भारतीय आईटी अधिनियम, 2000 (Indian IT Act, 2000)
परिचय
सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम, 2000 भारतीय संसद द्वारा पारित एक अधिनियम है जो साइबर अपराध (cybercrime) और इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स (e-commerce) से संबंधित मामलों को देखता है। इसका मुख्य उद्देश्य इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन को कानूनी मान्यता देना और साइबर अपराधों को रोकना है। इस अधिनियम में 2008 में एक महत्वपूर्ण संशोधन किया गया था।
महत्वपूर्ण धाराएँ (Important Sections)
धारा 43 (Section 43)
यह धारा कंप्यूटर, कंप्यूटर सिस्टम आदि को नुकसान पहुँचाने के लिए दंड और मुआवजे से संबंधित है। इसमें बिना अनुमति के पहुँच, डेटा डाउनलोड करना, या वायरस डालना जैसे कार्य शामिल हैं।
धारा 65 (Section 65)
कंप्यूटर स्रोत दस्तावेजों (source documents) के साथ छेड़छाड़ करने पर दंड का प्रावधान करती है।
धारा 66 (Section 66)
यह धारा कंप्यूटर सिस्टम के साथ हैकिंग करने से संबंधित है। यदि कोई व्यक्ति धारा 43 में वर्णित कोई भी कार्य बेईमानी या धोखाधड़ी के इरादे से करता है, तो उसे इस धारा के तहत दंडित किया जा सकता है।
धारा 66A (Section 66A) – निरस्त (Struck Down)
यह धारा संचार सेवाओं के माध्यम से आपत्तिजनक संदेश भेजने के लिए दंड का प्रावधान करती थी। हालांकि, श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) मामले में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इसे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) (भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) का उल्लंघन बताते हुए असंवैधानिक घोषित कर दिया।
धारा 66B (Section 66B)
चोरी किए गए कंप्यूटर संसाधन या संचार उपकरण को बेईमानी से प्राप्त करने पर दंड का प्रावधान।
धारा 66C (Section 66C)
पहचान की चोरी (Identity Theft) के लिए दंड, जैसे किसी और के पासवर्ड या डिजिटल हस्ताक्षर का धोखाधड़ी से उपयोग करना।
धारा 66D (Section 66D)
कंप्यूटर संसाधन का उपयोग करके प्रतिरूपण (personation) द्वारा धोखाधड़ी के लिए दंड।
धारा 66F (Section 66F)
यह धारा साइबर आतंकवाद (Cyber Terrorism) के लिए दंड का प्रावधान करती है।
धारा 67 (Section 67)
इलेक्ट्रॉनिक रूप में अश्लील सामग्री को प्रकाशित या प्रसारित करने पर दंड का प्रावधान।