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Contribution of Uttarakhand in Freedom Struggle

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उत्तराखंड के निवासियों ने अद्वितीय शौर्य, त्याग और देशभक्ति का परिचय दिया। यहाँ की वीर भूमि ने अनेक स्वतंत्रता सेनानियों को जन्म दिया और विभिन्न राष्ट्रीय आन्दोलनों में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की। टिहरी रियासत में भी प्रजामंडल आन्दोलन के माध्यम से स्वतंत्रता की अलख जगाई गई।

उत्तराखंड का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान: एक विस्तृत अध्ययन

कुछ त्वरित तथ्य (Quick Facts):

  • उत्तराखंड से सत्याग्रहियों ने डांडी मार्च में सक्रिय भाग लिया।
  • कुमाऊँ और गढ़वाल दोनों क्षेत्रों में नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन व्यापक रूप से फैला।
  • सल्ट क्षेत्र (अल्मोड़ा) को गांधीजी द्वारा ‘कुमाऊँ का बारदोली’ कहा गया।
  • भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उत्तराखंड में अनेक महत्वपूर्ण घटनाएँ हुईं, जिनमें देघाट, सालम, खुमाड़ की घटनाएँ प्रमुख हैं।
  • उत्तराखंड की महिलाओं ने स्वतंत्रता संग्राम में अभूतपूर्व योगदान दिया।
  • आजाद हिन्द फौज में भी उत्तराखंड के सैनिकों की बड़ी संख्या में भागीदारी रही।
  • टिहरी रियासत में प्रजामंडल आंदोलन ने राजशाही के विरुद्ध संघर्ष किया।

1. सविनय अवज्ञा आंदोलन एवं नमक सत्याग्रह

क. डांडी मार्च में भागीदारी

  • महात्मा गांधी ने 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से डांडी तक ऐतिहासिक पैदल यात्रा प्रारम्भ की।
  • इस यात्रा में कुल 78 सत्याग्रही शामिल थे, जिनमें उत्तराखंड से ज्योतिराम कांडपाल (अल्मोड़ा), भैरव दत्त जोशी (अल्मोड़ा), और गोरख वीर खड़ग बहादुर (देहरादून) प्रमुख थे।
  • गांधी जी 5 अप्रैल 1930 को डांडी पहुंचे और 6 अप्रैल 1930 को नमक बनाकर कानून तोड़ा। यह यात्रा 24 दिनों में 241 मील की थी।
  • ज्योतिराम कांडपाल ने बाद में देघाट (अल्मोड़ा) में उद्योग मंदिर आश्रम की स्थापना की।

ख. उत्तराखंड में नमक सत्याग्रह

  • गढ़वाल में नमक सत्याग्रह का नेतृत्व प्रताप सिंह नेगी को सौंपा गया।
  • कुमाऊँ में नमक सत्याग्रह का नेतृत्व गोविन्द बल्लभ पंत को सौंपा गया।
  • 23 मई 1930 को गोविन्द बल्लभ पंत ने मल्लीताल (नैनीताल) के रामलीला मैदान में नमक बनाने की घोषणा की।
  • 27 मई 1930 को नैनीताल में बद्रीदत्त पांडे ने नमक बेचा।

