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पर्यावरण: परिभाषा, क्षेत्र एवं घटक (Environment: Definition, Scope, and Components)

पर्यावरण शब्द फ्रांसीसी शब्द ‘Environer’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘घेरना’ या ‘चारों ओर’। सरल शब्दों में, हमारे आस-पास जो कुछ भी है, वह पर्यावरण का हिस्सा है। इसमें सभी जीवित और निर्जीव वस्तुएं, घटनाएं, और वे प्रभाव शामिल हैं जो हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं। यह एक जटिल और गतिशील प्रणाली है जिसमें मनुष्य, पौधे, जानवर, सूक्ष्मजीव और उनके भौतिक परिवेश के बीच निरंतर अंतःक्रिया होती रहती है।
प्रारंभिक परीक्षाओं के लिए त्वरित तथ्य (Quick Facts for Prelims)
  • ‘पर्यावरण’ शब्द फ्रांसीसी शब्द ‘Environer’ से बना है, जिसका अर्थ ‘घेरना’ है।
  • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अनुसार, पर्यावरण में जल, वायु, भूमि और मानव, अन्य जीवित प्राणियों, पौधों, सूक्ष्मजीवों और संपत्ति के बीच मौजूदा अंतर्संबंध शामिल हैं।
  • विश्व पर्यावरण दिवस प्रत्येक वर्ष 5 जून को मनाया जाता है।
  • पर्यावरण के मुख्य घटक जैविक (Biotic) और अजैविक (Abiotic) हैं।
  • पर्यावरण अध्ययन एक बहु-विषयक (multi-disciplinary) प्रकृति का है जिसमें विज्ञान, वाणिज्य और कला के विषय शामिल हैं।

पर्यावरण की परिभाषा (Definition of Environment)

पर्यावरण को किसी जीव को घेरने वाली कुल परिस्थितियों के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। यह उन सभी भौतिक, रासायनिक और जैविक कारकों का योग है जो एक जीव या पारिस्थितिकी तंत्र के अस्तित्व, विकास और प्रजनन को प्रभावित करते हैं।

भारत में, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अनुसार, “पर्यावरण में जल, वायु और भूमि तथा जल, वायु और भूमि और मानवों, अन्य जीवित प्राणियों, पौधों, सूक्ष्म-जीवों और संपत्ति के बीच विद्यमान अन्तर्सम्बन्ध सम्मिलित हैं।” यह परिभाषा पर्यावरण के व्यापक और अंतःक्रियात्मक स्वरूप को दर्शाती है।

पर्यावरण का कार्यक्षेत्र एवं अध्ययन का महत्व (Scope of Environment and Significance of its Study)

पर्यावरण का कार्यक्षेत्र बहुत विशाल और बहु-विषयक है। इसका अध्ययन हमें प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग, प्रदूषण नियंत्रण, जैव विविधता संरक्षण और जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौतियों का समाधान करने में मदद करता है। इसके अध्ययन का महत्व निम्नलिखित है:
  • समग्र दृष्टिकोण: यह हमें मानव गतिविधियों और प्राकृतिक प्रणालियों के बीच के जटिल संबंधों को समझने में मदद करता है।
  • संसाधन प्रबंधन: यह हमें जल, जंगल, खनिज जैसे प्राकृतिक संसाधनों का सतत (sustainable) तरीके से प्रबंधन करने का ज्ञान प्रदान करता है।
  • नीति निर्माण: पर्यावरणीय अध्ययन सरकारों को प्रदूषण नियंत्रण, संरक्षण और जलवायु कार्रवाई पर प्रभावी नीतियां बनाने के लिए वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है।
  • वैश्विक मुद्दों का समाधान: यह जलवायु परिवर्तन, ओजोन क्षरण, और जैव विविधता के नुकसान जैसी वैश्विक समस्याओं के कारणों, प्रभावों और समाधानों को समझने के लिए आवश्यक है।

पर्यावरण के घटक (Components of Environment)

पर्यावरण को मुख्य रूप से दो प्रमुख घटकों में विभाजित किया गया है: अजैविक (Abiotic) और जैविक (Biotic)। इन दोनों के अलावा, ऊर्जा घटक भी इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

1. अजैविक घटक (Abiotic Components)

ये पर्यावरण के निर्जीव भौतिक और रासायनिक तत्व हैं।

स्थलमंडल (Lithosphere)

यह पृथ्वी का सबसे ऊपरी ठोस भाग है, जो चट्टानों और खनिजों से बना है और मिट्टी की एक पतली परत से ढका हुआ है।

जलमंडल (Hydrosphere)

इसमें पृथ्वी पर मौजूद जल के सभी रूप शामिल हैं। पृथ्वी की सतह का लगभग 71% हिस्सा पानी से ढका हुआ है।

वायुमंडल (Atmosphere)

यह गैसों की एक बहु-स्तरीय परत है। इसमें मुख्य रूप से नाइट्रोजन (~78%) और ऑक्सीजन (~21%) होती हैं।

2. जैविक घटक (Biotic Components)

ये पर्यावरण के सभी जीवित जीव हैं।

उत्पादक (Producers)

