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आपदा प्रबंधन चक्र: एक सक्रिय दृष्टिकोण

आपदा प्रबंधन एक रैखिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि एक सतत और एकीकृत चक्र है। आपदा प्रबंधन चक्र (Disaster Management Cycle) एक ऐसा ढाँचा है जिसका उपयोग आपातकालीन प्रबंधन पेशेवर आपदाओं से पहले, उनके दौरान और बाद में की जाने वाली प्रमुख गतिविधियों को व्यवस्थित करने के लिए करते हैं। यह दृष्टिकोण पारंपरिक ‘राहत-केंद्रित’ मॉडल से एक बड़े बदलाव का प्रतीक है, जो अब रोकथाम, शमन और तैयारी पर जोर देता है। इस चक्र का उद्देश्य आपदाओं के नकारात्मक प्रभावों को कम करना, प्रभावी ढंग से प्रतिक्रिया करना और प्रभावित समुदायों को एक अधिक लचीले तरीके से पुनर्निर्माण करने में मदद करना है।
प्रारंभिक परीक्षाओं के लिए त्वरित तथ्य (Quick Facts for Prelims)
  • आपदा-पूर्व चरण: इसमें शमन (Mitigation) और तैयारी (Preparedness) शामिल हैं।
  • आपदा-पश्चात चरण: इसमें प्रतिक्रिया (Response) और पुनर्प्राप्ति (Recovery) शामिल हैं।
  • NDRF (राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल): आपदा प्रतिक्रिया के लिए भारत की विशेष विशेषज्ञ बल।
  • Build Back Better (BBB): पुनर्प्राप्ति चरण का एक प्रमुख सिद्धांत, जिसका उद्देश्य केवल पुनर्निर्माण करना नहीं, बल्कि भविष्य की आपदाओं के प्रति समुदाय के लचीलेपन को बढ़ाना है।
  • आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR): यह मुख्य रूप से शमन और तैयारी के चरणों से संबंधित है।

आपदा प्रबंधन चक्र के चरण

1. शमन (Mitigation)

यह चरण आपदा के घटित होने से पहले उसके प्रभाव को कम करने या खत्म करने पर केंद्रित है। यह जोखिम को कम करने के लिए दीर्घकालिक उपाय करता है।
  • संरचनात्मक उपाय (Structural Measures):
    • भूकंपरोधी भवनों का निर्माण और मौजूदा संरचनाओं की रेट्रोफिटिंग।
    • बाढ़ को नियंत्रित करने के लिए बांधों और तटबंधों का निर्माण।
    • चक्रवात आश्रयों का निर्माण।
  • गैर-संरचनात्मक उपाय (Non-structural Measures):
    • खतरनाक क्षेत्रों में भूमि-उपयोग की योजना और ज़ोनिंग नियम बनाना।
    • भवन संहिताओं को लागू करना।
    • सार्वजनिक जागरूकता अभियान चलाना।

2. तैयारी (Preparedness)

इस चरण में उन उपायों को शामिल किया जाता है जो आपदा आने पर समुदायों और सरकारों को प्रभावी ढंग से प्रतिक्रिया करने में सक्षम बनाते हैं।
  • प्रमुख गतिविधियाँ:
    • आपदा प्रबंधन योजनाओं का विकास करना।
    • प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early Warning Systems) स्थापित करना।
    • आपातकालीन आपूर्ति (भोजन, पानी, दवा) का भंडारण करना।
    • मॉक ड्रिल और प्रशिक्षण अभ्यास आयोजित करना।
    • समुदाय-आधारित आपदा तैयारी टीमों का गठन करना।

3. प्रतिक्रिया (Response)

यह चरण आपदा के दौरान और उसके तुरंत बाद शुरू होता है। इसका मुख्य उद्देश्य जीवन बचाना, पीड़ा कम करना और क्षति को कम करना है।
  • प्रमुख गतिविधियाँ:
    • खोज और बचाव (Search and Rescue) अभियान चलाना।
    • घायलों को तत्काल चिकित्सा सहायता प्रदान करना।
    • अस्थायी आश्रय, भोजन और पानी उपलब्ध कराना।
    • कानून और व्यवस्था बनाए रखना।
    • महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे (जैसे बिजली, संचार) को बहाल करना।

4. पुनर्प्राप्ति (Recovery)

यह चरण आपदा के तत्काल बाद शुरू होता है और वर्षों तक चल सकता है। इसका उद्देश्य प्रभावित समुदाय को सामान्य स्थिति में लाना है।
  • पुनर्वास (Rehabilitation): इसमें प्रभावित आबादी को अस्थायी आवास और वित्तीय सहायता प्रदान करके सामान्य जीवन में लौटने में मदद करना शामिल है।
  • पुनर्निर्माण (Reconstruction): इसमें क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे (घर, स्कूल, अस्पताल, सड़कें) का पुनर्निर्माण शामिल है। इस चरण में “Build Back Better” के सिद्धांत को लागू किया जाना चाहिए, जिसका अर्थ है कि नई संरचनाओं को भविष्य की आपदाओं का सामना करने के लिए अधिक मजबूत और लचीला बनाया जाए।

निष्कर्ष

आपदा प्रबंधन चक्र एक गतिशील प्रक्रिया है जहां एक चरण से सीखे गए सबक दूसरे चरण को सूचित करते हैं। उदाहरण के लिए, पुनर्प्राप्ति के दौरान पहचाने गए संरचनात्मक कमजोरियों को भविष्य की शमन रणनीतियों में शामिल किया जाना चाहिए। भारत के आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 ने इस समग्र और एकीकृत दृष्टिकोण को अपनाया है, जो देश को आपदाओं के प्रति अधिक लचीला बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
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