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अपशिष्ट प्रबंधन: सिद्धांत, चुनौतियाँ और पहल

अपशिष्ट प्रबंधन (Waste Management) का तात्पर्य कचरे के संग्रहण, परिवहन, प्रसंस्करण, पुनर्चक्रण और निपटान की प्रक्रियाओं से है। तीव्र आर्थिक विकास, शहरीकरण और बदलते उपभोग पैटर्न के कारण भारत में अपशिष्ट उत्पादन एक गंभीर पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक चुनौती बन गया है। प्रभावी अपशिष्ट प्रबंधन न केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण की रक्षा के लिए आवश्यक है, बल्कि यह चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy) को बढ़ावा देकर आर्थिक अवसर भी पैदा करता है, जहाँ कचरे को एक संसाधन के रूप में देखा जाता है।
प्रारंभिक परीक्षाओं के लिए त्वरित तथ्य (Quick Facts for Prelims)
  • ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम: 2016 में अधिसूचित, जो स्रोत पर कचरे के पृथक्करण को अनिवार्य करता है।
  • 3R का सिद्धांत: Reduce (कम करना), Reuse (पुनः उपयोग), Recycle (पुनर्चक्रण)। यह अपशिष्ट प्रबंधन का मूल आधार है।
  • विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व (EPR): एक नीतिगत दृष्टिकोण जिसके तहत उत्पादों के जीवन चक्र के अंत में उनके उपचार या निपटान के लिए निर्माताओं को एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जाती है। यह ई-अपशिष्ट और प्लास्टिक अपशिष्ट नियमों का एक प्रमुख घटक है।
  • स्वच्छ भारत मिशन (शहरी): 2 अक्टूबर 2014 को शुरू किया गया, जिसका एक प्रमुख उद्देश्य वैज्ञानिक ठोस अपशिष्ट प्रबंधन है।
  • अपशिष्ट से ऊर्जा (Waste-to-Energy): गैर-पुनर्चक्रण योग्य सूखे कचरे से ऊर्जा उत्पन्न करने की प्रक्रिया।

अपशिष्ट के प्रकार (Types of Waste)

अपशिष्ट को मुख्य रूप से निम्नलिखित श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:
  • नगरपालिका ठोस अपशिष्ट (MSW): घरों, कार्यालयों और संस्थानों से उत्पन्न होने वाला सामान्य कचरा, जिसमें गीला (खाद्य अपशिष्ट) और सूखा (प्लास्टिक, कागज, कांच) कचरा शामिल है।
  • औद्योगिक अपशिष्ट: विनिर्माण प्रक्रियाओं से उत्पन्न होने वाला कचरा, जो अक्सर खतरनाक होता है।
  • जैव-चिकित्सा अपशिष्ट: अस्पतालों और क्लीनिकों से उत्पन्न होने वाला संक्रामक अपशिष्ट।
  • खतरनाक अपशिष्ट: ऐसा अपशिष्ट जो पर्यावरण या मानव स्वास्थ्य के लिए तत्काल खतरा पैदा करता है, जैसे रसायन, पेंट, बैटरी।
  • ई-अपशिष्ट (E-waste): फेंके गए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जैसे मोबाइल फोन, कंप्यूटर, टेलीविजन।

अपशिष्ट प्रबंधन के सिद्धांत और पदानुक्रम

अपशिष्ट प्रबंधन का सबसे प्रभावी तरीका एकीकृत अपशिष्ट प्रबंधन (Integrated Waste Management) पदानुक्रम का पालन करना है, जो सबसे पसंदीदा से लेकर सबसे कम पसंदीदा विकल्पों को प्राथमिकता देता है:
  1. रोकथाम (Prevention) और न्यूनीकरण (Reduction): कचरा पैदा ही न होने देना या उसकी मात्रा को कम करना।
  2. पुनः उपयोग (Reuse): वस्तुओं का उनके मूल स्वरूप में बार-बार उपयोग करना।
  3. पुनर्चक्रण (Recycling): अपशिष्ट पदार्थों को नई सामग्रियों में संसाधित करना।
  4. ऊर्जा पुनर्प्राप्ति (Energy Recovery): गैर-पुनर्चक्रण योग्य कचरे से ऊर्जा (जैसे बिजली या गर्मी) उत्पन्न करना।
  5. निपटान (Disposal): अंतिम विकल्प के रूप में, बचे हुए कचरे को वैज्ञानिक रूप से डिजाइन किए गए लैंडफिल में सुरक्षित रूप से निपटाना।

