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संरक्षण प्रयास (Conservation Efforts)

जैव विविधता के अभूतपूर्व क्षरण को देखते हुए, इसके संरक्षण के लिए वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर ठोस प्रयास किए जा रहे हैं। ये प्रयास न केवल नैतिक जिम्मेदारी हैं, बल्कि मानव कल्याण और पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने के लिए भी अनिवार्य हैं। संरक्षण के प्रयासों में वैज्ञानिक रणनीतियों, कानूनी ढाँचों, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और सामुदायिक भागीदारी का एक एकीकृत दृष्टिकोण शामिल है। इन प्रयासों का उद्देश्य प्रजातियों और उनके आवासों को तत्काल खतरों से बचाना और प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व को बढ़ावा देना है।
प्रारंभिक परीक्षाओं के लिए त्वरित तथ्य (Quick Facts for Prelims)
  • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम: 1972 में पारित हुआ, जो भारत में वन्यजीव संरक्षण का मुख्य कानूनी आधार है।
  • प्रोजेक्ट टाइगर: 1973 में बाघों के संरक्षण के लिए शुरू किया गया।
  • प्रोजेक्ट एलीफेंट: 1992 में हाथियों, उनके आवास और गलियारों की सुरक्षा के लिए शुरू किया गया।
  • IUCN (अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ): यह रेड डेटा सूची जारी करता है, जो प्रजातियों के संरक्षण की स्थिति का आकलन करती है।
  • रामसर कन्वेंशन (1971): यह आर्द्रभूमियों (Wetlands) के संरक्षण से संबंधित है।
  • जैव विविधता अधिनियम, भारत: 2002 में पारित हुआ, जो CBD के उद्देश्यों को लागू करता है।

संरक्षण की रणनीतियाँ (Conservation Strategies)

जैव विविधता संरक्षण के लिए मुख्य रूप से दो रणनीतियाँ अपनाई जाती हैं:

1. स्व-स्थाने संरक्षण (In-situ Conservation)

इसका अर्थ है प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवासों में ही संरक्षित करना। यह सबसे समग्र और प्रभावी दृष्टिकोण माना जाता है क्योंकि यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को बचाता है।
  • राष्ट्रीय उद्यान (National Parks): ये क्षेत्र वन्यजीवों और उनके आवासों के संरक्षण के लिए सख्ती से आरक्षित होते हैं। यहाँ मानवीय गतिविधियाँ लगभग प्रतिबंधित होती हैं। उदाहरण: जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान, उत्तराखंड।
  • वन्यजीव अभयारण्य (Wildlife Sanctuaries): यहाँ संरक्षण का स्तर राष्ट्रीय उद्यानों की तुलना में कम सख्त होता है और कुछ मानवीय गतिविधियों (जैसे लकड़ी इकट्ठा करना) की अनुमति होती है, जब तक कि वे वन्यजीवों को नुकसान न पहुँचाएँ। उदाहरण: पेरियार वन्यजीव अभयारण्य, केरल।
  • जीवमंडल भंडार (Biosphere Reserves): ये यूनेस्को (UNESCO) के ‘मैन एंड बायोस्फीयर’ (MAB) कार्यक्रम का हिस्सा हैं। इनका उद्देश्य संरक्षण, अनुसंधान और सतत विकास को एकीकृत करना है। इनमें एक कोर (Core), बफर (Buffer) और ट्रांज़िशन (Transition) ज़ोन होता है। भारत में 18 जीवमंडल भंडार हैं।
  • पवित्र उपवन (Sacred Groves): ये स्थानीय समुदायों द्वारा धार्मिक मान्यताओं के आधार पर संरक्षित वन क्षेत्र हैं, जो जैव विविधता के भंडार के रूप में काम करते हैं।

2. बाह्य-स्थाने संरक्षण (Ex-situ Conservation)

इसका अर्थ है संकटग्रस्त प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवास से बाहर निकालकर किसी सुरक्षित और कृत्रिम स्थान पर संरक्षित करना।
  • वानस्पतिक उद्यान और चिड़ियाघर: ये लुप्तप्राय पौधों और जानवरों के प्रजनन और संरक्षण के केंद्र के रूप में कार्य करते हैं।
  • जीन बैंक और बीज बैंक: इनमें संकटग्रस्त प्रजातियों के आनुवंशिक पदार्थों (जीन, बीज, शुक्राणु) को बहुत कम तापमान पर भविष्य के लिए संरक्षित किया जाता है। उदाहरण: नॉर्वे में स्थित स्वालबार्ड ग्लोबल सीड वॉल्ट।

भारत में संरक्षण के प्रयास: कानूनी और नीतिगत ढाँचा

प्रमुख अधिनियम

  • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972: यह अवैध शिकार और वन्यजीव उत्पादों के व्यापार को प्रतिबंधित करता है। यह विभिन्न प्रजातियों को उनकी संकट की स्थिति के आधार पर अलग-अलग अनुसूचियों (Schedules) में सूचीबद्ध करता है, जिससे उन्हें विभिन्न स्तरों की सुरक्षा मिलती है।
  • वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980: इसका उद्देश्य वन भूमि को गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिए उपयोग करने पर रोक लगाना है।
  • पर्यावरण (संरक्शन) अधिनियम, 1986: यह पर्यावरण संरक्षण के लिए एक छाता कानून (Umbrella Act) है।
  • जैव विविधता अधिनियम, 2002: यह जैव संसाधनों के सतत उपयोग और उनके उपयोग से होने वाले लाभों के उचित और समान बंटवारे को सुनिश्चित करता है।

प्रमुख संरक्षण परियोजनाएँ

  • प्रोजेक्ट टाइगर (1973): यह दुनिया की सबसे सफल संरक्षण परियोजनाओं में से एक है, जिसने भारत में बाघों की आबादी को विलुप्त होने से बचाया।
  • प्रोजेक्ट एलीफेंट (1992): इसका उद्देश्य हाथियों की आबादी, उनके आवास और प्रवास गलियारों की रक्षा करना है।
  • प्रोजेक्ट स्नो लेपर्ड (2009): यह उच्च हिमालयी क्षेत्रों में हिम तेंदुओं और उनके आवास के संरक्षण पर केंद्रित है।

वैश्विक संरक्षण प्रयास

  • IUCN (अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ): 1948 में स्थापित यह संगठन डेटा संग्रह, अनुसंधान और संरक्षण परियोजनाओं के माध्यम से प्रकृति संरक्षण को बढ़ावा देता है।
  • CITES (साइट्स, 1975): यह सुनिश्चित करता है कि वन्यजीवों और पौधों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से उनके अस्तित्व को खतरा न हो।
  • जैव विविधता पर कन्वेंशन (CBD, 1992): यह एक कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि है जिसके तीन मुख्य लक्ष्य हैं: जैव विविधता का संरक्षण, इसके घटकों का सतत उपयोग, और आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से होने वाले लाभों का उचित और समान बंटवारा।

चुनौतियाँ और आगे की राह

संरक्षण के प्रयासों के बावजूद, कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं, जैसे मानव-वन्यजीव संघर्ष, धन की कमी, राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव, और अवैध शिकार। आगे की राह एक एकीकृत संरक्षण दृष्टिकोण में निहित है जो विज्ञान, नीति और स्थानीय ज्ञान को जोड़ता है। संरक्षण को विकास की मुख्य धारा में शामिल करना, स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाना और संरक्षण के लाभों में उन्हें भागीदार बनाना सफलता के लिए महत्वपूर्ण है।
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