इन्हें स्वपोषी (Autotrophs) भी कहा जाता है। ये प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं।

उपभोक्ता (Consumers)

इन्हें परपोषी (Heterotrophs) भी कहा जाता है। ये अपने पोषण के लिए उत्पादकों पर निर्भर रहते हैं।

अपघटक (Decomposers)

इन्हें मृतजीवी (Saprotrophs) भी कहा जाता है। ये मृत कार्बनिक पदार्थों को विघटित करके पोषक तत्वों को वापस पर्यावरण में छोड़ते हैं। सभी घटक एक दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। अजैविक घटक जैविक घटकों के अस्तित्व के लिए मंच प्रदान करते हैं, जबकि जैविक घटक अजैविक पर्यावरण को संशोधित और प्रभावित करते हैं। यह अंतर्निर्भरता एक स्थिर और कार्यात्मक पारिस्थितिकी तंत्र बनाती है।

मानव-पर्यावरण संबंध (Human-Environment Relationship)

यह संबंध समय के साथ विकसित हुआ है और इसे मुख्य रूप से तीन विचारधाराओं में समझा जा सकता है:

1. निश्चयवाद (Determinism)

इस विचारधारा के अनुसार, प्रकृति सर्वोपरि है और मानव सहित सभी जीव उसके अधीन हैं। मानव के सभी कार्य और निर्णय भौतिक पर्यावरण द्वारा नियंत्रित होते हैं। उदाहरण के लिए, ठंडे प्रदेशों के लोगों का जीवन गर्म प्रदेशों के लोगों से भिन्न होता है क्योंकि प्रकृति ने उन्हें वैसी परिस्थितियाँ दी हैं।

2. संभववाद (Possibilism)

यह विचारधारा मानती है कि पर्यावरण केवल संभावनाएं प्रस्तुत करता है और मानव अपनी बुद्धि और कौशल से उन संभावनाओं में से चुनाव करने के लिए स्वतंत्र है। इसके अनुसार, मानव एक सक्रिय कारक है जो पर्यावरण को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार संशोधित कर सकता है। उदाहरण: नदियों पर बांध बनाना या रेगिस्तान में सिंचाई करना।

3. नव-निश्चयवाद (Neo-determinism)

इसे ‘रुको और जाओ निश्चयवाद’ (Stop-and-Go Determinism) भी कहा जाता है। यह ग्रिफिथ टेलर द्वारा प्रतिपादित किया गया था। यह निश्चयवाद और संभववाद के बीच एक मध्य मार्ग है। इसके अनुसार, मानव को प्राकृतिक नियमों का पालन करते हुए विकास करना चाहिए। हम प्रकृति को केवल तब तक संशोधित कर सकते हैं जब तक कि हम उसके संतुलन को न बिगाड़ें। यह सतत विकास (Sustainable Development) की अवधारणा के बहुत करीब है।

वर्तमान पर्यावरणीय चुनौतियां और आगे की राह (Current Environmental Challenges and Way Forward)

मानव गतिविधियों ने पर्यावरण पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डाला है, जिससे कई गंभीर चुनौतियां उत्पन्न हुई हैं।

प्रमुख चुनौतियां

  • जलवायु परिवर्तन: ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के कारण वैश्विक तापमान में वृद्धि, जिससे मौसम के पैटर्न में चरम बदलाव, समुद्र के स्तर में वृद्धि और ग्लेशियरों का पिघलना हो रहा है।
  • प्रदूषण: वायु, जल, और भूमि प्रदूषण मानव स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक बड़ा खतरा है।
  • जैव विविधता का ह्रास: वनों की कटाई, अवैध शिकार और प्रदूषण के कारण पौधों और जानवरों की प्रजातियां तेजी से विलुप्त हो रही हैं।
  • संसाधनों का अत्यधिक दोहन: प्राकृतिक संसाधनों का गैर-टिकाऊ उपयोग भविष्य की पीढ़ियों के लिए उनकी उपलब्धता को खतरे में डाल रहा है।
  • अपशिष्ट प्रबंधन: विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में ठोस और इलेक्ट्रॉनिक कचरे का प्रबंधन एक बड़ी चुनौती है।

आगे की राह (Way Forward)

इन चुनौतियों से निपटने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है:
  • सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को अपनाना: संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित SDGs को प्राप्त करने के लिए राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर ठोस प्रयास करना।
  • नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा: जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करके सौर, पवन और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर बढ़ना।
  • चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy): ‘उपयोग करो और फेंको’ मॉडल के बजाय ‘पुनः उपयोग, मरम्मत और पुनर्चक्रण’ (Reuse, Repair, and Recycle) पर आधारित अर्थव्यवस्था को अपनाना।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: पेरिस समझौते जैसे अंतरराष्ट्रीय समझौतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करना।
  • प्रभावी कानून और नीति: पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 जैसे कानूनों का कड़ाई से कार्यान्वयन सुनिश्चित करना।
  • जन जागरूकता और भागीदारी: पर्यावरण संरक्षण में स्थानीय समुदायों और आम नागरिकों की भागीदारी को प्रोत्साहित करना।
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