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पर्यावरणीय प्रदूषण (Environmental Pollution)

पर्यावरण प्रदूषण का तात्पर्य पर्यावरण में ऐसे अवांछनीय पदार्थों के प्रवेश से है जिनका जीवित जीवों और पर्यावरण पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। औद्योगीकरण, शहरीकरण और जनसंख्या वृद्धि के कारण यह आज दुनिया के सामने सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक बन गया है। प्रदूषण न केवल मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा है, बल्कि यह पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को भी बिगाड़ता है, जिससे जैव विविधता का क्षरण होता है और जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
प्रारंभिक परीक्षाओं के लिए त्वरित तथ्य (Quick Facts for Prelims)
  • प्रदूषक (Pollutant): कोई भी पदार्थ (ठोस, तरल या गैस) जो अपनी सांद्रता में प्राकृतिक प्रचुरता से अधिक हो जाता है और हानिकारक प्रभाव डालता है।
  • प्राथमिक और द्वितीयक प्रदूषक: प्राथमिक प्रदूषक सीधे स्रोत से उत्सर्जित होते हैं (जैसे CO, SO2)। द्वितीयक प्रदूषक तब बनते हैं जब प्राथमिक प्रदूषक वातावरण में प्रतिक्रिया करते हैं (जैसे ओजोन (O3), PAN)।
  • BOD (बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड): यह पानी में मौजूद कार्बनिक पदार्थों को विघटित करने के लिए सूक्ष्मजीवों द्वारा आवश्यक ऑक्सीजन की मात्रा है। उच्च BOD का अर्थ है उच्च जल प्रदूषण।
  • सुपोषण (Eutrophication): जलाशयों में पोषक तत्वों (विशेषकर नाइट्रोजन और फास्फोरस) के संवर्धन की प्रक्रिया, जिससे अत्यधिक शैवाल वृद्धि (Algal Bloom) होती है।
  • मिनामाता कन्वेंशन: यह पारा (Mercury) के दुष्प्रभावों से मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण की रक्षा के लिए एक वैश्विक संधि है।
  • स्टॉकहोम कन्वेंशन: यह स्थायी कार्बनिक प्रदूषकों (Persistent Organic Pollutants – POPs) को खत्म करने या प्रतिबंधित करने पर केंद्रित है।

वायु प्रदूषण (Air Pollution)

वायुमंडल में हानिकारक गैसों, धूलकणों और धुएं की उपस्थिति जो मानव, पौधों और जानवरों के लिए हानिकारक है, वायु प्रदूषण कहलाती है।

प्रमुख प्रदूषक और उनके स्रोत

  • कार्बन मोनोऑक्साइड (CO): वाहनों और उद्योगों में जीवाश्म ईंधन के अधूरे दहन से उत्पन्न होती है।
  • सल्फर डाइऑक्साइड (SO2): कोयला आधारित बिजली संयंत्रों और औद्योगिक बॉयलरों से उत्सर्जित होती है।
  • नाइट्रोजन के ऑक्साइड (NOx): वाहनों के उत्सर्जन और उच्च तापमान पर दहन प्रक्रियाओं से बनते हैं।
  • निलंबित कण पदार्थ (SPM – PM2.5 और PM10): निर्माण गतिविधियों, सड़कों की धूल और औद्योगिक प्रक्रियाओं से उत्पन्न होते हैं।

प्रभाव

  • मानव स्वास्थ्य: श्वसन संबंधी रोग (अस्थमा, ब्रोंकाइटिस), हृदय रोग और कैंसर।
  • पर्यावरण: अम्लीय वर्षा (Acid Rain), जो SO2 और NOx के कारण होती है; स्मॉग (Smog) का निर्माण; और ओजोन परत का क्षरण।

नियंत्रण के उपाय

  • उद्योगों में स्क्रबर और इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रेसिपिटेटर जैसे फिल्टर का उपयोग करना।
  • स्वच्छ ईंधन जैसे CNG और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना।
  • कड़े उत्सर्जन मानकों को लागू करना (जैसे भारत स्टेज-VI)।
  • सार्वजनिक परिवहन का उपयोग बढ़ाना और वनीकरण को प्रोत्साहित करना।

जल प्रदूषण (Water Pollution)

[Image of polluted water with plastic waste] जब हानिकारक पदार्थ जैसे रसायन, सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट जल निकायों में मिल जाते हैं, तो यह जल प्रदूषण का कारण बनता है।

