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कत्यूरी शासन काल (Katyuri Dynasty Period)

उत्तराखंड के इतिहास में कत्यूरी राजवंश का एक महत्वपूर्ण स्थान है। इस राजवंश ने मध्ययुगीन काल में इस क्षेत्र पर शासन किया और कला, स्थापत्य तथा प्रशासन के क्षेत्र में अपनी अमिट छाप छोड़ी। कत्यूरी शासन को उत्तराखंड का स्वर्णिम काल भी माना जाता है।

कुछ त्वरित तथ्य (Quick Facts):
  • कत्यूरी राजवंश ने लगभग 700 ई. से 1050 ई. तक (विभिन्न मतों के अनुसार) शासन किया।
  • इनकी प्रारंभिक राजधानी कार्तिकेयपुर (जोशीमठ के निकट) थी, जिसे बाद में बैजनाथ (बागेश्वर) के पास कत्यूर घाटी में स्थानांतरित किया गया।
  • कत्यूरी शासकों को सूर्यवंशी माना जाता है।
  • इनके शासनकाल में मंदिर निर्माण कला का विशेष विकास हुआ।
  • आदि शंकराचार्य का आगमन कत्यूरी शासनकाल में ही हुआ माना जाता है।

उत्पत्ति और स्थापना

कत्यूरी वंश की उत्पत्ति के संबंध में विभिन्न मत हैं, लेकिन अधिकांश इतिहासकार उन्हें अयोध्या के सूर्यवंशी शासकों से जोड़ते हैं।

  • संस्थापक: बसंतन देव (या वासुदेव) को कत्यूरी वंश का संस्थापक माना जाता है। उन्होंने लगभग 700 ई. में जोशीमठ के निकट कार्तिकेयपुर में अपनी राजधानी स्थापित की।
  • प्रारंभिक राजधानी: कार्तिकेयपुर (जोशीमठ के निकट, चमोली)। यह स्थान सामरिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था।
  • कत्यूरी राजवंश के शासकों ने “गिरिराज चक्रचूड़ामणि” जैसी उपाधियाँ धारण कीं।
  • उनके अभिलेखों में उन्हें “कत्यूरा” या “कार्तिकेयपुर के राजा” कहा गया है।

प्रमुख कत्यूरी शासक और उनके परिवार

कत्यूरी राजवंश में कई शासक हुए, जिन्हें मुख्यतः तीन प्रमुख परिवारों में विभाजित किया जा सकता है:

1. बसंतन देव का परिवार

  • बसंतन देव: संस्थापक। उपाधि: परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर।
  • खरपरदेव: बसंतन देव का पुत्र। कन्नौज के राजा यशोवर्मन का समकालीन। इसने खरपरदेव राजवंश की नींव रखी।
  • कल्याणराज देव: खरपरदेव का पुत्र।
  • त्रिभुवनराज देव: कल्याणराज देव का पुत्र। यह इस परिवार का अंतिम शासक था। बागेश्वर लेख में इसका उल्लेख है।

2. निम्बर देव का परिवार

  • निम्बर देव: इस वंश का शक्तिशाली शासक, जिसने पाल शासकों से युद्ध किया। शैव मतानुयायी था।
  • इष्टगण देव: निम्बर का पुत्र। इसने समस्त उत्तराखंड को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया। जागेश्वर में नवदुर्गा, लकुलीश, नटराज मंदिरों का निर्माण करवाया।
  • ललितशूर देव: इष्टगण का पुत्र। यह कत्यूरी वंश का सबसे प्रतापी शासक माना जाता है। इसके सर्वाधिक ताम्रपत्र प्राप्त हुए हैं। पांडुकेश्वर ताम्रपत्र में इसे “कलिकलंकपंक में मग्न धरती के उद्धार के लिए वाराह अवतार” बताया गया है।
  • भूदेव: ललितशूर देव का पुत्र। इसने बौद्ध धर्म का विरोध किया और बैजनाथ मंदिर का निर्माण करवाया।

3. सलोड़ादित्य का परिवार

  • सलोड़ादित्य: इस वंश का संस्थापक।
  • इच्छट देव: सलोड़ादित्य का पुत्र।
  • देशट देव, पद्मट देव, सुभिक्षराज देव: अन्य महत्वपूर्ण शासक। सुभिक्षराज देव के समय कार्तिकेयपुर से राजधानी कत्यूर घाटी (बैजनाथ) में स्थानांतरित की गई (एक मत)।

अशांतिदेव/आसंतिदेव वंश: कुछ इतिहासकार इसे कत्यूरियों की एक अलग शाखा मानते हैं जिसने बाद में कत्यूर घाटी में शासन किया। इसके संस्थापक अशांतिदेव थे। इस वंश के शासक थे – वासंतीदेव, गोरारदेव, प्रीतमदेव, धामदेव, ब्रह्मदेव। ब्रह्मदेव को अत्यंत अत्याचारी शासक बताया गया है, जिसके अत्याचारों के कारण कत्यूरी साम्राज्य का पतन हुआ।

