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भारत में पर्यावरण कानूनी और नीतिगत ढाँचा

भारत में पर्यावरण संरक्षण का कानूनी और नीतिगत ढांचा समय के साथ विकसित हुआ है, जो देश की बदलती पर्यावरणीय चुनौतियों और वैश्विक प्रतिबद्धताओं को दर्शाता है। स्वतंत्रता के बाद शुरुआती वर्षों में पर्यावरण संरक्षण पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया, लेकिन 1972 के स्टॉकहोम सम्मेलन ने एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में कार्य किया, जिसने भारत को पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर एक व्यापक विधायी दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद, संविधान में संशोधन, विशिष्ट अधिनियमों के निर्माण और विशेषीकृत संस्थानों की स्थापना ने भारत के पर्यावरण शासन को एक मजबूत आधार प्रदान किया है।
प्रारंभिक परीक्षाओं के लिए त्वरित तथ्य (Quick Facts for Prelims)
  • संवैधानिक संशोधन: 42वां संशोधन, 1976, जिसके द्वारा अनुच्छेद 48A और 51A(g) जोड़े गए।
  • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986: इसे ‘छाता विधान’ (Umbrella Legislation) कहा जाता है और यह भोपाल गैस त्रासदी के बाद बनाया गया था।
  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT): इसकी स्थापना NGT अधिनियम, 2010 के तहत की गई। यह पर्यावरण संबंधी मामलों के त्वरित निपटान के लिए है।
  • CPCB (केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड): इसका गठन जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के तहत किया गया था।
  • न्यायिक सक्रियता: सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) की व्याख्या करते हुए स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार को एक मौलिक अधिकार माना है।

संवैधानिक ढाँचा (Constitutional Framework)

भारतीय संविधान पर्यावरण की रक्षा के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करता है।

राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत (Directive Principles of State Policy)

  • अनुच्छेद 48A: यह राज्य को “पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने तथा देश के वनों और वन्यजीवों की रक्षा करने” का निर्देश देता है। यह राज्य का कर्तव्य निर्धारित करता है।

मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duties)

  • अनुच्छेद 51A(g): यह प्रत्येक नागरिक पर “वनों, झीलों, नदियों और वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने तथा जीवित प्राणियों के प्रति दया भाव रखने” का कर्तव्य आरोपित करता है।

प्रमुख पर्यावरणीय विधान (Major Environmental Legislations)

भारत ने पर्यावरण के विभिन्न पहलुओं को संबोधित करने के लिए कई व्यापक कानून बनाए हैं।

1. वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972

यह अधिनियम पौधों और जानवरों की प्रजातियों के संरक्षण के लिए एक व्यापक ढाँचा प्रदान करता है। इसका मुख्य उद्देश्य अवैध शिकार, तस्करी और वन्यजीव उत्पादों में अवैध व्यापार को नियंत्रित करना है। यह विभिन्न प्रजातियों को उनकी संकट की स्थिति के अनुसार अलग-अलग अनुसूचियों (Schedules) में सूचीबद्ध करता है, जिससे उन्हें विभिन्न स्तर की सुरक्षा मिलती है।

2. जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974

इसका उद्देश्य जल प्रदूषण को रोकना और नियंत्रित करना तथा पानी की गुणवत्ता बनाए रखना है। इस अधिनियम के तहत केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCBs) की स्थापना की गई।

3. वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980

यह अधिनियम वन भूमि के गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिए मोड़ (diversion) को नियंत्रित करता है। किसी भी वन भूमि को किसी अन्य उद्देश्य के लिए उपयोग करने से पहले केंद्र सरकार की मंजूरी अनिवार्य है।

4. वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981

यह अधिनियम वायु प्रदूषण को रोकने, नियंत्रित करने और कम करने के लिए बनाया गया है। यह CPCB और SPCBs को वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने की शक्तियाँ प्रदान करता है। बाद में 1987 में इसमें ध्वनि प्रदूषण को भी वायु प्रदूषक के रूप में शामिल करने के लिए संशोधन किया गया।

5. पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 (EPA)

भोपाल गैस त्रासदी के बाद पारित, यह एक ‘छाता कानून’ है जो केंद्र सरकार को पर्यावरण की गुणवत्ता की रक्षा और सुधार के लिए व्यापक शक्तियाँ प्रदान करता है। इसके तहत पर्यावरण गुणवत्ता मानक निर्धारित करने, औद्योगिक क्षेत्रों को प्रतिबंधित करने और खतरनाक पदार्थों के प्रबंधन से संबंधित नियम बनाने का अधिकार है।

6. जैव विविधता अधिनियम, 2002

यह अधिनियम जैव विविधता पर कन्वेंशन (CBD) के तहत भारत की प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए बनाया गया है। इसका उद्देश्य जैव विविधता का संरक्षण, इसके घटकों का सतत उपयोग और जैविक संसाधनों के उपयोग से होने वाले लाभों का उचित और समान बंटवारा सुनिश्चित करना है।

प्रमुख संस्थाएँ और नीतियाँ

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal – NGT)

2010 में स्थापित, NGT पर्यावरण संरक्षण और वनों के संरक्षण से संबंधित मामलों के प्रभावी और शीघ्र निपटान के लिए एक विशेष न्यायिक निकाय है।

राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन पर कार्य योजना (NAPCC)

2008 में शुरू की गई, यह जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों को कम करने और अनुकूलन के लिए राष्ट्रीय रणनीतियों की रूपरेखा तैयार करती है। इसके तहत सौर ऊर्जा, जल, ऊर्जा दक्षता आदि पर 8 राष्ट्रीय मिशन शामिल हैं।

चुनौतियाँ और आगे की राह

एक मजबूत कानूनी ढाँचे के बावजूद, कार्यान्वयन एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। कमजोर निगरानी, संसाधनों की कमी, विकास बनाम पर्यावरण की बहस और जनता में जागरूकता का अभाव प्रमुख बाधाएँ हैं। आगे की राह संस्थानों को मजबूत करने, कानूनों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने, संरक्षण प्रयासों में प्रौद्योगिकी का उपयोग करने और निर्णय लेने की प्रक्रिया में स्थानीय समुदायों को शामिल करने में निहित है। एक समग्र और एकीकृत दृष्टिकोण ही सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद कर सकता है।
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