प्रमुख प्रदूषक और उनके स्रोत

  • घरेलू सीवेज: कार्बनिक पदार्थ और रोगजनक सूक्ष्मजीव।
  • औद्योगिक अपशिष्ट: भारी धातुएँ (जैसे सीसा, पारा, कैडमियम) और जहरीले रसायन।
  • कृषि अपवाह: उर्वरकों (नाइट्रेट, फॉस्फेट) और कीटनाशकों का पानी में मिलना।
  • तेल रिसाव: समुद्री टैंकरों से तेल का रिसाव।

प्रभाव

  • मानव स्वास्थ्य: जल जनित रोग जैसे हैजा, टाइफाइड, पीलिया। भारी धातुओं के सेवन से तंत्रिका तंत्र को नुकसान।
  • पारिस्थितिकी तंत्र: सुपोषण (Eutrophication), जलीय जीवन का विनाश, और जैव-आवर्धन (Biomagnification)।

नियंत्रण के उपाय

  • शहरी क्षेत्रों में सीवेज उपचार संयंत्र (STPs) स्थापित करना।
  • औद्योगिक बहिःस्रावों के उपचार के लिए एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (ETPs) को अनिवार्य करना।
  • जैविक खेती को बढ़ावा देकर उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग को कम करना।
  • जल निकायों में ठोस अपशिष्ट और कचरे के सीधे निपटान पर रोक लगाना।

मृदा प्रदूषण (Soil Pollution)

मिट्टी में अवांछित रसायनों या अन्य पदार्थों की उपस्थिति जो पौधों की वृद्धि को प्रभावित करती है और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा करती है।

प्रमुख प्रदूषक और उनके स्रोत

  • औद्योगिक अपशिष्ट: रसायनों और भारी धातुओं का अनुचित निपटान।
  • कृषि गतिविधियाँ: कीटनाशकों, शाकनाशियों और उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग।
  • ठोस अपशिष्ट: गैर-बायोडिग्रेडेबल कचरा जैसे प्लास्टिक का जमाव।

प्रभाव

  • मिट्टी की उर्वरता में कमी, भूजल का संदूषण, और खाद्य श्रृंखला में विषाक्त पदार्थों का प्रवेश।

नियंत्रण के उपाय

  • ठोस अपशिष्ट का उचित प्रबंधन, जिसमें पृथक्करण और पुनर्चक्रण शामिल है।
  • प्लास्टिक के उपयोग को कम करना और उसके विकल्पों को बढ़ावा देना।
  • दूषित मिट्टी के उपचार के लिए बायोरेमेडिएशन (सूक्ष्मजीवों का उपयोग) और फाइटोरेमेडिएशन (पौधों का उपयोग) जैसी तकनीकों का प्रयोग।
  • जैविक खेती को अपनाना।

ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution)

अप्रिय या अत्यधिक ध्वनि जो मानव और पशु जीवन के लिए असुविधा और स्वास्थ्य समस्याएं पैदा करती है।

स्रोत

  • उद्योग, वाहन, निर्माण कार्य, लाउडस्पीकर और हवाई जहाज।

प्रभाव

  • उच्च रक्तचाप, सुनने की क्षमता में कमी, नींद की समस्या और तनाव।

नियंत्रण के उपाय

  • अस्पतालों और स्कूलों के आसपास ‘साइलेंस जोन’ घोषित करना।
  • सड़कों और औद्योगिक क्षेत्रों के किनारे हरित पट्टी (Green Belt) विकसित करना, क्योंकि पेड़ ध्वनि को अवशोषित करते हैं।
  • वाहनों में उचित साइलेंसर का उपयोग और नियमित रखरखाव।
  • औद्योगिक मशीनों और घरेलू उपकरणों में ध्वनि-रोधी तकनीक का उपयोग।

प्रदूषण नियंत्रण: चुनौतियाँ और आगे की राह

भारत ने प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए वायु अधिनियम (1981) और जल अधिनियम (1974) जैसे कई कानून बनाए हैं, लेकिन उनका कार्यान्वयन एक बड़ी चुनौती है। तीव्र शहरीकरण, औद्योगिक विकास का दबाव और सार्वजनिक जागरूकता की कमी इस समस्या को और बढ़ा देती है। आगे की राह एक एकीकृत दृष्टिकोण अपनाने में है, जिसमें सख्त विनियमन, स्वच्छ प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देना (जैसे BS-VI मानदंड, इलेक्ट्रिक वाहन), अपशिष्ट प्रबंधन में सुधार (3R – Reduce, Reuse, Recycle का सिद्धांत), और नागरिक भागीदारी को प्रोत्साहित करना शामिल है। सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रदूषण पर नियंत्रण पाना अनिवार्य है।
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