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भारत में बाढ़ के कारण, प्रभाव, वितरण और आपदा प्रबंधन रणनीति (NDMA दिशानिर्देश)

बाढ़ एक ऐसी स्थिति है जिसमें पानी का प्रवाह इतना अधिक हो जाता है कि वह सामान्य तटबंधों को पार कर आस-पास के भूमि क्षेत्रों को जलमग्न कर देता है। यह भारत में सबसे आम और विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं में से एक है। यद्यपि बाढ़ एक प्राकृतिक घटना है, लेकिन मानवीय गतिविधियों ने इसकी आवृत्ति और तीव्रता को बढ़ा दिया है।
Map of Flood Prone Areas in India Placeholder

चित्र: भारत के प्रमुख बाढ़ प्रवण क्षेत्र (जल्द ही अपलोड किया जाएगा)

परीक्षा की दृष्टि से त्वरित तथ्य
  • प्रवण क्षेत्र: राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार, देश का लगभग 40 मिलियन हेक्टेयर भूमि क्षेत्र बाढ़ प्रवण है।
  • सर्वाधिक प्रभावित बेसिन: गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन।
  • नोडल एजेंसी: बाढ़ पूर्वानुमान के लिए केंद्रीय जल आयोग जिम्मेदार है, जबकि प्रबंधन की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है।
  • शहरी बाढ़: यह अनियोजित शहरीकरण के कारण एक उभरती हुई चुनौती है।

बाढ़ के कारण

बाढ़ के कारणों को व्यापक रूप से प्राकृतिक और मानव जनित श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

1. प्राकृतिक कारण

  • भारी वर्षा: कम समय में अत्यधिक बारिश, विशेषकर मानसून के दौरान।
  • नदी के मार्ग में परिवर्तन: नदियाँ, विशेषकर कोसी जैसी हिमालयी नदियाँ, अक्सर अपना मार्ग बदलती हैं जिससे नए क्षेत्रों में बाढ़ आती है।
  • गाद जमा होना: नदी की तली में अवसाद जमा होने से नदी की जल धारण क्षमता कम हो जाती है।
  • बादल फटना: पहाड़ी क्षेत्रों में अचानक मूसलाधार बारिश।

2. मानव जनित कारण

  • वनों की कटाई: वन वर्षा जल के प्रवाह को धीमा करते हैं; उनकी कटाई से पानी तेजी से नदियों में पहुँचता है।
  • अनियोजित शहरीकरण: प्राकृतिक जल निकासी मार्गों पर निर्माण, जिससे पानी को निकलने का रास्ता नहीं मिलता। इसे शहरी बाढ़ कहा जाता है।
  • तटबंधों का टूटना: खराब रखरखाव वाले बांधों या तटबंधों का अचानक टूटना।

भारत में बाढ़ का वितरण

  • ब्रह्मपुत्र घाटी: यह क्षेत्र भूकंपीय रूप से अस्थिर है और यहाँ भारी वर्षा होती है, जिससे यह सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में से एक है।
  • गंगा का मैदान: उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के मैदानी इलाके जहाँ नदियाँ उफान पर होती हैं।
  • उत्तर-पश्चिम भारत: हाल के वर्षों में राजस्थान और पंजाब जैसे शुष्क क्षेत्रों में भी फ्लैश फ्लड की घटनाएं बढ़ी हैं।
  • मध्य भारत और दक्कन: नर्मदा, गोदावरी और ताप्ती नदियाँ मानसून के दौरान अपने किनारों को तोड़ सकती हैं।

बाढ़ प्रबंधन और नियंत्रण

आपदा प्रबंधन के दृष्टिकोण से, बाढ़ नियंत्रण के उपायों को दो भागों में बाँटा जा सकता है:

1. संरचनात्मक उपाय

  • जलाशय और बांध: अतिरिक्त पानी को रोकने के लिए।
  • तटबंध: नदी के पानी को रिहायशी इलाकों में जाने से रोकने के लिए दीवारें।
  • ड्रेजिंग: नदियों की गहराई बढ़ाने के लिए गाद निकालना।
  • नदी जोड़ो परियोजना: पानी की अधिकता वाले बेसिन से कमी वाले बेसिन में पानी स्थानांतरित करना।

2. गैर-संरचनात्मक उपाय

  • बाढ़ पूर्वानुमान: समय रहते चेतावनी जारी करना। केंद्रीय जल आयोग का नेटवर्क इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • बाढ़ मैदानों का जोनिंग: बाढ़ के खतरे वाले क्षेत्रों में निर्माण और मानवीय गतिविधियों को विनियमित करना।
  • आपदा राहत और पुनर्वास: प्रभावित लोगों के लिए भोजन, आश्रय और चिकित्सा सहायता की योजना।

आगे की राह

जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा के पैटर्न में बदलाव आ रहा है, जिससे बाढ़ की भविष्यवाणी करना कठिन हो गया है। इसलिए, एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन और सामुदायिक भागीदारी पर जोर देने की आवश्यकता है। स्पंज सिटी जैसी अवधारणाओं को अपनाकर शहरी बाढ़ की समस्या को कम किया जा सकता है।
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