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भारत में प्रमुख पर्यावरण अधिनियम और विनियम |

भारत का पर्यावरणीय कानूनी ढाँचा एक क्रमिक विकास का परिणाम है, जिसने देश को पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए एक मजबूत विधायी आधार प्रदान किया है। 1972 के स्टॉकहोम सम्मेलन के बाद, भारत ने पर्यावरण संरक्षण को संवैधानिक जनादेश दिया और कई व्यापक कानूनों को अधिनियमित किया। ये अधिनियम प्रदूषण नियंत्रण, वन्यजीव संरक्षण, वन संरक्षण और जैव विविधता के सतत उपयोग जैसे विभिन्न महत्वपूर्ण क्षेत्रों को कवर करते हैं। यह कानूनी ढाँचा न केवल विनियामक तंत्र स्थापित करता है, बल्कि पर्यावरण न्याय सुनिश्चित करने के लिए संस्थानों का भी निर्माण करता है।
प्रारंभिक परीक्षाओं के लिए त्वरित तथ्य (Quick Facts for Prelims)
  • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986: भोपाल गैस त्रासदी की प्रतिक्रिया में बनाया गया और इसे एक ‘छाता कानून’ माना जाता है।
  • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972: इसने राष्ट्रीय उद्यानों, अभयारण्यों की स्थापना के लिए कानूनी आधार प्रदान किया और अवैध शिकार पर रोक लगाई।
  • वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980: इसका मुख्य उद्देश्य वन भूमि को गैर-वन उद्देश्यों के लिए परिवर्तित होने से रोकना है।
  • जैव विविधता अधिनियम, 2002: यह जैव विविधता पर कन्वेंशन (CBD) के तहत भारत की प्रतिबद्धताओं को लागू करने के लिए है।
  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT), 2010: पर्यावरण संबंधी मामलों के लिए एक विशेष, तीव्र गति का न्यायालय।

प्रमुख पर्यावरण अधिनियम (Major Environmental Acts)

1. वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (Wildlife Protection Act, 1972)

यह भारत में वन्यजीवों के संरक्षण के लिए एक ऐतिहासिक कानून है।
  • उद्देश्य: देश के वन्य जीवों और वनस्पतियों को सुरक्षा प्रदान करना और अवैध शिकार, तस्करी और वन्यजीव उत्पादों के अवैध व्यापार को नियंत्रित करना।
  • मुख्य प्रावधान: इसने संकटग्रस्त प्रजातियों को उनकी सुरक्षा की आवश्यकता के अनुसार विभिन्न अनुसूचियों (Schedules I-VI) में सूचीबद्ध किया। इसने संरक्षित क्षेत्रों जैसे राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य, और संरक्षण भंडार की स्थापना का प्रावधान किया।

2. जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 (Water Act, 1974)

यह भारत में प्रदूषण नियंत्रण के लिए पहला व्यापक कानून था।
  • उद्देश्य: जल प्रदूषण को रोकना और नियंत्रित करना तथा देश में पानी की गुणवत्ता को बनाए रखना या बहाल करना।
  • मुख्य प्रावधान: इस अधिनियम के तहत केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCBs) की स्थापना की गई, जिन्हें जल प्रदूषण की निगरानी और विनियमन का कार्य सौंपा गया।

3. वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 (Forest Conservation Act, 1980)

यह अधिनियम वनों की कटाई को रोकने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
  • उद्देश्य: वनों के संरक्षण को सुनिश्चित करना और वन भूमि को गैर-वन उद्देश्यों (जैसे कृषि, उद्योग, खनन) के लिए उपयोग करने पर रोक लगाना।
  • मुख्य प्रावधान: इस अधिनियम के अनुसार, किसी भी आरक्षित वन को अनारक्षित करने या किसी भी वन भूमि को गैर-वन उद्देश्य के लिए उपयोग करने से पहले केंद्र सरकार की पूर्वानुमति अनिवार्य है।

4. वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 (Air Act, 1981)

स्टॉकहोम सम्मेलन के निर्णयों को लागू करने के लिए यह अधिनियम बनाया गया था।
  • उद्देश्य: वायु प्रदूषण को रोकना, नियंत्रित करना और कम करना।
  • मुख्य प्रावधान: यह CPCB और SPCBs को वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने की शक्तियाँ प्रदान करता है। 1987 में इसमें संशोधन करके ध्वनि प्रदूषण को भी वायु प्रदूषक के दायरे में शामिल किया गया।

5. पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 (Environment Protection Act, 1986)

इसे एक ‘अम्ब्रेला’ या ‘छाता’ विधान माना जाता है क्योंकि यह पर्यावरण संरक्षण के सभी प्रमुख क्षेत्रों को कवर करता है।
  • उद्देश्य: पर्यावरण की गुणवत्ता की रक्षा और सुधार करना तथा पर्यावरण प्रदूषण को नियंत्रित करना।
  • मुख्य प्रावधान: यह केंद्र सरकार को पर्यावरण की रक्षा के लिए नियम बनाने, मानक निर्धारित करने और आवश्यक उपाय करने की व्यापक शक्तियाँ देता है। इसके तहत पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना और तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) नियम जैसे महत्वपूर्ण विनियम जारी किए गए हैं।

6. जैव विविधता अधिनियम, 2002 (Biological Diversity Act, 2002)

यह अधिनियम जैव विविधता पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (CBD) के तहत भारत की प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए बनाया गया था।
  • उद्देश्य: जैव विविधता का संरक्षण, इसके घटकों का सतत उपयोग, और जैविक संसाधनों के उपयोग से होने वाले लाभों का उचित और समान बंटवारा।
  • मुख्य प्रावधान: इसने राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA), राज्य जैव विविधता बोर्ड (SBBs) और जैव विविधता प्रबंधन समितियों (BMCs) की त्रि-स्तरीय संरचना स्थापित की।

चुनौतियाँ और महत्व

भारत के पास एक मजबूत कानूनी ढाँचा है, लेकिन इसका प्रभावी कार्यान्वयन एक लगातार चुनौती बनी हुई है। प्रवर्तन एजेंसियों के पास संसाधनों की कमी, अंतर-एजेंसी समन्वय का अभाव, और न्यायिक देरी कुछ प्रमुख बाधाएँ हैं। इन चुनौतियों के बावजूद, इन कानूनों ने पर्यावरण क्षरण को कम करने, महत्वपूर्ण आवासों की रक्षा करने और पर्यावरण न्याय के लिए एक मंच प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना इस दिशा में एक सकारात्मक कदम रही है, जिसने पर्यावरण संबंधी मामलों के त्वरित निपटान में मदद की है।
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