिनियम, 2002 (Biological Diversity Act, 2002):
    • यह जैविक विविधता पर कन्वेंशन (CBD) के तहत भारत की प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए बनाया गया था।
    • इसके तीन मुख्य उद्देश्य हैं: (1) जैव विविधता का संरक्षण, (2) इसके घटकों का सतत उपयोग, और (3) जैविक संसाधनों के उपयोग से होने वाले लाभों का उचित और समान बंटवारा (Access and Benefit Sharing – ABS)।
    • इसने एक त्रि-स्तरीय संरचना स्थापित की: राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA), राज्य स्तर पर राज्य जैव विविधता बोर्ड (SBBs), और स्थानीय स्तर पर जैव विविधता प्रबंधन समितियाँ (BMCs)।

3. संरक्षित क्षेत्र नेटवर्क (Protected Area Network)

यह इन-सीटू संरक्षण का आधार है। भारत का संरक्षित क्षेत्र नेटवर्क देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 5% कवर करता है।

  • राष्ट्रीय उद्यान (National Parks): यहाँ संरक्षण का स्तर बहुत ऊँचा होता है। किसी भी मानवीय गतिविधि जैसे चराई, खेती या निजी स्वामित्व की अनुमति नहीं होती है। उदाहरण: जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान (भारत का पहला), काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान।
  • वन्यजीव अभयारण्य (Wildlife Sanctuaries): ये किसी विशेष प्रजाति के संरक्षण के लिए समर्पित होते हैं। यहाँ कुछ मानवीय गतिविधियों की अनुमति दी जा सकती है जो वन्यजीवों को नुकसान न पहुँचाएँ।
  • बायोस्फीयर रिजर्व (Biosphere Reserves): ये यूनेस्को के ‘मैन एंड बायोस्फीयर’ (MAB) कार्यक्रम का हिस्सा हैं। इनका उद्देश्य संरक्षण और सतत विकास के बीच संतुलन बनाना है। एक बायोस्फीयर रिजर्व में तीन क्षेत्र होते हैं: कोर (Core), बफर (Buffer), और संक्रमण (Transition)। भारत में 18 बायोस्फीयर रिजर्व हैं, जैसे नीलगिरी, नंदा देवी, सुंदरबन।
  • संरक्षण और सामुदायिक रिजर्व (Conservation & Community Reserves): ये स्थानीय समुदायों की भागीदारी से संरक्षित किए जाने वाले क्षेत्र हैं।

4. प्रमुख प्रजाति संरक्षण परियोजनाएँ

भारत सरकार ने कुछ प्रमुख संकटग्रस्त प्रजातियों को बचाने के लिए विशेष परियोजनाएँ शुरू की हैं:

  • प्रोजेक्ट टाइगर (Project Tiger, 1973): यह दुनिया की सबसे सफल संरक्षण परियोजनाओं में से एक है, जिसने भारत में बाघों की आबादी को विलुप्त होने से बचाया।
  • प्रोजेक्ट एलीफेंट (Project Elephant, 1992): इसका उद्देश्य एशियाई हाथियों, उनके आवास और गलियारों की रक्षा करना है।
  • मगरमच्छ संरक्षण परियोजना (Crocodile Conservation Project, 1975): इसने घड़ियाल जैसी गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्रजातियों को बचाने में मदद की।
  • अन्य परियोजनाएँ: हिम तेंदुआ परियोजना, गिद्ध संरक्षण परियोजना, और एक सींग वाले गैंडे के लिए ‘इंडियन राइनो विजन 2020’ जैसी कई अन्य परियोजनाएँ भी चल रही हैं।

5. सामुदायिक भागीदारी और आंदोलन

संरक्षण केवल सरकारी प्रयासों से सफल नहीं हो सकता। स्थानीय समुदायों की भागीदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

  • चिपको आंदोलन (1970 का दशक): उत्तराखंड में पेड़ों की कटाई को रोकने के लिए यह एक प्रसिद्ध अहिंसक आंदोलन था, जिसका नेतृत्व महिलाओं ने किया।
  • संयुक्त वन प्रबंधन (Joint Forest Management – JFM): 1980 के दशक में शुरू की गई यह एक अवधारणा है जिसमें स्थानीय समुदाय और वन विभाग मिलकर खराब हो चुके वनों का प्रबंधन और संरक्षण करते हैं।
  • पवित्र उपवन (Sacred Groves): ये देश के विभिन्न हिस्सों में देवी-देवताओं को समर्पित जंगल के टुकड़े हैं, जिन्हें स्थानीय समुदाय धार्मिक मान्यताओं के कारण संरक्षित करते हैं।
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