उत्तराखंड के सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक विकास में विभिन्न संगठनों ने ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन संगठनों ने न केवल जन चेतना जागृत की, बल्कि विभिन्न आंदोलनों को दिशा दी और राज्य की नीतियों को भी प्रभावित किया।
कुछ त्वरित तथ्य (Quick Facts):
- डिबेटिंग क्लब, अल्मोड़ा (1870) को उत्तराखंड में राजनीतिक चेतना का प्रारंभिक मंच माना जाता है।
- कुमाऊँ परिषद् (1916) ने स्वतंत्रता संग्राम और स्थानीय मुद्दों को उठाने में अग्रणी भूमिका निभाई।
- गढ़वाल यूनियन (1901) और गढ़वाल हितकारिणी सभा ने गढ़वाल क्षेत्र में सामाजिक और राजनीतिक जागृति का कार्य किया।
- पृथक उत्तराखंड राज्य आंदोलन में उत्तराखण्ड क्रांति दल (उक्रांद) (1979) की भूमिका केंद्रीय रही।
- पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में दशोली ग्राम स्वराज्य मंडल जैसे संगठनों का योगदान विश्व प्रसिद्ध है।
1. सामाजिक एवं सुधार संगठन (Social and Reform Organizations)
- डिबेटिंग क्लब (Debating Club):
- स्थापना: 1870
- स्थान: अल्मोड़ा
- संस्थापक/प्रेरक: पं. बुद्धिबल्लभ पंत (सलाह पर), संरक्षक: भीम सिंह
- उद्देश्य: राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षिक मुद्दों पर चर्चा करना, जन चेतना जागृत करना। अल्मोड़ा अखबार का प्रकाशन इसी क्लब की देन है।
- आर्य समाज (Arya Samaj):
- स्थापना (उत्तराखंड में): 19वीं सदी के अंत में (देहरादून में 1879 में शाखा स्थापित)
- संस्थापक (मूल): स्वामी दयानंद सरस्वती
- उद्देश्य: सामाजिक कुरीतियों का विरोध, शिक्षा का प्रसार, वैदिक धर्म का प्रचार। देहरादून में राजनीतिक चेतना जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका।
- हैप्पी क्लब (Happy Club):
- स्थापना: 1903
- स्थान: अल्मोड़ा
- संस्थापक: पं. गोविंद बल्लभ पंत, हरगोविंद पंत आदि के प्रयासों से।
- उद्देश्य: नवयुवकों में राजनीतिक और सामाजिक चेतना जागृत करना।
- सरोला सभा (Sarola Sabha):
- स्थापना: 1904
- स्थान: टिहरी गढ़वाल
- संस्थापक: तारादत्त गैरोला
- उद्देश्य: ब्राह्मणों में सामाजिक सुधार और एकता स्थापित करना। यह गढ़वाल क्षेत्र की प्रथम जाति आधारित संस्था थी।
- टम्टा सुधार सभा (Tamta Sudhar Sabha) / शिल्पकार सुधारिणी सभा:
- स्थापना: 1905 (टम्टा सुधार सभा), 1931 (कुमाऊँ शिल्पकार सुधारिणी सभा, अल्मोड़ा)
- संस्थापक/प्रेरक: हरिप्रसाद टम्टा, मुंशी हरिप्रसाद आदि।
- उद्देश्य: दलितों (शिल्पकारों) के सामाजिक उत्थान, शिक्षा और अधिकारों के लिए संघर्ष करना।
- गढ़वाल भ्रातृमंडल (Garhwal Bhratri Mandal):
- स्थापना: 1907
- स्थान: लखनऊ
- संस्थापक: मथुरा प्रसाद नैथानी
- उद्देश्य: गढ़वालियों के हितों की रक्षा और सामाजिक एकता। प्रथम बैठक 1908 में कोटद्वार में कुलानंद बड़थ्वाल की अध्यक्षता में।
- शुद्ध साहित्य समिति (Shuddha Sahitya Samiti):
- स्थापना: 1913
- स्थान: अल्मोड़ा
- संस्थापक: स्वामी सत्यदेव परिव्राजक
- उद्देश्य: साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देना।
2. राजनीतिक संगठन एवं पृथक राज्य आंदोलन से संबंधित संगठन
- कुमाऊँ परिषद् (Kumaon Parishad):
- स्थापना: 30 सितंबर 1916
- स्थान: मझेड़ा (अल्मोड़ा) में राय बहादुर नारायण दत्त छिपाल की अध्यक्षता में बैठक, नैनीताल में स्थापना।
- संस्थापक सदस्य: हरगोविंद पंत, गोविंद बल्लभ पंत, बद्री दत्त पांडे, प्रेम बल्लभ पांडे, इंद्रलाल शाह, मोहन सिंह आदि।