ग. झंडा सत्याग्रह एवं अन्य गतिविधियाँ

  • 4 मई 1930 को अल्मोड़ा के नंदादेवी प्रांगण में मोहन जोशी के नेतृत्व में झण्डा सत्याग्रह के दौरान विशाल सभा हुई।
  • 28 अगस्त 1930 को जयानंद भारती व उनके साथियों ने जहरीखाल (पौड़ी) स्कूल में झण्डा फहराया।
  • सविनय अवज्ञा आन्दोलन में सर्वाधिक हिस्सेदारी अल्मोड़ा के सल्ट क्षेत्र की थी, जहाँ प्रत्येक गाँव में तिरंगा फहराया गया।
  • गढ़वाल में आन्दोलन का गढ़ दुगड्डा (पौड़ी) बन गया था।
  • कांग्रेस के 1929 के लाहौर अधिवेशन में गढ़वाल से प्रताप सिंह नेगी, कृपाराम मिश्र, रामप्रसाद नौटियाल, जगमोहन नेगी आदि नेताओं ने भाग लिया।
  • 30 मई 1930 को दुगड्डा में गढ़वाल का प्रथम राजनीतिक सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसका उद्घाटन हरगोविन्द बल्लभ पंत ने किया (गोविन्द बल्लभ पंत के जेल में होने के कारण)।
  • जून 1930 में पौड़ी गढ़वाल के कोट सितोस्यूं में हुए कांग्रेस सम्मेलन की अध्यक्षता हरगोविन्द पंत ने की।
  • चमोली जनपद में सविनय अवज्ञा सत्याग्रह का संचालन रामप्रसाद नौटियाल के दल को सौंपा गया, जिन्होंने बद्रीनाथ मंदिर में तिरंगा फहराया।
  • 1930 में पौड़ी जेल में डिप्टी कमिश्नर इबटसन द्वारा अनुसूया प्रसाद बहुगुणा के साथ दुर्व्यवहार के कारण इबटसन कांड प्रसिद्ध हुआ।
  • गढ़वाल में लगान बंदी कार्यक्रम रामप्रसाद नौटियाल के नेतृत्व में गुजडू क्षेत्र के कृषकों के सहयोग से संचालित हुआ।

2. क्रांतिकारी गतिविधियाँ

  • भवानी सिंह रावत (पौड़ी) हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) (1928) के सदस्य थे।
  • 1929 में वायसराय बम कांड में चंद्रशेखर आजाद ने अपने साथी यशपाल एवं भवानी सिंह रावत के साथ वायसराय के सैलून पर बम फेंका।
  • चांदनी चौक (दिल्ली) के गाड़ोदिया स्टोर को लूटने के बाद चंद्रशेखर आजाद और भवानी सिंह रावत ने हथियारों के प्रशिक्षण के लिए 1930 में गढ़वाल का रुख किया।
  • इन्द्र सिंह गढ़वाली (टिहरी) को नौजवान भारत सभा ने क्रांतिकारी टुकड़ी का संचालक बनाकर दक्षिण भारत भेजा, जहाँ वे मद्रास में प्रेम प्रकाश मुनि नाम से साधु के भेष में रहे।
  • इन्द्र सिंह गढ़वाली ने 1933 के मद्रास बम कांड में भाग लिया और उन्हें 20 वर्ष की कालापानी की सजा हुई।
  • बच्चूलाल भट्ट (लैंसडाउन) ने 1933 के ऊंटी बैंक डकैती कांड में भाग लिया और उन्हें 18 साल की सजा हुई। उन्हें शम्भूनाथ आजाद ने नौजवान भारत सभा का सदस्य बनाया था।

3. सामाजिक-राजनीतिक चेतना एवं संगठन

  • संयुक्त प्रांत के पर्वतीय संभाग (कुमाऊँ कमिश्नरी) में हरिजन सेवक संघ का अध्यक्ष इन्द्र सिंह नयाल को बनाया गया।
  • 1932 में गढ़वाल जिला बोर्ड के चुनावों में कांग्रेसी प्रत्याशी अनुसूया प्रसाद बहुगुणा अध्यक्ष चुने गए।
  • 1936 में दुगड्डा में आयोजित सभा की अध्यक्षता प्रताप सिंह नेगी ने की, जिसमें पं. जवाहरलाल नेहरू ने भाग लिया।
  • 1937 के प्रांतीय विधायिका चुनाव में उत्तरी गढ़वाल (पौड़ी-चमोली) क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी अनुसूया प्रसाद बहुगुणा विजयी हुए। इसी चुनाव में जगमोहन सिंह नेगी के समक्ष मुकुन्दी लाल की पराजय हुई, जिससे मुकुन्दी लाल का राजनीतिक जीवन लगभग समाप्त हो गया।
  • 1938-39 में जागृत गढ़वाल संघ की स्थापना हुई, जिसके अध्यक्ष प्रताप सिंह नेगी थे।

4. व्यक्तिगत सत्याग्रह (1940-41)

