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पारितंत्र गतिकी (Ecosystem Dynamics)

पारिस्थितिकी तंत्र की गतिशीलता (Ecosystem Dynamics) का तात्पर्य किसी पारिस्थितिकी तंत्र के भीतर होने वाले परिवर्तनों, ऊर्जा के प्रवाह और पोषक तत्वों के चक्रण से है। यह एक सतत प्रक्रिया है जिसमें जैविक (living) और अजैविक (non-living) घटकों के बीच निरंतर अंतःक्रिया होती है। यह गतिशीलता ही किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र को स्थिर, लचीला और कार्यात्मक बनाती है। इसके अध्ययन से हम समझते हैं कि कैसे विभिन्न प्रजातियां एक-दूसरे पर निर्भर हैं और कैसे मानवीय हस्तक्षेप इस नाजुक संतुलन को बिगाड़ सकता है।
प्रारंभिक परीक्षाओं के लिए त्वरित तथ्य (Quick Facts for Prelims)
  • ‘पारिस्थितिकी तंत्र’ (Ecosystem) शब्द का प्रयोग सबसे पहले ए.जी. टैन्सले (A.G. Tansley) ने 1935 में किया था।
  • किसी पारिस्थितिकी तंत्र में ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय (Unidirectional) होता है, जबकि पोषक तत्वों का प्रवाह चक्रीय (Cyclic) होता है।
  • लिंडमैन का 10% नियम (Lindeman’s 10% Law): एक पोषण स्तर से दूसरे पोषण स्तर पर केवल 10% ऊर्जा ही स्थानांतरित होती है।
  • ऊर्जा का पिरामिड सदैव सीधा (Upright) होता है।
  • जैव-मात्रा (Biomass) का पिरामिड जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में उल्टा (Inverted) हो सकता है।
  • खाद्य जाल (Food Web) जितना जटिल होता है, पारिस्थितिकी तंत्र उतना ही स्थिर (Stable) माना जाता है।

पारिस्थितिकी तंत्र के कार्यात्मक पहलू (Functional Aspects of Ecosystem)

पारिस्थितिकी तंत्र की गतिशीलता उसके कार्यों से निर्धारित होती है, जिनमें ऊर्जा प्रवाह, खाद्य श्रृंखला, खाद्य जाल, पारिस्थितिक पिरामिड और पोषक चक्रण प्रमुख हैं।

1. ऊर्जा प्रवाह (Energy Flow)

सभी पारिस्थितिकी तंत्रों के लिए ऊर्जा का मूल स्रोत सूर्य है। हरे पौधे (उत्पादक) प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से सौर ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदलते हैं। जब शाकाहारी जीव पौधों को खाते हैं, तो यह ऊर्जा उनमें स्थानांतरित हो जाती है। इसके बाद मांसाहारी जीवों में यह ऊर्जा जाती है। यह प्रवाह हमेशा एकदिशीय होता है: सूर्य → उत्पादक → उपभोक्ता → अपघटक।
प्रत्येक पोषण स्तर (Trophic Level) पर ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 90%) श्वसन, गति और ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाता है। केवल 10% ऊर्जा ही अगले स्तर पर स्थानांतरित हो पाती है। इसे लिंडमैन का 10% नियम कहते हैं। यही कारण है कि खाद्य श्रृंखलाएं आमतौर पर 4-5 पोषण स्तरों तक ही सीमित होती हैं।

2. खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल (Food Chain and Food Web)

खाद्य श्रृंखला (Food Chain)

यह जीवों का एक रैखिक अनुक्रम है जिसमें पोषक तत्व और ऊर्जा एक जीव से दूसरे जीव में स्थानांतरित होते हैं। उदाहरण: घास → टिड्डा → मेंढक → सांप → बाज।
  • चारण खाद्य श्रृंखला (Grazing Food Chain): यह उत्पादकों (हरे पौधों) से शुरू होती है और शाकाहारी तथा मांसाहारी जीवों तक जाती है।
  • अपरद खाद्य श्रृंखला (Detritus Food Chain): यह मृत कार्बनिक पदार्थों (अपरद) से शुरू होती है और अपरदभक्षी (जैसे केंचुए, जीवाणु) से होकर गुजरती है।

खाद्य जाल (Food Web)

प्रकृति में, खाद्य श्रृंखलाएं isola3. पारिस्थितिक पिरामिड (Ecological Pyramids) यह एक पारिस्थितिकी तंत्र में विभिन्न पोषण स्तरों के बीच संबंधों का एक ग्राफिकल représentation है। इसे एल्टोनियन पिरामिड (Eltonian Pyramids) भी कहते हैं।

संख्या का पिरामिड (Pyramid of Numbers)