- उद्देश्य: प्रारंभ में सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक समस्याओं का समाधान, बाद में स्वतंत्रता आंदोलन और कुली बेगार प्रथा के उन्मूलन में सक्रिय भूमिका। 1926 में कांग्रेस में विलय।
- गढ़वाल यूनियन (Garhwal Union) / गढ़वाल हितकारिणी सभा:
- स्थापना: अगस्त 1901
- प्रेरक: तारादत्त गैरोला
- उद्देश्य: गढ़वाल क्षेत्र में सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक चेतना का प्रसार करना।
- कांग्रेस कमेटी (Congress Committee):
- कुमाऊँ में स्थापना: 1912 (अल्मोड़ा में, ज्वालादत्त जोशी, सदानंद सनवाल आदि के प्रयासों से)
- गढ़वाल में स्थापना: 1918 (बैरिस्टर मुकुन्दी लाल, अनुसूया प्रसाद बहुगुणा के प्रयासों से)
- गढदेश सेवा संघ (Garhdesh Seva Sangh):
- स्थापना: 1938
- स्थान: दिल्ली
- संस्थापक: श्रीदेव सुमन
- उद्देश्य: पृथक राज्य की मांग और टिहरी रियासत में राजशाही के विरुद्ध संघर्ष। बाद में इसका नाम हिमालय सेवा संघ कर दिया गया।
- पर्वतीय विकास जन समिति (Parvatiya Vikas Jan Samiti):
- स्थापना: 1950
- उद्देश्य: हिमाचल और उत्तरांचल को मिलाकर एक वृहद् हिमालयी राज्य बनाने की मांग।
- पर्वतीय राज्य परिषद् (Parvatiya Rajya Parishad):
- स्थापना: 24-25 जून 1967
- स्थान: रामनगर
- अध्यक्ष: दया कृष्ण पांडे
- उद्देश्य: पृथक पर्वतीय राज्य की मांग को संगठित करना।
- कुमाऊँ राष्ट्रीय मोर्चा (Kumaon Rashtriya Morcha):
- स्थापना: 1970
- संस्थापक: पी.सी. जोशी (कम्युनिस्ट पार्टी)
- उद्देश्य: पृथक राज्य की मांग।
- उत्तरांचल परिषद् (Uttaranchal Parishad):
- स्थापना: 1972
- स्थान: नैनीताल
- उद्देश्य: पृथक राज्य की मांग, 1973 में ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया।
- उत्तराखण्ड क्रांति दल (उक्रांद) (Uttarakhand Kranti Dal – UKD):
- स्थापना: 24-25 जुलाई 1979
- स्थान: मसूरी (पर्वतीय जन विकास सम्मेलन में)
- प्रथम अध्यक्ष: डॉ. देवी दत्त पंत (कुमाऊँ विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति)
- उद्देश्य: 8 पर्वतीय जिलों को मिलाकर पृथक उत्तराखंड राज्य का गठन। इसने पृथक राज्य आंदोलन में केंद्रीय भूमिका निभाई।
- उत्तरांचल उत्थान परिषद् (Uttaranchal Utthan Parishad):
- स्थापना: 1988
- अध्यक्ष: शोबन सिंह जीना
- उद्देश्य: उत्तराखंड के विकास और पृथक राज्य की मांग।
- उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति (Uttarakhand Sanyukt Sangharsh Samiti):
- स्थापना: 1989
- संस्थापक: द्वारिका प्रसाद उनियाल
- उद्देश्य: पृथक राज्य के लिए सभी संगठनों को एक मंच पर लाना।
- उत्तराखंड मुक्ति मोर्चा (Uttarakhand Mukti Morcha):
- स्थापना: 1991
- उद्देश्य: पृथक राज्य की मांग।
- संयुक्त उत्तराखंड राज्य मोर्चा (Samyukt Uttarakhand Rajya Morcha):
- स्थापना: अप्रैल 1994
- संस्थापक: बहादुर राम टम्टा
- उद्देश्य: पृथक राज्य की मांग।
- उत्तराखंड पीपुल्स फ्रंट (Uttarakhand People’s Front – UPF):
- स्थापना: अप्रैल 1994
- उद्देश्य: पृथक राज्य की मांग।
3. पर्यावरण संरक्षण संगठन (Environmental Conservation Organizations)
- दशोली ग्राम स्वराज्य मंडल/संघ (Dasholi Gram Swarajya Mandal/Sangh):
- स्थापना: 1964
- स्थान: गोपेश्वर, चमोली
- संस्थापक: चंडी प्रसाद भट्ट
