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अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण ढाँचे: सम्मेलन और समझौते

पर्यावरणीय समस्याएँ जैसे जलवायु परिवर्तन, ओजोन परत का क्षरण और जैव विविधता का नुकसान किसी एक देश की सीमाओं तक सीमित नहीं हैं; ये वैश्विक चुनौतियाँ हैं जिनके समाधान के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता होती है। इसी अहसास के चलते पिछले कुछ दशकों में कई अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों, संधियों और समझौतों का विकास हुआ है। ये ढाँचे राष्ट्रों को सामान्य लक्ष्यों के लिए एक साथ काम करने, वैज्ञानिक जानकारी साझा करने और पर्यावरणीय गिरावट को रोकने के लिए सामूहिक कार्रवाई करने के लिए एक मंच प्रदान करते हैं।
प्रारंभिक परीक्षाओं के लिए त्वरित तथ्य (Quick Facts for Prelims)
  • स्टॉकहोम सम्मेलन (1972): इसे वैश्विक पर्यावरण शासन की शुरुआत माना जाता है। UNEP का गठन इसी के परिणामस्वरूप हुआ।
  • रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन (1992): इसके परिणामस्वरूप तीन प्रमुख सम्मेलन हुए: UNFCCC, CBD और UNCCD।
  • मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987): ओजोन-क्षयकारी पदार्थों (ODS) को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लिए एक सफल संधि।
  • क्योटो प्रोटोकॉल (1997): UNFCCC के तहत पहला समझौता जिसने विकसित देशों (Annex-I) के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी उत्सर्जन लक्ष्य निर्धारित किए।
  • पेरिस समझौता (2015): यह सभी देशों को एक साथ लाता है, जिसका लक्ष्य वैश्विक तापमान वृद्धि को 2°C से नीचे रखना है।
  • CBDR-RC: ‘साझा लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व और संबंधित क्षमताएं’ का सिद्धांत, जो UNFCCC वार्ताओं का एक मूल सिद्धांत है।

जलवायु परिवर्तन पर केंद्रित ढाँचे

जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC)

1992 में रियो डी जनेरियो में हुए पृथ्वी शिखर सम्मेलन में अपनाया गया, UNFCCC जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए लगभग सार्वभौमिक सदस्यता वाला एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है।
  • उद्देश्य: वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैस सांद्रता को एक ऐसे स्तर पर स्थिर करना जो जलवायु प्रणाली के साथ खतरनाक मानवजनित हस्तक्षेप को रोके।
  • कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज (COP): यह कन्वेंशन का सर्वोच्च निर्णय लेने वाला निकाय है, जिसकी बैठक हर साल होती है।

क्योटो प्रोटोकॉल (Kyoto Protocol)

1997 में अपनाया गया, यह प्रोटोकॉल UNFCCC को क्रियान्वित करता है।
  • मुख्य विशेषता: इसने विकसित देशों (जिन्हें Annex-I देश कहा जाता है) के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी लक्ष्य निर्धारित किए। इसने साझा लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व (CBDR) के सिद्धांत को क्रियान्वित किया।
  • बाजार तंत्र: इसने उत्सर्जन कटौती को प्राप्त करने में मदद के लिए तीन बाजार-आधारित तंत्र पेश किए: उत्सर्जन व्यापार (Emissions Trading), स्वच्छ विकास तंत्र (Clean Development Mechanism – CDM), और संयुक्त कार्यान्वयन (Joint Implementation)।

पेरिस समझौता (Paris Agreement)

2015 में COP21 में अपनाया गया, यह क्योटो प्रोटोकॉल से आगे बढ़कर एक अधिक व्यापक और महत्वाकांक्षी ढाँचा प्रदान करता है।
  • मुख्य विशेषता: यह एक ‘बॉटम-अप’ दृष्टिकोण अपनाता है, जहाँ प्रत्येक देश अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) को निर्धारित करता है, प्रस्तुत करता है और बनाए रखता है।
  • तापमान लक्ष्य: इसका लक्ष्य वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2°C से काफी नीचे तक सीमित करना है, और तापमान वृद्धि को 1.5°C तक सीमित करने का प्रयास करना है।
  • वैश्विक स्टॉकटेक: प्रगति का आकलन करने के लिए 2023 से शुरू होकर हर पांच साल में एक वैश्विक मूल्यांकन किया जाएगा।

अन्य प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय समझौते

ओजोन परत के संरक्षण के लिए वियना कन्वेंशन और मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल

  • मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987): इसे अब तक का सबसे सफल अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण समझौता माना जाता है। इसने क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) जैसे ओजोन-क्षयकारी पदार्थों के उत्पादन और खपत को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लिए एक समय सारिणी निर्धारित की।

जैव विविधता पर कन्वेंशन (CBD)

1992 के रियो शिखर सम्मेलन का एक और प्रमुख परिणाम, CBD के तीन मुख्य उद्देश्य हैं:
  1. जैव विविधता का संरक्षण।
  2. जैव विविधता के घटकों का सतत उपयोग।
  3. आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से होने वाले लाभों का उचित और समान बंटवारा।
इसके तहत कार्टाजेना प्रोटोकॉल (जैव सुरक्षा पर) और नागोया प्रोटोकॉल (पहुँच और लाभ-साझाकरण पर) आते हैं।

मरुस्थलीकरण का मुकाबला करने के लिए संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (UNCCD)

यह भी रियो सम्मेलनों में से एक है और मरुस्थलीकरण और सूखे के गंभीर प्रभावों को संबोधित करने वाला एकमात्र कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय समझौता है।

चुनौतियाँ और आगे की राह

इन ढाँचों के बावजूद, प्रभावी कार्यान्वयन एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। जलवायु वित्त (विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को प्रदान की जाने वाली वित्तीय सहायता), प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, और राष्ट्रीय संप्रभुता बनाम वैश्विक जिम्मेदारी के बीच संतुलन जैसे मुद्दे अक्सर वार्ताओं में बाधा डालते हैं। आगे की राह सभी देशों द्वारा अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने, महत्वाकांक्षा के स्तर को बढ़ाने और एक न्यायसंगत और टिकाऊ भविष्य के लिए सहयोग करने में निहित है।
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