1. परिचय: एक भू-राजनीतिक हॉटस्पॉट
दक्षिण चीन सागर (South China Sea) पश्चिमी प्रशांत महासागर का एक सीमांत सागर (Marginal Sea) है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण और साथ ही सबसे विवादित समुद्री क्षेत्रों में से एक है। इसका महत्व इसके व्यस्त शिपिंग मार्गों, समृद्ध मत्स्य पालन क्षेत्रों और अनुमानित विशाल तेल और गैस भंडारों के कारण है। इन संसाधनों पर नियंत्रण को लेकर कई देशों के बीच अतिव्यापी क्षेत्रीय दावे (overlapping territorial claims) हैं, जिससे यह एक प्रमुख भू-राजनीतिक हॉटस्पॉट बन गया है।
2. भौगोलिक स्थिति और महत्व
- सीमाएँ: यह दक्षिण-पूर्व एशिया में स्थित है, जिसके तट पर चीन, ताइवान, फिलीपींस, मलेशिया, ब्रुनेई, इंडोनेशिया और वियतनाम हैं।
- प्रमुख जुड़ाव: यह मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) के माध्यम से हिंद महासागर से और ताइवान जलडमरूमध्य (Taiwan Strait) के माध्यम से पूर्वी चीन सागर से जुड़ता है।
- आर्थिक महत्व: वैश्विक शिपिंग व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा इस सागर से होकर गुजरता है। यह दुनिया के सबसे समृद्ध मछली पकड़ने वाले क्षेत्रों में से एक है और माना जाता है कि यहाँ तेल और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार हैं।
- प्रमुख द्वीपसमूह: विवाद का केंद्र यहाँ स्थित सैकड़ों छोटे द्वीप, चट्टानें और एटोल हैं, जिन्हें मुख्य रूप से पार्सल द्वीप (Paracel Islands) और स्प्रैटली द्वीप (Spratly Islands) के रूप में समूहीकृत किया गया है।
3. दक्षिण चीन सागर विवाद
विवाद का मूल विभिन्न देशों द्वारा समुद्री क्षेत्र और द्वीपों पर किए गए अतिव्यापी दावे हैं।
A. दावेदार देश (Claimant Countries)
इस विवाद में मुख्य रूप से चीन, वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान शामिल हैं। प्रत्येक देश विभिन्न द्वीपों और समुद्री क्षेत्रों पर अपनी संप्रभुता का दावा करता है।
B. चीन का ‘नाइन-डैश लाइन’ का दावा (China’s ‘Nine-Dash Line’ Claim)
चीन का दावा सबसे व्यापक है। यह “नाइन-डैश लाइन” नामक एक अस्पष्ट सीमा के आधार पर दक्षिण चीन सागर के लगभग 90% हिस्से पर “ऐतिहासिक अधिकारों” का दावा करता है। यह दावा अन्य देशों के अनन्य आर्थिक क्षेत्रों (EEZ) का अतिक्रमण करता है, जैसा कि UNCLOS द्वारा परिभाषित किया गया है।
C. अंतर्राष्ट्रीय कानून और 2016 का न्यायाधिकरण का फैसला
समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCLOS) समुद्री क्षेत्रों को परिभाषित करने के लिए कानूनी ढाँचा प्रदान करता है। 2016 में, फिलीपींस द्वारा लाए गए एक मामले में, हेग में स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (Permanent Court of Arbitration) ने फैसला सुनाया कि चीन के “नाइन-डैश लाइन” के दावे का कोई कानूनी आधार नहीं है। हालांकि, चीन ने इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया है।
D. चीन की गतिविधियाँ और सैन्यीकरण
चीन इस क्षेत्र में आक्रामक रूप से अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है। इसमें कृत्रिम द्वीपों का निर्माण, उन पर सैन्य सुविधाओं (जैसे हवाई पट्टी और रडार स्टेशन) की तैनाती, और अन्य देशों के मछली पकड़ने और तेल अन्वेषण गतिविधियों में बाधा डालना शामिल है।
4. बाहरी शक्तियों और भारत की भूमिका
- संयुक्त राज्य अमेरिका: अमेरिका इस विवाद में सीधे तौर पर पक्षकार नहीं है, लेकिन वह इस क्षेत्र में नौवहन की स्वतंत्रता (Freedom of Navigation) सुनिश्चित करने पर जोर देता है और इसके लिए नौवहन की स्वतंत्रता अभियान (FONOPs) आयोजित करता है, जो चीन के दावों को चुनौती देता है।
- आसियान (ASEAN): दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्रों का संगठन (आसियान) इस मुद्दे पर विभाजित है और चीन के साथ एक आचार संहिता (Code of Conduct) पर बातचीत करने का प्रयास कर रहा है, लेकिन इसमें बहुत कम प्रगति हुई है।
- भारत का रुख: भारत का रुख स्पष्ट और सुसंगत रहा है। भारत अंतर्राष्ट्रीय कानून, विशेष रूप से UNCLOS का पालन करने का आह्वान करता है। वह नौवहन और ओवरफ्लाइट की स्वतंत्रता का समर्थन करता है और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान की वकालत करता है। भारत के व्यापार का एक बड़ा हिस्सा इस क्षेत्र से होकर गुजरता है, इसलिए यहाँ स्थिरता बनाए रखना भारत के आर्थिक और रणनीतिक हितों के लिए महत्वपूर्ण है।