ADVERTISEMENT
Gyan Pragya
No Result
View All Result
  • Quiz
  • Polity
  • Geography
  • Economics
  • Science
  • Uttarakhand
  • GK
  • History
  • Environment
  • Hindi
Gyan Pragya
No Result
View All Result

ग्रामीण और कृषि संबंधी पर्यावरणीय मुद्दे

भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ की अधिकांश आबादी अपनी आजीविका के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। जबकि हरित क्रांति (Green Revolution) ने देश को खाद्य सुरक्षा में आत्मनिर्भर बनाया, वहीं गहन कृषि पद्धतियों ने गंभीर पर्यावरणीय समस्याएं भी पैदा की हैं। ग्रामीण और कृषि क्षेत्र आज मृदा क्षरण, जल संकट, जैव विविधता की हानि और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों जैसी बहुआयामी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इन मुद्दों का समाधान न केवल पर्यावरणीय स्थिरता के लिए, बल्कि भारत की दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण कल्याण के लिए भी महत्वपूर्ण है।
प्रारंभिक परीक्षाओं के लिए त्वरित तथ्य (Quick Facts for Prelims)
  • हरित क्रांति: 1960 के दशक में शुरू हुई, जिसमें उच्च उपज वाले बीजों (HYVs), उर्वरकों और सिंचाई पर ध्यान केंद्रित किया गया।
  • मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card) योजना: किसानों को उनकी मिट्टी के पोषक तत्वों की स्थिति के बारे में जानकारी देने और उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देने के लिए 2015 में शुरू की गई।
  • पराली जलाना (Stubble Burning): मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रचलित है, जो सर्दियों के दौरान दिल्ली-एनसीआर में गंभीर वायु प्रदूषण का कारण बनता है।
  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY): इसका आदर्श वाक्य ‘हर खेत को पानी’ है और इसका उद्देश्य जल उपयोग दक्षता में सुधार करना है।
  • परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY): यह जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए एक प्रमुख योजना है।

प्रमुख पर्यावरणीय मुद्दे (Major Environmental Issues)

1. हरित क्रांति के नकारात्मक प्रभाव

खाद्य उत्पादन बढ़ाने में हरित क्रांति की सफलता निर्विवाद है, लेकिन इसकी पर्यावरणीय लागत भी बहुत अधिक रही है।
  • भूजल का अत्यधिक दोहन: गेहूं और चावल जैसी पानी की अधिक खपत वाली फसलों की खेती और मुफ्त या सस्ती बिजली के कारण किसानों ने अत्यधिक भूजल निकाला, जिससे पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में जल स्तर खतरनाक रूप से नीचे चला गया है।
  • मृदा क्षरण: रासायनिक उर्वरकों (विशेषकर यूरिया) के असंतुलित और अत्यधिक उपयोग ने मिट्टी के सूक्ष्म पोषक तत्वों को खत्म कर दिया है और उसकी प्राकृतिक उर्वरता को कम कर दिया है।
  • जैव विविधता की हानि: उच्च उपज वाली कुछ ही किस्मों पर ध्यान केंद्रित करने से पारंपरिक, स्थानीय रूप से अनुकूलित फसल किस्मों की आनुवंशिक विविधता का क्षरण हुआ है।

2. जल प्रदूषण

कृषि गतिविधियाँ जल प्रदूषण का एक प्रमुख स्रोत हैं।
  • उर्वरक और कीटनाशक अपवाह: खेतों से बहकर आए अतिरिक्त उर्वरक (नाइट्रेट और फॉस्फेट) और कीटनाशक पास के जल निकायों में मिल जाते हैं। इससे सुपोषण (Eutrophication) होता है, जिससे शैवाल खिलते हैं और जलीय जीवन के लिए ऑक्सीजन की कमी हो जाती है।

3. फसल अवशेष जलाना (पराली जलाना)