- उद्देश्य: ग्राम स्वराज्य, पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय संसाधनों पर आधारित रोजगार। चिपको आंदोलन की शुरुआत में इस संगठन की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
- चिपको आंदोलन से जुड़े संगठन (Organizations associated with Chipko Movement):
- चिपको आंदोलन (1973-74 में रैणी गाँव, चमोली से व्यापक शुरुआत) कोई एक औपचारिक संगठन नहीं था, बल्कि यह एक जन आंदोलन था जिसमें विभिन्न स्थानीय समूह और व्यक्ति शामिल थे। गौरा देवी, सुंदरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट इसके प्रमुख प्रणेता रहे।
- पाणी राखो आंदोलन से संबंधित समूह:
- प्रारंभ: 1980 का दशक
- स्थान: उफरैंखाल, पौड़ी गढ़वाल
- प्रेरक: सच्चिदानंद भारती
- उद्देश्य: जल संरक्षण और पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन।
- रक्षा सूत्र आंदोलन से संबंधित समूह:
- प्रारंभ: 1994
- स्थान: भिलंगना घाटी, टिहरी
- प्रेरक: सुरेश भाई
- उद्देश्य: पेड़ों की कटाई को रोकने के लिए पेड़ों पर रक्षा सूत्र बांधना।
4. अन्य महत्वपूर्ण संगठन
- कुली एजेंसी (Kuli Agency):
- स्थापना: 1908
- संस्थापक: जोध सिंह नेगी
- मुख्यालय: पौड़ी
- उद्देश्य: कुली बेगार प्रथा के विकल्प के रूप में कुलियों की व्यवस्था करना। (ट्रांसपोर्ट एंड पावर सप्लाई को-ऑपरेटिव एसोसिएशन)
- अमन सभा (Aman Sabha):
- स्थापना: नवंबर 1930
- स्थान: लैंसडाउन
- उद्देश्य: राष्ट्रवादी आंदोलनों का विरोध करना और ब्रिटिश शासन का समर्थन करना।
- बाल सभा (Bal Sabha):
- स्थापना: मार्च 1935
- स्थान: उनियाल गाँव, सकलाना पट्टी, टिहरी
- संस्थापक: सत्यप्रसाद रतूड़ी
- उद्देश्य: छात्रों में देशभक्ति की भावना का विकास करना।
- टिहरी राज्य प्रजामंडल (Tehri Rajya Prajamandal):
- स्थापना: 23 जनवरी 1939
- स्थान: देहरादून (चक्कूवाला मोहल्ला, श्याम चंद्र नेगी के मकान में)
- संस्थापक सदस्य: श्रीदेव सुमन (मंत्री), गोविंद राम भट्ट, तोता राम गैरोला, महिमानंद डोभाल, श्यामचंद नेगी आदि।
- उद्देश्य: टिहरी रियासत में उत्तरदायी शासन की स्थापना और राजशाही के विरुद्ध संघर्ष।
उत्तराखंड के नवीन प्रमुख संगठन
कुछ त्वरित तथ्य (Quick Facts):
- राज्य के विकास में पर्यटन, उद्योग, अनुसंधान, और संस्कृति से संबंधित संगठनों का विशेष महत्व है।
- उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद (UTDB) राज्य में पर्यटन को बढ़ावा देने वाली शीर्ष संस्था है।
- गढ़वाल मंडल विकास निगम (GMVN) और कुमाऊँ मंडल विकास निगम (KMVN) पर्यटन और क्षेत्रीय विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- वन अनुसंधान संस्थान (FRI) और भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (IIP) जैसे राष्ट्रीय स्तर के शोध संस्थान देहरादून में स्थित हैं।
- सांस्कृतिक विकास के लिए भी विभिन्न अकादमियाँ और संस्थान कार्यरत हैं।
1. पर्यटन एवं क्षेत्रीय विकास संगठन
- उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद (UTDB – Uttarakhand Tourism Development Board):
- स्थापना: 2001 (उत्तरांचल पर्यटन विकास बोर्ड के रूप में, बाद में पुनर्गठित)
- मुख्यालय: देहरादून
- उद्देश्य: राज्य में पर्यटन का विकास, प्रचार-प्रसार, पर्यटन संबंधी नीतियों का निर्माण और क्रियान्वयन, पर्यटन स्थलों का रखरखाव और विकास।
- प्रमुख कार्य: पर्यटन योजनाओं का संचालन, मार्केटिंग और प्रमोशन, पर्यटन बुनियादी ढांचे का विकास, निवेशकों को आकर्षित करना।