  • उत्तराखंड राज्य के पहले व्यक्तिगत सत्याग्रही जगमोहन सिंह नेगी थे।
  • उत्तराखंड में व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन में स्वयं को सत्याग्रही घोषित करने वाली पहली महिला भागीरथी देवी थीं।
  • कुमाऊँ में व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन का नेतृत्व प्रताप सिंह नेगी ने किया।
  • चमोली जिले में व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन का संचालन अनुसूया प्रसाद बहुगुणा ने किया।
  • डांडामंडी (पौड़ी) में 1940 में आयोजित कांग्रेस कार्यकर्ताओं की बैठक का उद्देश्य व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन को चलाना था।
  • व्यक्तिगत सत्याग्रह के बाद फरवरी 1942 में गढ़वाल क्षेत्र में कांग्रेस ने रक्षा समितियों का गठन किया, जिसका उद्देश्य कुटीर उद्योगों और शैक्षिक कार्यक्रमों को पुनर्जीवित करना था।

5. भारत छोड़ो आंदोलन (1942)

  • उत्तराखंड में पहला प्रभाव अल्मोड़ा में दिखाई दिया, जहाँ 9 अगस्त 1942 को नंदादेवी प्रांगण में बद्रीदत्त पांडे ने भाषण दिया।
  • 9 अगस्त 1942 को गढ़वाल के लैंसडाउन में ललिताप्रसाद नौटियाल के घर आपात बैठक बुलाई गई।
  • देघाट गोलीकांड (अल्मोड़ा): 18 अगस्त 1942 को पुलिस की गोलीबारी में हरिकृष्ण और हीरामणि शहीद हो गए।
  • सालम की घटना (अल्मोड़ा): ‘सालम का शेर’ कहे जाने वाले राम सिंह आजाद 1942 में सालम से फरार होने के बाद बद्रीनाथ में गिरफ्तार हुए और उन्हें कालेपानी की सजा दी गई। उनके पक्ष में वकालत गोपाल स्वरूप पाठक ने और अपील इन्द्र सिंह नयाल ने की। डिप्टी कलेक्टर मेहरबान सिंह ने सालम क्षेत्र में जाट सेना भेजी थी।
  • सल्ट क्षेत्र की घटना (खुमाड़ गोलीकांड): महात्मा गांधी ने सल्ट की भूमिका को देखते हुए उसे ‘कुमाऊँ का बारदोली’ की संज्ञा दी। 5 सितम्बर 1942 को सल्ट क्षेत्र के खुमाड़ में कांग्रेस मुख्यालय पर अंग्रेजों ने जौनसन के आदेश पर गोली चलाई, जिसमें गंगाराम और खीमादेव दो सगे भाई शहीद हो गए।
  • चनौदा (अल्मोड़ा) में शांति लाल त्रिवेदी के प्रयास से 1937 में गांधी आश्रम की स्थापना हुई थी, जो आंदोलन का केंद्र बना। इसे 2 सितम्बर 1942 को बंद कर दिया गया।
  • गुजडू क्षेत्र (पौड़ी) को डिप्टी कमिश्नर वरनीड की दमनकारी नीति के कारण ‘गढ़वाल का बारदोली’ कहा जाता था।
  • आंदोलन के समय गढ़वाल में केंद्र बिंदु देवप्रयाग बना।
  • द्वाराहाट के मदन मोहन उपाध्याय ने भूमिगत रेडियो स्टेशन संचालन में मुख्य भूमिका निभाई।
  • बनारस में छात्र आन्दोलन का श्रेय चन्द्र सिंह गढ़वाली और कुशलानंद गैरोला को दिया जाता है।
  • इलाहाबाद में छात्र आन्दोलन का नेतृत्व हेमवती नंदन बहुगुणा ने किया।
  • सिलाणी (पौड़ी) में सदानंद कुकरेती ने राष्ट्रीय विद्यालय खोला। ताड़ीखेत में देवकीनंदन पांडे और भागीरथ पांडे ने प्रेम विद्यालय की स्थापना की।
  • प्रमुख भागीदार: भैरवदत्त धूलिया, जयानंद भारती, आदित्य राम दुदपुड़ी, रामसिंह, भक्तदर्शन, उमराव सिंह रावत, परिपूर्णानंन्द पैन्यूली, सुन्दरलाल बहुगुणा, छवाण सिंह आदि।

