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भारत में पर्यावरण संस्थान और तंत्र

भारत में पर्यावरण कानूनों और नीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए एक सुविकसित संस्थागत ढाँचा और विनियामक तंत्र मौजूद हैं। ये संस्थान केंद्रीय, राज्य और स्थानीय स्तरों पर पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार हैं। इन संस्थानों की भूमिका नीतियों को लागू करने से लेकर अनुपालन की निगरानी करने और पर्यावरणीय न्याय प्रदान करने तक फैली हुई है। इन तंत्रों और संस्थानों की कार्यप्रणाली को समझना भारत के पर्यावरण शासन को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
प्रारंभिक परीक्षाओं के लिए त्वरित तथ्य (Quick Facts for Prelims)
  • MoEFCC (पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय): पर्यावरण शासन के लिए भारत में नोडल एजेंसी।
  • CPCB (केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड): जल अधिनियम, 1974 के तहत गठित एक सांविधिक संगठन।
  • NGT (राष्ट्रीय हरित अधिकरण): NGT अधिनियम, 2010 के तहत स्थापित एक विशेष न्यायिक निकाय।
  • EIA (पर्यावरण प्रभाव आकलन): पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत पहली बार 1994 में अधिसूचित किया गया।
  • वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB): वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत गठित एक सांविधिक बहु-अनुशासनात्मक निकाय।

प्रमुख पर्यावरण संस्थान (Major Environmental Institutions)

1. पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC)

यह भारत में पर्यावरण और वानिकी से संबंधित नीतियों और कार्यक्रमों की योजना, प्रचार, समन्वय और कार्यान्वयन की निगरानी के लिए केंद्र सरकार की नोडल एजेंसी है। यह देश में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP), अंतर्राष्ट्रीय एकीकृत पर्वत विकास केंद्र (ICIMOD) और दक्षिण एशिया सहकारी पर्यावरण कार्यक्रम (SACEP) के लिए भी नोडल एजेंसी है।

2. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB)

Central Pollution Control Board (CPCB), एक सांविधिक संगठन है जिसका गठन जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के तहत किया गया था। इसे वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के तहत भी शक्तियाँ और कार्य सौंपे गए हैं।
  • कार्य: जल और वायु प्रदूषण की रोकथाम, नियंत्रण और उपशमन के लिए एक व्यापक कार्यक्रम की योजना बनाना और उसे क्रियान्वित करना; राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों (SPCBs) की गतिविधियों का समन्वय करना; और सरकार को सलाह देना।

3. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal – NGT)

यह NGT अधिनियम, 2010 के तहत स्थापित एक विशेष न्यायिक निकाय है, जिसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण और वनों के संरक्षण से संबंधित मामलों का प्रभावी और शीघ्र निपटान करना है।
  • महत्व: NGT सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत निर्धारित प्रक्रिया से बाध्य नहीं है, बल्कि ‘प्राकृतिक न्याय’ के सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होता है। यह आवेदनों का 6 महीने के भीतर निपटान करने के लिए अनिवार्य है।

4. राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (National Biodiversity Authority – NBA)

जैविक विविधता अधिनियम, 2002 के प्रावधानों को लागू करने के लिए 2003 में स्थापित, NBA एक सांविधिक, स्वायत्त निकाय है। यह जैव-सर्वेक्षण और जैव-उपयोग से संबंधित सभी मामलों पर एक नियामक और सलाहकार के रूप में कार्य करता है।

प्रमुख विनियामक तंत्र (Major Regulatory Mechanisms)

1. पर्यावरण प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment – EIA)

EIA प्रस्तावित परियोजनाओं के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन करने के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण है। यह निर्णय लेने की प्रक्रिया में पर्यावरणीय विचारों को एकीकृत करने का एक प्रयास है।
  • प्रक्रिया: इसमें स्क्रीनिंग, स्कोपिंग, सार्वजनिक सुनवाई और मूल्यांकन जैसे चरण शामिल हैं, जिसके बाद परियोजना को पर्यावरण मंजूरी (Environmental Clearance) दी जाती है या अस्वीकार कर दिया जाता है।
  • कानूनी आधार: इसे पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत अधिसूचित किया गया है। वर्तमान में EIA अधिसूचना 2006 लागू है, जिसके मसौदे 2020 पर काफी बहस हुई है।

2. तटीय विनियमन क्षेत्र (Coastal Regulation Zone – CRZ)

CRZ अधिसूचना नाजुक तटीय पारिस्थितिकी तंत्रों की रक्षा के लिए तट के किनारे की गतिविधियों को नियंत्रित करती है।
  • वर्गीकरण: यह तट को विभिन्न क्षेत्रों (CRZ-I, II, III, IV) में विभाजित करता है, जो पारिस्थितिक संवेदनशीलता और विकास के स्तर पर आधारित होता है, और प्रत्येक क्षेत्र में अनुमेय गतिविधियों को निर्धारित करता है।

चुनौतियाँ और आगे की राह

भारत के संस्थागत ढाँचे को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिनमें तकनीकी और वित्तीय क्षमता की कमी, राजनीतिक हस्तक्षेप, और कानूनों का कमजोर प्रवर्तन शामिल है। अक्सर, विभिन्न संस्थानों के बीच समन्वय का अभाव भी प्रभावी कार्यान्वयन में बाधा डालता है। आगे की राह इन संस्थानों को मजबूत करने, उनकी स्वायत्तता सुनिश्चित करने, निर्णय लेने में पारदर्शिता बढ़ाने और प्रक्रियाओं में सार्वजनिक भागीदारी को प्रोत्साहित करने में निहित है। एक मजबूत, स्वतंत्र और संसाधन-संपन्न संस्थागत ढाँचा ही भारत को अपने सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद कर सकता है।
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