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जलवायु परिवर्तन: कारण, प्रभाव और वैश्विक प्रतिक्रिया

जलवायु परिवर्तन (Climate Change) का तात्पर्य दशकों, सदियों या उससे अधिक समय में होने वाले मौसम के पैटर्न में दीर्घकालिक बदलावों से है। जबकि पृथ्वी की जलवायु प्राकृतिक रूप से बदलती रही है, 19वीं सदी के बाद से देखे गए परिवर्तन मुख्य रूप से मानवीय गतिविधियों, विशेषकर जीवाश्म ईंधन के जलने के कारण हुए हैं। यह वैश्विक तापन (Global Warming) को जन्म देता है, जो पृथ्वी की सतह के औसत तापमान में वृद्धि है। जलवायु परिवर्तन आज मानवता के सामने सबसे गंभीर वैश्विक चुनौतियों में से एक है, जो पारिस्थितिक तंत्र, अर्थव्यवस्थाओं और समाजों को गहराई से प्रभावित कर रहा है।
प्रारंभिक परीक्षाओं के लिए त्वरित तथ्य (Quick Facts for Prelims)
  • IPCC (जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल): 1988 में विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा स्थापित किया गया। यह जलवायु परिवर्तन से संबंधित विज्ञान का आकलन करता है।
  • UNFCCC (जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन): 1992 में रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन में अपनाया गया एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता।
  • क्योटो प्रोटोकॉल (1997): विकसित देशों के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी उत्सर्जन कटौती लक्ष्य निर्धारित करने वाला पहला समझौता।
  • पेरिस समझौता (2015): इसका लक्ष्य वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2°C से काफी नीचे तक सीमित करना है, और 1.5°C तक सीमित करने का प्रयास करना है।
  • भारत के पंचामृत लक्ष्य: COP26 में घोषित, जिसमें 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य शामिल है।

जलवायु परिवर्तन के कारण

प्राकृतिक ग्रीनहाउस प्रभाव बनाम वर्धित ग्रीनहाउस प्रभाव

प्राकृतिक ग्रीनहाउस प्रभाव जीवन के लिए आवश्यक है। कुछ गैसें (ग्रीनहाउस गैसें) सूर्य की गर्मी को रोकती हैं, जिससे पृथ्वी गर्म रहती है। हालांकि, मानवीय गतिविधियों ने इन गैसों की सांद्रता को बढ़ा दिया है, जिससे वर्धित (Enhanced) ग्रीनहाउस प्रभाव पैदा हो गया है, जो अतिरिक्त गर्मी को रोकता है और ग्रह को गर्म करता है।

प्रमुख ग्रीनहाउस गैसें (GHGs) और उनके स्रोत

  • कार्बन डाइऑक्साइड (CO2): जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल, गैस) का जलना, वनों की कटाई और औद्योगिक प्रक्रियाएं।
  • मीथेन (CH4): कृषि (पशुधन, धान की खेती), अपशिष्ट लैंडफिल और प्राकृतिक गैस प्रणालियों से उत्सर्जन।
  • नाइट्रस ऑक्साइड (N2O): कृषि और औद्योगिक गतिविधियाँ, और जीवाश्म ईंधन का दहन।

जलवायु परिवर्तन के प्रभाव (Impacts of Climate Change)

पारिस्थितिक प्रभाव

  • चरम मौसम की घटनाएँ: बाढ़, सूखा, हीटवेव और तूफानों की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि।
  • समुद्र के स्तर में वृद्धि: ग्लेशियरों और बर्फ की चादरों के पिघलने से तटीय क्षेत्रों के डूबने का खतरा।
  • जैव विविधता का क्षरण: कई प्रजातियां बदलते तापमान के अनुकूल नहीं हो पा रही हैं, जिससे उनके विलुप्त होने का खतरा बढ़ गया है (जैसे प्रवाल विरंजन)।

सामाजिक-आर्थिक प्रभाव

  • खाद्य और जल सुरक्षा पर खतरा: फसल की पैदावार में कमी और पानी के स्रोतों का सूखना।
  • मानव स्वास्थ्य: गर्मी से संबंधित बीमारियाँ, कुपोषण और वेक्टर-जनित रोगों (जैसे मलेरिया, डेंगू) का बढ़ता प्रसार।
  • विस्थापन और संघर्ष: संसाधनों की कमी और रहने योग्य भूमि के नुकसान के कारण लोग विस्थापित हो रहे हैं, जिन्हें ‘जलवायु शरणार्थी’ (Climate Refugees) कहा जाता है।

वैश्विक प्रतिक्रिया और प्रमुख समझौते

1. जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC)

IPCC स्वयं कोई शोध नहीं करता है, बल्कि यह दुनिया भर के हजारों वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध की समीक्षा और आकलन करता है और नीति निर्माताओं के लिए आकलन रिपोर्ट (Assessment Reports) तैयार करता है।

2. पेरिस समझौता (2015)

यह एक ऐतिहासिक समझौता है क्योंकि यह पहली बार सभी राष्ट्रों को जलवायु परिवर्तन से निपटने और इसके प्रभावों के अनुकूल होने के लिए महत्वाकांक्षी प्रयास करने के लिए एक साझा कारण में लाता है।
  • राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs): प्रत्येक देश अपने उत्सर्जन को कम करने के लिए अपनी स्वयं की योजनाएँ (NDCs) निर्धारित और प्रस्तुत करता है।
  • पारदर्शिता और वैश्विक स्टॉकटेक: प्रगति का आकलन करने के लिए हर 5 साल में एक वैश्विक स्टॉकटेक (Global Stocktake) किया जाता है।

भारत और जलवायु परिवर्तन

भारत अपनी लंबी तटरेखा, मानसून पर निर्भर कृषि और बड़ी आबादी के कारण जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।

भारत द्वारा उठाए गए कदम

  • जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPCC): 2008 में शुरू की गई, इसमें 8 मिशन शामिल हैं जो सौर ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता और सतत कृषि जैसे क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
  • पंचामृत लक्ष्य (COP26, ग्लासगो): भारत ने 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता प्राप्त करने और 2070 तक शुद्ध-शून्य (Net-Zero) उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने सहित पाँच महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किए हैं।

चुनौतियाँ और आगे की राह

जलवायु परिवर्तन से निपटने में सबसे बड़ी चुनौतियाँ जलवायु न्याय (Climate Justice), विकसित और विकासशील देशों के बीच वित्त और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, और आर्थिक विकास को डीकार्बोनाइज़ करने की आवश्यकता हैं। आगे की राह एक बहुआयामी दृष्टिकोण में निहित है:
  • ऊर्जा संक्रमण: जीवाश्म ईंधन से नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों (सौर, पवन) की ओर तेजी से बढ़ना।
  • अनुकूलन और लचीलापन: जलवायु परिवर्तन के अपरिहार्य प्रभावों का सामना करने के लिए समुदायों और बुनियादी ढांचे को तैयार करना।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: वैश्विक चुनौतियों के लिए वैश्विक समाधान की आवश्यकता होती है, जिसके लिए राष्ट्रों के बीच मजबूत सहयोग अनिवार्य है।
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