भारत में अपशिष्ट प्रबंधन: प्रमुख नियम और पहल

1. ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (SWM) नियम, 2016

यह नियम 2000 के नियमों की जगह लेता है और इसका दायरा नगर निगम क्षेत्रों से आगे तक फैला हुआ है। इसकी मुख्य विशेषताएं हैं:
  • स्रोत पर पृथक्करण: गीले, सूखे और घरेलू खतरनाक कचरे को स्रोत पर अलग करना अनिवार्य है।
  • यह कचरा बीनने वालों और अनौपचारिक क्षेत्र को औपचारिक प्रणाली में एकीकृत करने पर जोर देता है।
  • ‘प्रदूषक भुगतान करता है’ (Polluter Pays) सिद्धांत को लागू किया गया है।

2. प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016

इसका उद्देश्य प्लास्टिक के उत्पादन, बिक्री और उपयोग को विनियमित करना है। इसने प्लास्टिक कैरी बैग की न्यूनतम मोटाई 50 माइक्रोन निर्धारित की और EPR की अवधारणा को पेश किया। 2021 के संशोधनों ने 1 जुलाई 2022 से एकल-उपयोग प्लास्टिक (Single-Use Plastics) की कई वस्तुओं पर प्रतिबंध लगा दिया।

3. ई-अपशिष्ट (प्रबंधन) नियम, 2016

यह नियम पहली बार निर्माताओं को विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व (EPR) के तहत अपने उत्पादों के जीवन-चक्र के अंत में उत्पन्न ई-कचरे को इकट्ठा करने और उसे पुनर्चक्रित करने के लिए जिम्मेदार बनाता है।

4. स्वच्छ भारत मिशन (शहरी)

इस राष्ट्रव्यापी अभियान ने अपशिष्ट प्रबंधन, विशेष रूप से स्रोत पर पृथक्करण और प्रसंस्करण को एक जन आंदोलन बना दिया है। इसका दूसरा चरण (SBM-U 2.0) भारत को ‘कचरा-मुक्त’ बनाने पर केंद्रित है।

अपशिष्ट प्रबंधन में चुनौतियाँ

  • स्रोत पर पृथक्करण का अभाव: नियमों के बावजूद, अधिकांश शहरों में स्रोत पर कचरे को अलग करने की प्रथा बहुत कमजोर है।
  • अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा: वैज्ञानिक लैंडफिल, प्रसंस्करण और पुनर्चक्रण सुविधाओं की कमी।
  • अनौपचारिक क्षेत्र: भारत का अधिकांश पुनर्चक्रण अनौपचारिक क्षेत्र द्वारा किया जाता है, जो अक्सर असुरक्षित परिस्थितियों में काम करता है।
  • वित्तीय बाधाएँ: नगर पालिकाओं के पास कुशल अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों को लागू करने के लिए धन की कमी होती है।
  • जन जागरूकता की कमी: कचरे के अनुचित निपटान के पर्यावरणीय और स्वास्थ्य प्रभावों के बारे में जागरूकता का अभाव।

आगे की राह: चक्रीय अर्थव्यवस्था की ओर

प्रभावी अपशिष्ट प्रबंधन के लिए एक रैखिक (बनाओ-उपयोग करो-फेंको) अर्थव्यवस्था से चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy) की ओर बढ़ने की आवश्यकता है।
  • नीतिगत हस्तक्षेप: EPR ढांचे को मजबूत करना और पुनर्नवीनीकरण सामग्री के उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए प्रोत्साहन देना।
  • प्रौद्योगिकी का उपयोग: अपशिष्ट से ऊर्जा संयंत्रों को बढ़ावा देना और कुशल पुनर्चक्रण प्रौद्योगिकियों में निवेश करना।
  • अनौपचारिक क्षेत्र को औपचारिक बनाना: कचरा बीनने वालों को सामाजिक सुरक्षा और बेहतर काम करने की स्थिति प्रदान करके औपचारिक अपशिष्ट प्रबंधन श्रृंखला में एकीकृत करना।
  • जन भागीदारी: सूचना, शिक्षा और संचार (IEC) गतिविधियों के माध्यम से व्यवहार परिवर्तन को बढ़ावा देना।
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