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प्रागैतिहासिक काल-Prehistoric Age

उत्तराखंड का प्रागैतिहासिक काल मानव सभ्यता के शुरुआती चरणों का प्रतिनिधित्व करता है, जब लिखित अभिलेख अनुपलब्ध थे। इस अवधि का अध्ययन पुरातात्विक उत्खनन और खोजों पर आधारित है, जो मानव निवास और उनकी सांस्कृतिक गतिविधियों के महत्वपूर्ण प्रमाण प्रदान करते हैं।

1. प्रागैतिहासिक काल का अर्थ और महत्व (Meaning and Importance of Prehistoric Age)

प्रागैतिहासिक काल वह अवधि है जिसके बारे में कोई लिखित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। उत्तराखंड में इसके प्रमाण विभिन्न पुरातात्विक खोजों से मिलते हैं।

1.1. प्रागैतिहासिक काल की परिभाषा

  • मानव इतिहास का वह काल जिसके बारे में कोई लिखित साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। इसका अध्ययन केवल पुरातात्विक उत्खननों से प्राप्त औजारों, बर्तनों, शैलचित्रों आदि के आधार पर किया जाता है।
  • उत्तराखंड में प्रागैतिहासिक काल के साक्ष्य पाषाण युग (Paleolithic, Mesolithic, Neolithic) से संबंधित हैं।

1.2. अध्ययन का महत्व

  • यह उत्तराखंड में मानव निवास के प्राचीनतम प्रमाण प्रदान करता है।
  • यह इस क्षेत्र की सांस्कृतिक निरंतरता और मानव विकास को समझने में मदद करता है।

2. प्रमुख प्रागैतिहासिक स्थल (Major Prehistoric Sites)

उत्तराखंड में कई स्थानों पर प्रागैतिहासिक मानव बस्तियों और कला के महत्वपूर्ण अवशेष मिले हैं।

2.1. लाखू उड्यार (Lakhudiyar)

  • स्थान: अल्मोड़ा जिले में सुयाल नदी के तट पर स्थित।
  • खोज: इसकी खोज डॉ. महेश्वर प्रसाद जोशी ने 1968 में की थी।
  • विशेषताएँ:
    • यहाँ मानव और पशुओं के सामूहिक नृत्य करते हुए शैलचित्र मिले हैं।
    • रंग: काले, लाल और सफेद रंगों का प्रयोग।
    • चित्रों में मानव आकृतियाँ, पशु (जैसे भेड़, बारहसिंगा, लोमड़ी) और ज्यामितीय आकृतियाँ शामिल हैं।

2.2. किमनी गाँव (Kimini Village)

  • स्थान: चमोली जिले में थराली के पास स्थित।
  • विशेषताएँ:
    • यहां हल्के सफेद रंग के कुछ शैलचित्र मिले हैं।
    • चित्रों में हथियार और पशुओं के चित्र प्रमुख हैं।

2.3. गोरखिया उड्यार (Gorkhiya Udyar)

  • स्थान: चमोली जिले में डुंगरी गाँव के पास, अलकनंदा नदी के तट पर।
  • खोज: इसकी खोज 1985 में हुई थी।
  • विशेषताएँ:
    • यहाँ मानव आकृतियाँ, पशुओं के चित्र और हाथों के निशान मिले हैं।
    • ये चित्र मुख्यतः लाल और गुलाबी रंगों में हैं।
    • चित्रों में मानवों को त्रिशूलनुमा आकृति में दिखाया गया है, जो किसी धार्मिक या अनुष्ठानिक गतिविधि का संकेत हो सकता है।

2.4. फड़का नौली (Pharkanaloi)

  • स्थान: अल्मोड़ा जिले में स्थित।
  • खोज: इसकी खोज 1989 में यशोधर मठपाल द्वारा की गई थी।
  • विशेषताएँ:
    • यहाँ मानव आकृतियों के शैलचित्र मिले हैं।
    • इन चित्रों में विभिन्न मानव गतिविधियों का चित्रण है।

2.5. हुडली (Hudali)

  • स्थान: उत्तरकाशी जिले में स्थित।
  • विशेषताएँ:
    • यहाँ से नीले रंग के शैलचित्र मिले हैं।
    • ये चित्र मानव गतिविधियों और वन्यजीवों को दर्शाते हैं।

2.6. पेटशाल (Petshal)

  • स्थान: अल्मोड़ा जिले में स्थित।
  • खोज: इसकी खोज भी यशोधर मठपाल द्वारा की गई थी।
  • विशेषताएँ:
    • यहाँ से लाल रंग के शैलचित्र मिले हैं।
    • चित्रों में मानव आकृतियाँ, पशुओं के चित्र और सामूहिक नृत्य के दृश्य शामिल हैं।

2.7. वनकोट (Banakot)

  • स्थान: पिथौरागढ़ जिले में स्थित।
  • विशेषताएँ:
    • यहाँ से आठ ताम्र मानवाकृतियाँ प्राप्त हुई हैं, जो इस क्षेत्र में धातु युग की उपस्थिति का संकेत देती हैं।
गोपेश्वर (चमोली) और दूनी (नैनीताल) जैसे स्थानों से भी पाषाणकालीन औजारों और बर्तनों के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो उत्तराखंड में प्रागैतिहासिक मानवों की उपस्थिति की पुष्टि करते हैं।

3. प्रागैतिहासिक काल के चरण (Phases of Prehistoric Age)

उत्तराखंड में प्रागैतिहासिक काल को मुख्य रूप से पाषाण युग के विभिन्न चरणों में बांटा जा सकता है।

  • पुरापाषाण काल (Paleolithic Age):
    • उत्तराखंड में इस काल के साक्ष्य अपेक्षाकृत कम हैं, लेकिन कुछ स्थानों से प्राप्त पत्थर के औजार इस बात का संकेत देते हैं।
    • मानव शिकारी-संग्राहक के रूप में रहता था।
  • मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age):
    • इस काल के साक्ष्य अधिक व्यापक हैं, विशेषकर शैलचित्रों के रूप में।
    • औजारों का आकार छोटा हुआ (माइक्रोलिथ्स)।
  • नवपाषाण काल (Neolithic Age):
    • इस काल के दौरान कृषि और पशुपालन की शुरुआत के प्रमाण मिले हैं।
    • लाखू उड्यार और अन्य स्थलों से प्राप्त शैलचित्रों में सामूहिक जीवन और अनुष्ठानों का चित्रण इस अवधि की सांस्कृतिक गतिविधियों का संकेत देता है।
  • ताम्र पाषाण काल (Chalcolithic Age):
    • वनकोट (पिथौरागढ़) से प्राप्त ताम्र मानवाकृतियाँ इस काल की उपस्थिति को दर्शाती हैं, जब मानव ने पत्थर के साथ-साथ तांबे का भी उपयोग करना शुरू कर दिया था।

4. निष्कर्ष (Conclusion)

उत्तराखंड में प्रागैतिहासिक काल के अवशेष हमें इस क्षेत्र में मानव निवास और उनकी शुरुआती सांस्कृतिक गतिविधियों की एक झलक प्रदान करते हैं। लाखू उड्यार, गोरखिया उड्यार जैसे शैलचित्र स्थल और विभिन्न स्थानों से प्राप्त पाषाण व ताम्र औजार इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही मानव सभ्यता का एक सक्रिय केंद्र रहा है। ये खोजें उत्तराखंड के समृद्ध ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व को रेखांकित करती हैं।

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