1. परिचय: जल प्रदूषण क्या है?
जल प्रदूषण (Water Pollution) तब होता है जब हानिकारक पदार्थ – जैसे रसायन या सूक्ष्मजीव – किसी जल निकाय जैसे नदी, झील, महासागर या भूजल को दूषित कर देते हैं, जिससे पानी की गुणवत्ता कम हो जाती है और यह मनुष्यों और पर्यावरण के लिए विषाक्त हो जाता है। यह एक गंभीर पर्यावरणीय मुद्दा है जो मानव स्वास्थ्य, जलीय पारिस्थितिक तंत्र और आर्थिक विकास को प्रभावित करता है।
2. जल प्रदूषण के स्रोत (Sources of Water Pollution)
प्रदूषण के स्रोतों को दो मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है:
A. बिंदु स्रोत (Point Sources)
यह प्रदूषण का कोई भी एकल, पहचाना जा सकने वाला स्रोत है जहाँ से प्रदूषक एक विशिष्ट स्थान से जल निकाय में छोड़े जाते हैं। इनका पता लगाना और नियंत्रित करना आसान होता है।
उदाहरण: कारखानों से निकलने वाला पाइप, तेल टैंकर से रिसाव, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का आउटलेट।
B. गैर-बिंदु स्रोत (Non-point Sources)
यह प्रदूषण एक बड़े क्षेत्र से आता है और किसी एक प्रवेश बिंदु से नहीं होता है। यह अक्सर वर्षा या बर्फ के पिघलने के कारण होता है जो जमीन पर मौजूद प्रदूषकों को अपने साथ बहाकर जल निकायों में ले जाता है। इसे नियंत्रित करना बहुत मुश्किल है।
उदाहरण: कृषि क्षेत्रों से उर्वरकों और कीटनाशकों का अपवाह, शहरी क्षेत्रों से तूफानी जल अपवाह, निर्माण स्थलों से तलछट।
3. जल गुणवत्ता के प्रमुख संकेतक और प्रभाव
ये अवधारणाएँ जल प्रदूषण के प्रभाव को मापने और समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं (मेन्स परीक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण)।
A. बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD)
यह जैविक रूप से अपघटित होने वाले कार्बनिक पदार्थों को तोड़ने के लिए सूक्ष्मजीवों (जैसे बैक्टीरिया) द्वारा आवश्यक घुलित ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen – DO) की मात्रा है। उच्च BOD का अर्थ है पानी में अधिक कार्बनिक प्रदूषण है, जिससे जलीय जीवन के लिए उपलब्ध ऑक्सीजन कम हो जाती है।
B. केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (COD)
यह पानी में मौजूद सभी कार्बनिक पदार्थों (जैविक और अजैविक दोनों) को ऑक्सीकृत करने के लिए आवश्यक ऑक्सीजन की कुल मात्रा है। COD का मान आमतौर पर BOD से अधिक होता है।
C. सुपोषण (Eutrophication)
यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें जल निकाय पोषक तत्वों, विशेष रूप से नाइट्रोजन और फास्फोरस, से अत्यधिक समृद्ध हो जाता है। यह मुख्य रूप से उर्वरक अपवाह और सीवेज के कारण होता है। इससे शैवाल प्रस्फुटन (Algal Blooms) होता है। जब ये शैवाल मर जाते हैं, तो उनके अपघटन की प्रक्रिया पानी में मौजूद अधिकांश घुलित ऑक्सीजन का उपभोग कर लेती है, जिससे एक हाइपोक्सिक (कम ऑक्सीजन) या एनोक्सिक (शून्य ऑक्सीजन) क्षेत्र बन जाता है, जिसे “डेड ज़ोन” (Dead Zone) कहा जाता है, जहाँ मछलियाँ और अन्य जलीय जीव मर जाते हैं।
D. जैव आवर्धन (Biomagnification)
यह खाद्य श्रृंखला में ऊपर की ओर बढ़ते हुए प्रत्येक पोषण स्तर पर कुछ अविघटनीय (non-degradable) विषाक्त पदार्थों (जैसे पारा, DDT, भारी धातु) की सांद्रता में वृद्धि की प्रक्रिया है। निम्न स्तर के जीव इन विषाक्त पदार्थों को ग्रहण करते हैं, और जब उन्हें उच्च स्तर के जीव खाते हैं, तो ये विषाक्त पदार्थ उनके ऊतकों में जमा हो जाते हैं। खाद्य श्रृंखला के शीर्ष पर मौजूद जीवों (जैसे बड़ी मछली, पक्षी, मनुष्य) में इन विषाक्त पदार्थों की सांद्रता सबसे अधिक होती है, जो गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती है।
4. भारत में जल गुणवत्ता की प्रमुख चुनौतियाँ
- नदी प्रदूषण: अनुपचारित सीवेज और औद्योगिक अपशिष्टों के निर्वहन के कारण गंगा और यमुना जैसी प्रमुख नदियाँ गंभीर रूप से प्रदूषित हैं।
- भूजल संदूषण: कई राज्यों में भूजल प्राकृतिक रूप से आर्सेनिक और फ्लोराइड से दूषित है। इसके अलावा, कृषि और औद्योगिक रसायनों का रिसाव भी भूजल की गुणवत्ता को खराब कर रहा है।
- शहरी जल निकाय: अधिकांश भारतीय शहरों में झीलें और तालाब अतिक्रमण, सीवेज और ठोस अपशिष्ट डंपिंग के कारण लगभग मृत हो चुके हैं।
- धार्मिक गतिविधियाँ: मूर्तियों का विसर्जन और पूजा सामग्री का नदियों में विसर्जन भी प्रदूषण का एक स्रोत है, जिसमें भारी धातुएँ और प्लास्टर ऑफ पेरिस शामिल हैं।