- गढ़वाल मंडल विकास निगम (GMVN – Garhwal Mandal Vikas Nigam):
- स्थापना: 31 मार्च 1976
- मुख्यालय: देहरादून
- उद्देश्य: गढ़वाल मंडल में पर्यटन सुविधाओं का विकास, होटल और गेस्ट हाउस का संचालन, परिवहन व्यवस्था, साहसिक पर्यटन का आयोजन और क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देना।
- प्रमुख कार्य: चारधाम यात्रा व्यवस्था, पर्यटक आवास गृहों का संचालन, ट्रैकिंग और पर्वतारोहण का आयोजन।
- कुमाऊँ मंडल विकास निगम (KMVN – Kumaon Mandal Vikas Nigam):
- स्थापना: 31 मार्च 1976
- मुख्यालय: नैनीताल
- उद्देश्य: कुमाऊँ मंडल में पर्यटन सुविधाओं का विकास, होटल और गेस्ट हाउस का संचालन, परिवहन व्यवस्था, साहसिक पर्यटन का आयोजन और क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देना।
- प्रमुख कार्य: कैलाश मानसरोवर यात्रा (भारतीय सीमा तक) व्यवस्था, पर्यटक आवास गृहों का संचालन, विभिन्न पर्यटन स्थलों का विकास।
2. अनुसंधान एवं तकनीकी संस्थान
- वन अनुसंधान संस्थान (FRI – Forest Research Institute):
- स्थापना: 1906 (इंपीरियल फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के रूप में)
- स्थान: देहरादून
- संबद्धता: भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद् (ICFRE)
- उद्देश्य: वानिकी और वन उत्पादों पर अनुसंधान, शिक्षा और प्रशिक्षण प्रदान करना।
- विशेष: यह भारत का प्रमुख वानिकी अनुसंधान संस्थान है और इसका परिसर एक राष्ट्रीय धरोहर है। इसे 1991 में डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया।
- भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (IIP – Indian Institute of Petroleum):
- स्थापना: 1960
- स्थान: देहरादून
- संबद्धता: वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद् (CSIR)
- उद्देश्य: हाइड्रोकार्बन क्षेत्र, पेट्रोलियम शोधन, प्राकृतिक गैस और जैव ईंधन पर अनुसंधान एवं विकास करना।
- भारतीय सर्वेक्षण विभाग (Survey of India):
- स्थापना: 1767 (भारत का सबसे पुराना वैज्ञानिक विभाग)
- मुख्यालय: देहरादून (उत्तराखंड में प्रमुख कार्यालय)
- उद्देश्य: देश के लिए स्थलाकृतिक मानचित्रण और सर्वेक्षण करना।
- वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान (Wadia Institute of Himalayan Geology – WIHG):
- स्थापना: 1968
- स्थान: देहरादून
- संबद्धता: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार (एक स्वायत्त संस्थान)
- उद्देश्य: हिमालय के भूविज्ञान पर उन्नत अनुसंधान करना।
- जड़ी-बूटी शोध एवं विकास संस्थान (HRDI – Herbal Research and Development Institute):
- स्थापना: 1989
- स्थान: गोपेश्वर, चमोली
- उद्देश्य: औषधीय और सगंध पादपों का संरक्षण, संवर्धन, अनुसंधान और विकास।
- सगंध पौधा केंद्र (CAP – Centre for Aromatic Plants):
- स्थापना: 2003
- स्थान: सेलाकुई, देहरादून
- उद्देश्य: सगंध पौधों की खेती, प्रसंस्करण और विपणन को बढ़ावा देना।
- उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (USAC – Uttarakhand Space Application Centre):
- स्थापना: 2005
- स्थान: देहरादून
- उद्देश्य: राज्य के विकास के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और भू-सूचना विज्ञान का उपयोग करना।
- उत्तराखंड विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् (UCOST – Uttarakhand State Council for Science & Technology):
