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ग्लोबल वार्मिंग और ग्रीनहाउस प्रभाव

ग्लोबल वार्मिंग और ग्रीनहाउस प्रभाव दो आपस में जुड़ी हुई अवधारणाएँ हैं जो जलवायु परिवर्तन को समझने के केंद्र में हैं। ग्रीनहाउस प्रभाव (Greenhouse Effect) एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जो पृथ्वी की सतह को रहने योग्य बनाती है, जबकि ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) मुख्य रूप से मानवीय गतिविधियों के कारण इस प्रभाव के तीव्र होने को संदर्भित करती है, जिससे पृथ्वी के औसत तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है। इन दोनों के बीच के अंतर और संबंध को समझना जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिए आवश्यक है।
प्रारंभिक परीक्षाओं के लिए त्वरित तथ्य (Quick Facts for Prelims)
  • ग्रीनहाउस प्रभाव की खोज: 1824 में जोसेफ फूरियर (Joseph Fourier) द्वारा की गई।
  • प्रमुख ग्रीनहाउस गैसें (GHGs): जल वाष्प (H2O), कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), मीथेन (CH4), नाइट्रस ऑक्साइड (N2O), और फ्लोरिनेटेड गैसें।
  • ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल (GWP): यह एक माप है कि एक निश्चित अवधि (आमतौर पर 100 वर्ष) में कोई गैस CO2 की तुलना में कितनी गर्मी को रोकती है। मीथेन का GWP CO2 से लगभग 28-34 गुना अधिक है।
  • CO2 सांद्रता: पूर्व-औद्योगिक काल में लगभग 280 पीपीएम (पार्ट्स पर मिलियन) से बढ़कर वर्तमान में 420 पीपीएम से अधिक हो गई है।

ग्रीनहाउस प्रभाव: एक विस्तृत अवलोकन

प्राकृतिक ग्रीनहाउस प्रभाव (Natural Greenhouse Effect)

यह एक जीवन-sustaining प्रक्रिया है। जब सूर्य का विकिरण पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करता है, तो इसका कुछ हिस्सा सतह द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है, जिससे वह गर्म हो जाती है। पृथ्वी फिर इस गर्मी को वापस इन्फ्रारेड विकिरण के रूप में अंतरिक्ष में भेजती है। वायुमंडल में मौजूद ग्रीनहाउस गैसें (जैसे जल वाष्प, CO2) इस बाहर जाने वाले इन्फ्रारेड विकिरण के एक हिस्से को सोख लेती हैं और इसे सभी दिशाओं में फिर से उत्सर्जित करती हैं, जिसमें से कुछ वापस पृथ्वी की सतह की ओर लौट आता है। यह प्रक्रिया पृथ्वी को एक आरामदायक औसत तापमान पर रखती है, जिसके बिना पृथ्वी बहुत ठंडी होती। [Image of the Greenhouse Effect diagram]

वर्धित ग्रीनहाउस प्रभाव (Enhanced Greenhouse Effect)

औद्योगिक क्रांति के बाद से, मानवीय गतिविधियों, विशेष रूप से जीवाश्म ईंधन के जलने से, वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों, विशेष रूप से CO2 की सांद्रता में नाटकीय रूप से वृद्धि हुई है। यह अतिरिक्त गैसें अधिक गर्मी को रोकती हैं, जिससे प्राकृतिक प्रभाव तीव्र हो जाता है। यही वर्धित ग्रीनहाउस प्रभाव ग्लोबल वार्मिंग का मुख्य चालक है।

ग्लोबल वार्मिंग: कारण और तंत्र

ग्लोबल वार्मिंग पृथ्वी के जलवायु तंत्र में देखे गए औसत तापमान में सदी-पैमाने पर वृद्धि है, जो इसके प्रभावों के साथ जारी रहने की उम्मीद है।

मानव-जनित कारण (Anthropogenic Causes)

  • जीवाश्म ईंधन का दहन: ऊर्जा उत्पादन, परिवहन और उद्योगों के लिए कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस का जलना CO2 उत्सर्जन का सबसे बड़ा स्रोत है।
  • वनों की कटाई (Deforestation): वन कार्बन सिंक के रूप में कार्य करते हैं, जो वायुमंडल से CO2 को अवशोषित करते हैं। पेड़ों को काटने से यह क्षमता कम हो जाती है और संग्रहीत कार्बन वापस वायुमंडल में छोड़ दिया जाता है।
  • कृषि पद्धतियाँ: पशुधन (मीथेन उत्सर्जन), धान की खेती (मीथेन उत्सर्जन), और उर्वरकों का उपयोग (नाइट्रस ऑक्साइड उत्सर्जन) ग्रीनहाउस गैसों में महत्वपूर्ण योगदान करते हैं।
  • औद्योगिक प्रक्रियाएँ: सीमेंट और स्टील जैसे उद्योगों के उत्पादन में बड़ी मात्रा में CO2 का उत्सर्जन होता है।

ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव

[Image of melting glaciers and rising sea levels] ग्लोबल वार्मिंग के दूरगामी और विनाशकारी प्रभाव हैं, जो सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन की विभिन्न घटनाओं को जन्म देते हैं:
  • तापमान में वृद्धि: भूमि और महासागरों दोनों के औसत तापमान में लगातार वृद्धि, जिससे हीटवेव की घटनाओं में तेजी आ रही है।
  • समुद्र के स्तर में वृद्धि: तापीय विस्तार (गर्म होने पर पानी का फैलना) और ग्लेशियरों और बर्फ की चादरों के पिघलने के कारण समुद्र का स्तर बढ़ रहा है, जिससे तटीय समुदायों को खतरा है।
  • पारिस्थितिक तंत्र पर प्रभाव: प्रवाल विरंजन, प्रजातियों के प्रवासन पैटर्न में बदलाव और जैव विविधता का नुकसान।
  • चरम मौसम की घटनाएँ: अधिक तीव्र और लगातार तूफान, बाढ़, सूखा और जंगल की आग।

शमन और आगे की राह

ग्लोबल वार्मिंग से निपटना एक वैश्विक प्राथमिकता है और इसके लिए तत्काल और ठोस कार्रवाई की आवश्यकता है।
  • ऊर्जा संक्रमण: जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना और सौर, पवन और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को अपनाना।
  • ऊर्जा दक्षता: उद्योगों, भवनों और परिवहन में ऊर्जा की खपत को कम करना।
  • वनरोपण और पुनर्वनीकरण: वायुमंडल से CO2 को हटाने के लिए अधिक पेड़ लगाना।
  • सतत कृषि: जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना जो उत्सर्जन को कम करती हैं।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: पेरिस समझौते जैसे वैश्विक समझौतों के तहत निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सभी देशों को मिलकर काम करना होगा। विकासशील देशों को स्वच्छ प्रौद्योगिकी अपनाने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुकूल होने के लिए विकसित देशों से वित्तीय और तकनीकी सहायता की आवश्यकता है।
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