6. आजाद हिन्द फौज में योगदान

  • कैप्टन मोहन सिंह ने 1941 में आजाद हिन्द फौज का गठन किया। सुभाषचंद्र बोस ने 1943 में सिंगापुर में इसकी बागडोर संभाली।
  • उत्तराखंड से बड़ी संख्या में सैनिक आजाद हिन्द फौज में शामिल हुए। अनुमानतः 2500 सैनिक (लगभग 12%) उत्तराखंड से थे।
  • लैफ्टिनेंट कर्नल चंद्र सिंह नेगी (पौड़ी) को सिंगापुर में ऑफीसर्स ट्रेनिंग स्कूल का कमांडर नियुक्त किया गया।
  • मेजर देव सिंह दानू (पिथौरागढ़) नेताजी के अंगरक्षक बटालियन के कमांडर थे।
  • कर्नल पी.सी. रतूड़ी (टिहरी) को बर्मा कैंपेन में अदम्य साहस के लिए ‘सरदार-ए-जंग’ की उपाधि मिली।
  • 21 सितम्बर 1942 को गढ़वाल राइफल की दो बटालियन (2/18 और 5/18) आजाद हिन्द फौज में शामिल हो गईं।
  • जौनसार बावर के शहीद वीर केसरी चंद आजाद हिन्द फौज में शामिल हुए। उन्हें इम्फाल मोर्चे पर पुल उड़ाने के आरोप में 3 मई 1945 को दिल्ली में फांसी दी गई। उनकी याद में चकराता के पास रामताल गार्डन (चौलिथात) में प्रतिवर्ष 3 मई को मेला लगता है।

7. स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भूमिका

  • 1929 में कस्तूरबा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सुचेता कृपलानी नैनीताल के ताकुला पहुंचे। गांधीजी के कुमाऊँ आगमन पर अल्मोड़ा की महिलाओं ने गांधी निधि हेतु चंदा एकत्र किया।
  • गांधीजी 17 जून 1920 को ताड़ीखेत (अल्मोड़ा) पहुंचे, जहाँ दुर्गा देवी पंत ने उन्हें 113 रुपये भेंट किए। 22 जून 1920 को गांधी जी ने मोहन जोशी के प्रयासों से बागेश्वर में स्वराज भवन का शिलान्यास किया।
  • 1931 में बागेश्वर में महिला सम्मेलन में विदेशी कपड़ों का बहिष्कार और खादी प्रचार का निर्णय लिया गया।
  • कुंती वर्मा के नेतृत्व में महिलाओं का दल हल्द्वानी पहुंचा, जहाँ महिला सत्याग्रहियों की पहली गिरफ्तारी हुई। 1932 में उनके खिलाफ जिंदा या मुर्दा पकड़ने का आदेश जारी हुआ।
  • अमृत बाजार पत्रिका ने अल्मोड़ा की बिशनी देवी शाह को कुमाऊँ स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी बताया। नमक सत्याग्रह के समय अल्मोड़ा नगरपालिका भवन पर झंडा फहराने का नेतृत्व उन्होंने किया।
  • 20 नवम्बर 1932 को अल्मोड़ा में कुर्मांचल महिला सुधार सम्मेलन की अध्यक्ष दुर्गा देवी पंत थीं।
  • भारत छोड़ो आंदोलन में मालती देवी के नेतृत्व में देश सेवक संगठन की महिलाओं ने रेल संपत्ति को क्षति पहुंचाई।
  • 1941 में गांधीजी ने अपनी विदेशी शिष्या सरला बहन (मिस कैथरीन मेरी हेल्वमन) को कौसानी भेजा, जहाँ उन्होंने लक्ष्मी आश्रम (कस्तूरबा महिला उत्थान मंडल) की स्थापना की। यहाँ से जुड़ी कमला और बसंती (सगी बहनें) ने सर्वोदय का प्रचार किया।
  • गांधीजी की शिष्या मीरा बहन (मैडलिन स्लेड) ने ऋषिकेश में पशुलोक की स्थापना की।
  • तुलसी देवी रावत (अल्मोड़ा, जन्म 1904) ने 1948 में ‘महिला जागृति’ मासिक पत्रिका का संपादन किया और जोहार महिला संगठन की मंत्री रहीं। उन्होंने “रोओ नहीं, आगे बढ़ो” का नारा दिया।

