प्रारंभिक परीक्षाओं के लिए त्वरित तथ्य (Quick Facts for Prelims)
- सतत विकास (Sustainable Development): इस शब्द को 1987 में ब्रंटलैंड आयोग की रिपोर्ट ‘अवर कॉमन फ्यूचर’ में लोकप्रिय बनाया गया।
- प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle): इसे पहली बार 1972 में आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) द्वारा औपचारिक रूप दिया गया था।
- पूर्वोपााय सिद्धांत (Precautionary Principle): 1992 के रियो घोषणा के सिद्धांत 15 में इसे प्रमुखता से शामिल किया गया है।
- पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA): भारत में, EIA को पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत वैधानिक दर्जा प्राप्त है।
- चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy): यह पारंपरिक ‘लेने-बनाने-फेंकने’ वाले रैखिक मॉडल के विपरीत है।
सतत विकास (Sustainable Development)
सतत विकास की सबसे व्यापक रूप से स्वीकृत परिभाषा ब्रंटलैंड आयोग द्वारा दी गई है: “ऐसा विकास जो भविष्य की पीढ़ियों की अपनी जरूरतों को पूरा करने की क्षमता से समझौता किए बिना वर्तमान की जरूरतों को पूरा करता है।”- तीन स्तंभ: यह अवधारणा तीन परस्पर जुड़े स्तंभों पर आधारित है:
- पर्यावरणीय स्थिरता: प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और पारिस्थितिकी तंत्र की अखंडता को बनाए रखना।
- सामाजिक समानता: सभी लोगों के लिए समान अवसर और बुनियादी आवश्यकताओं तक पहुंच सुनिश्चित करना।
- आर्थिक व्यवहार्यता: पर्यावरण और समाज को नुकसान पहुँचाए बिना आर्थिक विकास को बढ़ावा देना।
- महत्व: यह विकास के एक ऐसे मॉडल की वकालत करता है जो समग्र हो। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (SDGs) इस अवधारणा का एक वैश्विक कार्यान्वयन ढाँचा हैं।
प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle)
यह सिद्धांत इस विचार पर आधारित है कि जो लोग प्रदूषण पैदा करते हैं, उन्हें उसे प्रबंधित करने और पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई करने की लागत वहन करनी चाहिए।- उद्देश्य: इसका उद्देश्य प्रदूषण की लागत को बाहरी (समाज द्वारा वहन) से आंतरिक (प्रदूषक द्वारा वहन) बनाना है। यह उद्योगों को स्वच्छ प्रौद्योगिकियों को अपनाने और प्रदूषण को कम करने के लिए प्रोत्साहित करता है।
- भारत में अनुप्रयोग: भारत के सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने कई मामलों में इस सिद्धांत को लागू किया है, जिसमें प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर जुर्माना लगाया गया है।
पूर्वोपााय सिद्धांत (Precautionary Principle)
यह सिद्धांत बताता है कि “जहां गंभीर या अपरिवर्तनीय क्षति के खतरे हैं, वहां पूर्ण वैज्ञानिक निश्चितता की कमी को पर्यावरण क्षरण को रोकने के लिए लागत प्रभावी उपायों को स्थगित करने के कारण के रूप में उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।”- उद्देश्य: यह ‘प्रतिक्रिया’ के बजाय ‘रोकथाम’ पर जोर देता है। यह नीति निर्माताओं को तब भी कार्रवाई करने की अनुमति देता है जब किसी गतिविधि के हानिकारक होने का कोई निर्णायक सबूत न हो, लेकिन संभावित खतरे के पर्याप्त संकेत हों।
- महत्व: यह विशेष रूप से उन मामलों में प्रासंगिक है जहां परिणाम अनिश्चित हैं, जैसे कि आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) फसलों या नई रासायनिक तकनीकों के मामले में।
पर्यावरणीय न्याय (Environmental Justice)
यह इस सिद्धांत को संदर्भित करता है कि पर्यावरण कानूनों, विनियमों और नीतियों के विकास, कार्यान्वयन और प्रवर्तन के संबंध में सभी लोगों के साथ, उनकी जाति, रंग, राष्ट्रीय मूल या आय की परवाह किए बिना, उचित व्यवहार और सार्थक भागीदारी होनी चाहिए।- मुख्य विचार: अक्सर, गरीब और हाशिए पर रहने वाले समुदाय प्रदूषणकारी उद्योगों और अपशिष्ट निपटान स्थलों के पास रहते हैं, जिससे वे असंगत रूप से पर्यावरणीय खतरों का बोझ उठाते हैं। पर्यावरणीय न्याय इस असमानता को दूर करने का प्रयास करता है।
चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy)
यह एक आर्थिक मॉडल है जिसका उद्देश्य कचरे को खत्म करना और संसाधनों के निरंतर उपयोग को बढ़ावा देना है।- सिद्धांत: यह 3R (Reduce, Reuse, Recycle) से आगे जाता है। यह उत्पादों और प्रणालियों को इस तरह से डिजाइन करने पर केंद्रित है कि वे टिकाऊ हों, मरम्मत योग्य हों, और जीवन-चक्र के अंत में उनके घटकों को आसानी से पुनर्प्राप्त और पुन: उपयोग किया जा सके।
- लाभ: यह न केवल पर्यावरणीय दबाव को कम करता है, बल्कि संसाधन दक्षता बढ़ाकर और नए व्यावसायिक अवसर पैदा करके आर्थिक लाभ भी प्रदान करता है।