राजधानी परिवर्तन

  • प्रारंभिक राजधानी: कार्तिकेयपुर (जोशीमठ के निकट)।
  • बाद की राजधानी: बैजनाथ (कत्यूर घाटी, बागेश्वर)। राजधानी परिवर्तन के कारणों में जोशीमठ क्षेत्र का भूस्खलन और सामरिक आवश्यकताएँ प्रमुख थीं।

कत्यूरी शासन की प्रशासनिक व्यवस्था

  • राजा: शासन का सर्वोच्च अधिकारी, महाराजाधिराज परमेश्वर जैसी उपाधियाँ धारण करता था।
  • प्रशासनिक इकाइयाँ: राज्य प्रांतों, विषयों (जिलों) और भोगों (छोटी इकाइयों) में विभाजित था।
  • प्रमुख अधिकारी:
    • महामंत्री (अमात्य): राजा का मुख्य सलाहकार।
    • महासेनापति: सेना का प्रमुख।
    • महादंडनायक: मुख्य न्यायाधीश।
    • महाप्रतिहार: राजमहल का रक्षक।
    • कोटपाल: किलों का रक्षक।
    • नरपति: नदी घाटों पर आवागमन और कर वसूली करने वाला।
    • भोगपति और शौल्किक: कर वसूलने वाले अधिकारी।
  • सैन्य व्यवस्था: चतुरंगिणी सेना (पैदल, घुड़सवार, हाथी, रथ)। सेना के चार अंग थे – पदातिक (पैदल), अश्वारोही (घुड़सवार), गजारोही (हाथी सेना), उष्ट्रारोही (ऊँट सेना)।

कला और स्थापत्य

कत्यूरी काल को उत्तराखंड में मंदिर निर्माण और मूर्तिकला का स्वर्ण युग माना जाता है।

  • मंदिर शैली: नागर शैली से प्रभावित, शिखर युक्त मंदिर। कई मंदिरों में उत्कृष्ट पाषाण नक्काशी देखने को मिलती है।
  • प्रमुख निर्मित मंदिर:
    • जागेश्वर मंदिर समूह (अल्मोड़ा): अधिकांश मंदिरों का निर्माण या जीर्णोद्धार कत्यूरियों द्वारा।
    • बैजनाथ मंदिर समूह (बागेश्वर): कत्यूरी स्थापत्य का सुंदर उदाहरण।
    • कटारमल सूर्य मंदिर (अल्मोड़ा): राज्य का सबसे बड़ा सूर्य मंदिर, कत्यूरी शासक कटारमल द्वारा निर्मित।
    • बद्रीनाथ और केदारनाथ मंदिरों का वर्तमान स्वरूप भी कत्यूरी काल की देन माना जाता है (आदि शंकराचार्य द्वारा पुनर्स्थापित)।
    • अन्य मंदिर: द्वाराहाट, जोशीमठ, पांडुकेश्वर आदि में अनेक मंदिर।
  • मूर्तिकला: पत्थर और धातु की सुंदर मूर्तियाँ बनाई गईं, जिनमें शिव, विष्णु, दुर्गा, सूर्य और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ प्रमुख हैं।

कत्यूरी शासन का पतन

  • आंतरिक कलह और विद्रोह: अंतिम शासकों की कमजोरी और सामंतों के विद्रोह के कारण साम्राज्य कमजोर हो गया।
  • बाहरी आक्रमण: पड़ोसी शक्तियों के आक्रमण भी पतन का कारण बने।
  • ब्रह्मदेव जैसे अत्याचारी शासकों ने जनता में असंतोष पैदा किया।
  • लगभग 11वीं-12वीं शताब्दी तक कत्यूरी साम्राज्य विभिन्न छोटी-छोटी रियासतों में विघटित हो गया, जैसे डोटी के रैका, अस्कोट के पाल, सिरा के मनकोटी, सोर के बम, कत्यूर के कत्यूरी आदि।

निष्कर्ष (Conclusion)

कत्यूरी राजवंश ने उत्तराखंड के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ा। उनके शासनकाल में न केवल राजनीतिक स्थिरता आई बल्कि कला, स्थापत्य और संस्कृति का भी अभूतपूर्व विकास हुआ। आज भी उनके द्वारा निर्मित मंदिर और कलाकृतियाँ उत्तराखंड की समृद्ध विरासत का प्रमाण हैं। कत्यूरी शासन का पतन यद्यपि छोटे राज्यों के उदय का कारण बना, तथापि उनकी सांस्कृतिक धरोहर आज भी जीवित है।

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