8. टिहरी रियासत में जन आंदोलन एवं प्रजामंडल

  • 1835 में सकलाना के मुआफीदार के खिलाफ कमीण/सयानों ने आंदोलन किया। 7 फरवरी 1838 को कंपनी ने राजा को सकलाना मुआफी की जनता को संरक्षण देने का आदेश दिया।
  • 1861 में भवानी शाह ने सकलाना की अठूर पट्टी में कृषि कर माफ किया।
  • तिलाड़ी कांड (रवाईं कांड): 30 मई 1930 को टिहरी रियासत के तिलाड़ी मैदान में वन अधिकारों की मांग कर रहे किसानों पर दीवान चक्रधर जुयाल के आदेश पर गोली चलाई गई, जिसमें अनेक लोग शहीद हुए। इसे ‘टिहरी का जलियांवाला बाग’ या ‘छोटा जलियांवाला कांड’ कहा जाता है। शहीद किसानों को दर्जा दिलाने में जोत सिंह रवाल्टां की मुख्य भूमिका थी।
  • 1935 में सकलाना पट्टी के उनियाल गाँव में सत्यप्रसाद रतूड़ी ने बाल सभा की स्थापना की।
  • टिहरी राज्य प्रजामंडल की स्थापना: 23 जनवरी 1939 को देहरादून के चक्कूवाला मोहल्ले में श्याम चंद्र नेगी के मकान में। संस्थापक सदस्य: श्रीदेव सुमन, गोविन्द राम भट्ट, तोता राम गैरोला, महिमानंद डोभाल, श्याम चंद्र नेगी।
  • श्रीदेव सुमन (जन्म: 25 मई 1916, जौल गाँव, टिहरी) ने प्रजामंडल के माध्यम से टिहरी में उत्तरदायी शासन की मांग की। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्होंने 3 मई 1944 को भूख हड़ताल प्रारंभ की और 25 जुलाई 1944 को 84 दिनों की भूख हड़ताल के बाद शहीद हो गए।
  • 21 अगस्त 1946 को टिहरी रियासत ने राज्य के भीतर प्रजामंडल की स्थापना को वैधानिक मान्यता दी।
  • 5 अक्टूबर 1946 को मानवेन्द्र शाह का राज्याभिषेक हुआ।
  • भारत स्वतंत्र होते ही टिहरी राज्य में सकलाना विद्रोह का नेतृत्व दौलत राम, भोलूराम नौटियाल और नागेन्द्र सकलानी ने किया।
  • 5-6 जनवरी 1947 को कोटद्वार में आयोजित बैठक की अध्यक्षता पितृशरण रतूड़ी ने की।
  • 28 अप्रैल 1947 को टिहरी दरबार में ‘शांति रक्षा अधिनियम’ लागू किया गया।
  • 15 अगस्त 1947 को प्रजामंडल के अध्यक्ष परिपूर्णानंद पैन्यूली थे।
  • कीर्तिनगर आंदोलन (1948): 11 जनवरी 1948 को भोलूराम और नागेन्द्र सकलानी शहीद हो गए।
  • 1 अगस्त 1949 को मानवेन्द्र शाह ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए, जिससे टिहरी रियासत संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) का 50वां जिला बन गया।

निष्कर्ष (Conclusion)

उत्तराखंड का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में योगदान बहुआयामी और महत्वपूर्ण रहा है। यहाँ के निवासियों ने न केवल ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय आंदोलनों में सक्रियता दिखाई, बल्कि स्थानीय स्तर पर भी सामंती व्यवस्था और अन्याय के खिलाफ संघर्ष किया। वीर सेनानियों के बलिदान, महिलाओं की अभूतपूर्व भागीदारी और जन साधारण के अटूट देशभक्ति ने उत्तराखंड को स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक गौरवपूर्ण स्थान दिलाया है।

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