यह प्रत्येक पोषण स्तर पर जीवों की संख्या को दर्शाता है। यह आमतौर पर सीधा होता है (जैसे- घास के मैदान), लेकिन एक पेड़ के पारिस्थितिकी तंत्र में यह उल्टा हो सकता है, जहां एक पेड़ (उत्पादक) पर हजारों कीड़े (प्राथमिक उपभोक्ता) निर्भर होते हैं।

जैव-मात्रा का पिरामिड (Pyramid of Biomass)

यह प्रत्येक पोषण स्तर पर मौजूद कुल शुष्क भार (biomass) को दर्शाता है। स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र में यह सीधा होता है, लेकिन समुद्र या तालाब जैसे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में यह उल्टा हो सकता है, क्योंकि फाइटोप्लैंकटन (उत्पादक) का जीवनकाल कम होता है और उनका कुल बायोमास उन पर निर्भर ज़ोप्लैंकटन और मछलियों से कम हो सकता है।

ऊर्जा का पिरामिड (Pyramid of Energy)

यह प्रत्येक पोषण स्तर पर ऊर्जा प्रवाह की दर को दर्शाता है। ऊर्जा के 10% नियम के कारण, यह पिरामिड हमेशा सीधा होता है, क्योंकि ऊर्जा का प्रवाह निचले स्तर से ऊपरी स्तर की ओर घटता जाता है।

4. पोषक चक्रण (Nutrient Cycling)

इसे जैव-भू-रासायनिक चक्र (Biogeochemical Cycle) भी कहा जाता है। ऊर्जा के विपरीत, पोषक तत्व एक पारिस्थितिकी तंत्र में चक्रीय रूप से प्रवाहित होते हैं। अपघटक (Decomposers) मृत जीवों को विघटित करके पोषक तत्वों को वापस मिट्टी, पानी और हवा में छोड़ देते हैं, जहां से उत्पादक उन्हें फिर से उपयोग कर लेते हैं।
  • गैसीय चक्र (Gaseous Cycle): इसमें पोषक तत्वों का भंडार वायुमंडल या जलमंडल में होता है। उदाहरण: कार्बन चक्र, नाइट्रोजन चक्र।
  • अवसादी चक्र (Sedimentary Cycle): इसमें पोषक तत्वों का भंडार पृथ्वी की पपड़ी (चट्टानों) में होता है। उदाहरण: फास्फोरस चक्र, सल्फर चक्र।

मानवीय हस्तक्षेप और पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव (Human Intervention and Impact on Ecosystem)

मानवीय गतिविधियां पारिस्थितिकी तंत्र की गतिशीलता को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही हैं, जिससे इसका संतुलन बिगड़ रहा है।

प्रमुख प्रभाव

  • वनों की कटाई: यह उत्पादकों को नष्ट करती है, जिससे खाद्य जाल बाधित होता है और कार्बन चक्र प्रभावित होता है।
  • प्रदूषण: कीटनाशक जैसे रसायन खाद्य श्रृंखला में जमा हो सकते हैं (जिसे जैव-आवर्धन – Biomagnification कहते हैं), जो शीर्ष उपभोक्ताओं के लिए घातक हो सकता है।
  • आक्रामक प्रजातियों का प्रवेश: बाहरी प्रजातियां स्थानीय प्रजातियों को विस्थापित कर सकती हैं, जिससे खाद्य जाल और पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना बदल जाती है।
  • जलवायु परिवर्तन: यह प्रजातियों के वितरण को बदल रहा है और पारिस्थितिकी तंत्र की सेवाओं को बाधित कर रहा है।

आगे की राह: संतुलन की बहाली

पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए, इसकी गतिशीलता को समझना और संरक्षित करना महत्वपूर्ण है।
  • संरक्षण और पुनर्स्थापन: राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों के माध्यम से आवासों की रक्षा करना तथा वनीकरण जैसे कार्यक्रमों से निम्नीकृत पारिस्थितिकी तंत्रों को बहाल करना।
  • सतत कृषि: जैविक खेती और एकीकृत कीट प्रबंधन को अपनाकर रासायनिक प्रदूषण को कम करना।
  • प्रदूषण नियंत्रण: औद्योगिक उत्सर्जन और अपशिष्ट जल के उपचार के लिए सख्त नियम लागू करना।
  • नीतिगत हस्तक्षेप: भारत में जैव विविधता अधिनियम, 2002 और वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 जैसे कानूनों का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करना।
अंततः, यह समझना महत्वपूर्ण है कि मानव स्वयं पारिस्थितिकी तंत्र का एक हिस्सा है और इसका विनाश अंततः मानव अस्तित्व के लिए ही खतरा है।
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