अगली फसल (आमतौर पर गेहूं) के लिए खेतों को जल्दी खाली करने के लिए किसान धान की कटाई के बाद बचे हुए ठूंठ (पराली) में आग लगा देते हैं।
  • प्रभाव: इससे बड़ी मात्रा में कण पदार्थ (PM2.5), कार्बन मोनोऑक्साइड और अन्य जहरीली गैसें निकलती हैं, जो सर्दियों की शुरुआत में उत्तर भारत में गंभीर वायु प्रदूषण का कारण बनती हैं। यह मिट्टी के लाभकारी सूक्ष्मजीवों को भी नष्ट कर देता है और मिट्टी की उर्वरता को कम करता है।

4. जलवायु परिवर्तन के प्रति सुभेद्यता

भारतीय कृषि मानसून पर अत्यधिक निर्भर है, जो इसे जलवायु परिवर्तन के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील बनाती है।
  • प्रभाव: वर्षा पैटर्न में बदलाव, सूखे और बाढ़ की बढ़ती आवृत्ति, और बढ़ता तापमान फसल की पैदावार को सीधे तौर पर प्रभावित कर रहा है, जिससे छोटे और सीमांत किसानों की आजीविका को खतरा है।

सतत कृषि: आगे की राह

इन चुनौतियों से निपटने के लिए कृषि पद्धतियों में एक बड़े बदलाव की आवश्यकता है, जो सतत कृषि (Sustainable Agriculture) के सिद्धांतों पर आधारित हो।
  • जल उपयोग दक्षता: ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी सूक्ष्म-सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा देना (‘Per Drop, More Crop’)।
  • मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन: रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग (जैसे, नीम कोटेड यूरिया) और जैविक खेती तथा शून्य-बजट प्राकृतिक खेती जैसी प्रथाओं को अपनाना।
  • फसल विविधीकरण: किसानों को पानी की कम खपत वाली फसलों, जैसे बाजरा और दालों, की खेती के लिए प्रोत्साहित करना।
  • पराली का प्रबंधन: फसल अवशेषों के इन-सीटू (In-situ) प्रबंधन (जैसे हैप्पी सीडर मशीन) और एक्स-सीटू (Ex-situ) उपयोग (जैसे बायो-एनर्जी प्लांट, पैकेजिंग सामग्री) के लिए समाधान प्रदान करना।
  • जलवायु-लचीली कृषि: सूखा प्रतिरोधी बीजों का विकास करना और मौसम पूर्वानुमान तथा फसल बीमा तक किसानों की पहुंच में सुधार करना।
Previous Post

शहरीकरण और इसके पर्यावरणीय प्रभाव

Next Post

मानव-वन्यजीव संघर्ष: कारण, प्रभाव और प्रबंधन

Next Post

मानव-वन्यजीव संघर्ष: कारण, प्रभाव और प्रबंधन

पर्यावरणीय सफलता की कहानियां और सर्वोत्तम प्रथाएं

General Science Quiz in Hindi (सामान्य विज्ञान) - Physics, Chemistry, Biology MCQs

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

🎯

चुनौती स्वीकार करें!

टॉपिक पढ़ लिया? अब देखें कि आपको कितना याद है। अभी टेस्ट दें और अपना स्कोर जानें।

क्विज अभी शुरू करें

क्या परीक्षा के नाम से हाथ-पैर ठंडे पड़ जाते हैं?

December 15, 2025

क्या आपका दिमाग भी पढ़ाई में धोखा देता है?

December 13, 2025

UPSC और PCS की तैयारी में एआई का सही उपयोग कैसे करें?

December 13, 2025

हिंदी व्याकरण में वाक्य रचना और उपवाक्य

November 30, 2025

जनजातीय गौरव दिवस: 15 नवंबर | भगवान बिरसा मुंडा की गाथा

November 15, 2025

हिंदी व्याकरण: उपसर्ग और प्रत्यय के भेद

October 9, 2025
  • Contact us
  • Disclaimer
  • Terms of Service
  • Privacy Policy
: whatsapp us on +918057391081 E-mail: setupragya@gmail.com
No Result
View All Result
  • Quiz
  • Static Gk
  • Polity
  • Hindi
  • Geography
  • Economics
  • General Science
  • Uttarakhand
  • History
  • Environment
  • Computer
  • Contact us

© 2024 GyanPragya - ArchnaChaudhary.