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जलवायु परिवर्तन: शमन और अनुकूलन रणनीतियाँ

जलवायु परिवर्तन की व्यापक चुनौती से निपटने के लिए एक दो-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है: शमन (Mitigation) और अनुकूलन (Adaptation)। शमन रणनीतियाँ जलवायु परिवर्तन के मूल कारणों, यानी ग्रीनहाउस गैसों (GHGs) के उत्सर्जन को कम करने पर ध्यान केंद्रित करती हैं। दूसरी ओर, अनुकूलन रणनीतियाँ उन प्रभावों से निपटने पर केंद्रित हैं जो पहले से ही हो रहे हैं और भविष्य में अपरिहार्य हैं, ताकि समाजों और पारिस्थितिक तंत्रों की भेद्यता को कम किया जा सके। ये दोनों रणनीतियाँ एक दूसरे की पूरक हैं और एक प्रभावी जलवायु कार्रवाई के लिए दोनों का एक साथ कार्यान्वयन आवश्यक है।
प्रारंभिक परीक्षाओं के लिए त्वरित तथ्य (Quick Facts for Prelims)
  • शमन (Mitigation): जलवायु परिवर्तन के कारणों को संबोधित करता है (जैसे GHG उत्सर्जन कम करना)।
  • अनुकूलन (Adaptation): जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को संबोधित करता है (जैसे समुद्र तटबंध बनाना)।
  • भारत की NAPCC: जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (2008) में शमन और अनुकूलन दोनों पर केंद्रित 8 मिशन हैं।
  • कार्बन पृथक्करण (Carbon Sequestration): वायुमंडल से CO2 को पकड़ने और संग्रहीत करने की प्रक्रिया, यह एक महत्वपूर्ण शमन रणनीति है।
  • जलवायु लचीलापन (Climate Resilience): जलवायु खतरों का अनुमान लगाने, सामना करने और उनसे उबरने की क्षमता, जो अनुकूलन का एक प्रमुख लक्ष्य है।
  • हरित जलवायु कोष (GCF): UNFCCC के तहत एक वित्तीय तंत्र जो विकासशील देशों को शमन और अनुकूलन परियोजनाओं के लिए वित्त प्रदान करता है।

शमन रणनीतियाँ (Mitigation Strategies)

[Image of solar panels and wind turbines] शमन का उद्देश्य ग्रीनहाउस गैसों के स्रोतों को कम करना और उन सिंक को बढ़ाना है जो इन गैसों को संग्रहीत करते हैं (जैसे वन)।

प्रमुख क्षेत्र और रणनीतियाँ

  • ऊर्जा क्षेत्र:
    • जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल, गैस) से नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों (सौर, पवन, जलविद्युत, भूतापीय) की ओर संक्रमण।
    • ऊर्जा दक्षता में सुधार, ताकि समान कार्य के लिए कम ऊर्जा की खपत हो।
    • कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एंड स्टोरेज (CCUS) जैसी प्रौद्योगिकियों को अपनाना।
  • परिवहन क्षेत्र:
    • इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) को बढ़ावा देना और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास करना।
    • सार्वजनिक परिवहन प्रणालियों (मेट्रो, बस) में सुधार और विस्तार।
    • कड़े ईंधन दक्षता और उत्सर्जन मानकों को लागू करना (जैसे BS-VI)।
  • उद्योग क्षेत्र:
    • अधिक ऊर्जा-कुशल प्रौद्योगिकियों और प्रक्रियाओं को अपनाना।
    • अपशिष्ट से ऊर्जा उत्पादन और चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy) के सिद्धांतों को लागू करना।
  • कृषि, वानिकी और भूमि उपयोग (AFOLU):
    • वनों की कटाई को रोकना और वनरोपण और पुनर्वनीकरण को बढ़ावा देना।
    • चावल की खेती और पशुधन प्रबंधन से मीथेन उत्सर्जन को कम करने वाली टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाना।

अनुकूलन रणनीतियाँ (Adaptation Strategies)

अनुकूलन का लक्ष्य जलवायु परिवर्तन के वर्तमान और भविष्य के प्रभावों से होने वाले नुकसान को कम करना है।

प्रमुख क्षेत्र और रणनीतियाँ

  • कृषि:
    • सूखा और गर्मी प्रतिरोधी फसल किस्मों का विकास और उपयोग।
    • जल-कुशल सिंचाई तकनीकों को अपनाना (जैसे ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई)।
    • फसल विविधीकरण और मौसम-आधारित फसल बीमा योजनाएँ।
  • जल संसाधन:
    • वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देना।
    • एकीकृत वाटरशेड प्रबंधन कार्यक्रम लागू करना।
    • पानी के पुनर्चक्रण और पुन: उपयोग को बढ़ाना।
  • तटीय क्षेत्र और पारिस्थितिकी तंत्र:
    • समुद्र के स्तर में वृद्धि से बचाने के लिए समुद्र तटबंधों और तटबंधों का निर्माण।
    • प्राकृतिक बाधाओं के रूप में कार्य करने के लिए मैंग्रोव वनों का संरक्षण और पुनर्स्थापन।
    • चरम मौसम की घटनाओं के लिए प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early Warning Systems) स्थापित करना।
  • स्वास्थ्य:
    • जलवायु-संवेदनशील बीमारियों (जैसे मलेरिया, डेंगू) के लिए निगरानी प्रणाली को मजबूत करना।
    • हीटवेव और अन्य चरम मौसम की घटनाओं के लिए स्वास्थ्य कार्य योजनाएँ तैयार करना।

भारत का दृष्टिकोण और आगे की राह

भारत ने जलवायु कार्रवाई के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है, जिसमें शमन और अनुकूलन दोनों को समान महत्व दिया गया है। जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPCC) और इसके तहत 8 मिशन (जैसे राष्ट्रीय सौर मिशन, सतत कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन) इस दृष्टिकोण का प्रमाण हैं। पेरिस समझौते के तहत भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) में उत्सर्जन तीव्रता को कम करने के साथ-साथ जलवायु-लचीला बुनियादी ढाँचा बनाने के लक्ष्य भी शामिल हैं। आगे बढ़ते हुए, सफलता के लिए इन दोनों रणनीतियों का एकीकरण महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए, वनरोपण न केवल कार्बन को अवशोषित करके शमन में मदद करता है, बल्कि मिट्टी के कटाव को रोककर और जल चक्र को विनियमित करके अनुकूलन में भी सहायता करता है। प्रभावी कार्यान्वयन के लिए पर्याप्त वित्त, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग अत्यंत आवश्यक हैं।
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