- स्थापना: 2005
- स्थान: देहरादून
- उद्देश्य: राज्य में विज्ञान और प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देना, अनुसंधान और विकास गतिविधियों का समन्वय करना।
3. सांस्कृतिक एवं साहित्यिक संगठन
- भातखंडे हिन्दुस्तानी संगीत महाविद्यालय (Bhatkhande Hindustani Sangeet Mahavidyalaya):
- शाखाएँ: उत्तराखंड में विभिन्न स्थानों पर, जैसे अल्मोड़ा (उदय शंकर नाट्य अकादमी के परिसर में), देहरादून आदि। (मूल संस्थान लखनऊ में है)
- उद्देश्य: भारतीय शास्त्रीय संगीत (गायन और वादन) और नृत्य की शिक्षा और प्रचार-प्रसार करना।
- विशेष: अल्मोड़ा स्थित संस्थान को पहले मैरिस कॉलेज ऑफ म्यूज़िक के नाम से भी जाना जाता था।
- उदय शंकर नृत्य एवं नाट्य अकादमी (Uday Shankar Dance and Drama Academy):
- स्थापना: 2002-03
- स्थान: अल्मोड़ा
- उद्देश्य: नृत्य, संगीत और नाटक कलाओं का प्रशिक्षण और संवर्धन, लोक कलाओं का संरक्षण।
- उत्तराखंड भाषा संस्थान (Uttarakhand Bhasha Sansthan):
- स्थापना: 24 फरवरी 2009 (अनौपचारिक रूप से 2005)
- मुख्यालय: देहरादून
- उद्देश्य: राज्य की भाषाओं (हिन्दी, संस्कृत, कुमाऊँनी, गढ़वाली, जौनसारी आदि) का विकास, संरक्षण और प्रचार-प्रसार।
- उत्तराखंड संस्कृत अकादमी (Uttarakhand Sanskrit Academy):
- स्थापना: 2002 (बाद में उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के रूप में विकसित)
- स्थान: हरिद्वार
- उद्देश्य: संस्कृत भाषा, साहित्य और प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा का संरक्षण और संवर्धन।
- लोक संस्कृति संग्रहालय (Lok Sanskriti Sangrahalaya):
- स्थापना: 1983
- स्थान: खुंटानी, भीमताल (नैनीताल)
- संस्थापक: डॉ. यशोधर मठपाल
- उद्देश्य: उत्तराखंड की लोक कला, शिल्प और सांस्कृतिक धरोहरों का संग्रह, संरक्षण और प्रदर्शन।
4. औद्योगिक एवं आर्थिक विकास संगठन
- राज्य औद्योगिक विकास निगम लिमिटेड (SIDCUL – State Industrial Development Corporation of Uttarakhand Limited):
- स्थापना: 2002
- मुख्यालय: देहरादून
- उद्देश्य: राज्य में औद्योगिक आस्थानों का विकास, प्रबंधन और औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देना।
- प्रमुख औद्योगिक आस्थान: पंतनगर, हरिद्वार, सितारगंज, सेलाकुई।
- उत्तराखंड हथकरघा एवं हस्तशिल्प विकास परिषद् (UHHDC – Uttarakhand Handloom and Handicraft Development Council):
- उद्देश्य: राज्य के हथकरघा और हस्तशिल्प उत्पादों को बढ़ावा देना, कारीगरों को प्रशिक्षण और विपणन सहायता प्रदान करना। “हिमाद्री” ब्रांड के तहत उत्पादों का विपणन।
- उत्तराखंड खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड (Uttarakhand Khadi and Village Industries Board):
- स्थापना: 17 अगस्त 2002
- मुख्यालय: देहरादून
- उद्देश्य: खादी और ग्रामोद्योग को बढ़ावा देना, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन।
निष्कर्ष (Conclusion)
उत्तराखंड के विभिन्न संगठनों ने समय-समय पर सामाजिक, राजनीतिक, और पर्यावरणीय मुद्दों को उठाकर जन आंदोलनों को नेतृत्व प्रदान किया है। इन संगठनों के प्रयासों से न केवल उत्तराखंड राज्य का गठन संभव हुआ, बल्कि क्षेत्र के सतत विकास और सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। वर्तमान में भी अनेक स्वयंसेवी और सरकारी संगठन राज्य के विकास में अपनी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।