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पर्यावरणीय सफलता की कहानियां और सर्वोत्तम प्रथाएं

पर्यावरणीय चुनौतियों की विशालता और गंभीरता अक्सर निराशाजनक लग सकती है, लेकिन इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा है जहाँ सामूहिक कार्रवाई, नवीन विचारों और मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति ने महत्वपूर्ण सकारात्मक बदलाव लाए हैं। ये सफलता की कहानियाँ और सर्वोत्तम प्रथाएं न केवल आशा की किरण प्रदान करती हैं, बल्कि ये भविष्य के प्रयासों के लिए मूल्यवान सबक और एक व्यावहारिक रोडमैप भी प्रस्तुत करती हैं। भारत और दुनिया भर में, जमीनी स्तर के आंदोलनों से लेकर राष्ट्रीय नीतियों तक, ऐसे कई मॉडल हैं जो दर्शाते हैं कि सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण के लक्ष्यों को प्राप्त करना संभव है।
प्रारंभिक परीक्षाओं के लिए त्वरित तथ्य (Quick Facts for Prelims)
  • चिपको आंदोलन: 1973 में उत्तराखंड के चमोली जिले में शुरू हुआ एक अहिंसक, महिला-प्रधान आंदोलन।
  • प्रोजेक्ट टाइगर: 1973 में लॉन्च किया गया, यह दुनिया के सबसे सफल प्रजाति संरक्षण कार्यक्रमों में से एक है।
  • साइलेंट वैली आंदोलन: केरल में एक सदाबहार उष्णकटिबंधीय वन को एक पनबिजली परियोजना से बचाने के लिए एक सफल अभियान।
  • रालेगण सिद्धि: महाराष्ट्र का एक गाँव जो अन्ना हजारे के नेतृत्व में जल संरक्षण और ग्रामीण विकास का एक मॉडल बन गया।
  • संयुक्त वन प्रबंधन (JFM): 1988 की राष्ट्रीय वन नीति के तहत शुरू की गई एक अवधारणा, जो वन प्रबंधन में स्थानीय समुदायों को भागीदार बनाती है।

भारत में सफलता की कहानियाँ (Success Stories in India)

1. चिपको आंदोलन (Chipko Movement)

यह भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए सबसे प्रसिद्ध जमीनी आंदोलनों में से एक है। 1970 के दशक में, जब हिमालयी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर वनों की कटाई हो रही थी, तो स्थानीय ग्रामीणों, विशेष रूप से महिलाओं ने पेड़ों को कटने से बचाने के लिए उन्हें गले लगा लिया (‘चिपको’)। सुंदरलाल बहुगुणा और गौरा देवी जैसे नेताओं के नेतृत्व में, इस आंदोलन ने न केवल पेड़ों को बचाया, बल्कि पारिस्थितिक रूप से स्थायी विकास और स्थानीय समुदायों के वन संसाधनों पर अधिकारों के बारे में एक राष्ट्रीय बहस भी छेड़ दी।

2. प्रोजेक्ट टाइगर (Project Tiger)

1970 के दशक की शुरुआत में, भारत में बाघों की आबादी अवैध शिकार और आवास के नुकसान के कारण 2,000 से भी कम हो गई थी। इसके जवाब में, भारत सरकार ने 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर लॉन्च किया। कोर-बफर रणनीति अपनाते हुए, इस परियोजना ने बाघ अभयारण्यों का एक नेटवर्क स्थापित किया। दशकों के समर्पित प्रयासों के परिणामस्वरूप, भारत में बाघों की आबादी 2022 में 3,167 से अधिक हो गई है, जो इस प्रजाति को विलुप्त होने के कगार से वापस लाने में एक शानदार सफलता है।

3. जल संरक्षण: रालेगण सिद्धि का मॉडल

महाराष्ट्र का रालेगण सिद्धि गाँव कभी एक सूखाग्रस्त और गरीब गाँव था। 1975 में, समाजसेवी अन्ना हजारे के नेतृत्व में, ग्रामीणों ने सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से जल संरक्षण और वाटरशेड विकास का एक व्यापक कार्यक्रम शुरू किया। चेक डैम, तालाब और कंटूर बंडिंग के निर्माण से, उन्होंने वर्षा जल को रोका और भूजल स्तर को रिचार्ज किया। आज, रालेगण सिद्धि एक समृद्ध, जल-समृद्ध गाँव है और यह ग्रामीण विकास के लिए एक अनुकरणीय मॉडल बन गया है।

वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएं (Global Best Practices)

1. कोस्टा रिका का पुनर्वनीकरण (Costa Rica’s Reforestation)

20वीं सदी के मध्य में, कोस्टा रिका में बड़े पैमाने पर वनों की कटाई हुई थी। हालांकि, 1990 के दशक में, सरकार ने एक प्रगतिशील नीति अपनाई, जिसे पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के लिए भुगतान (Payments for Ecosystem Services – PES) कहा जाता है। इस कार्यक्रम के तहत, भू-मालिकों को वनों के संरक्षण और पुनर्वनीकरण के लिए वित्तीय प्रोत्साहन दिया गया। इस नीति के परिणामस्वरूप, कोस्टा रिका ने अपने वन आवरण को दोगुना से अधिक कर लिया है, जो यह दर्शाता है कि आर्थिक प्रोत्साहन संरक्षण के लक्ष्यों को प्राप्त करने में एक शक्तिशाली उपकरण हो सकते हैं।

2. जर्मनी का ऊर्जा संक्रमण (Energiewende)

‘एनर्जीवेंडे’ जर्मनी की एक महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय नीति है जिसका उद्देश्य जीवाश्म ईंधन और परमाणु ऊर्जा से हटकर नवीकरणीय ऊर्जा और ऊर्जा दक्षता पर आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना है। मजबूत राजनीतिक समर्थन और सार्वजनिक भागीदारी के माध्यम से, जर्मनी सौर और पवन ऊर्जा में एक वैश्विक नेता बन गया है, जो यह साबित करता है कि एक प्रमुख औद्योगिक अर्थव्यवस्था भी डीकार्बोनाइज़ हो सकती है।

सबक और आगे की राह

ये सफलता की कहानियाँ कई महत्वपूर्ण सबक सिखाती हैं:
  • सामुदायिक भागीदारी: संरक्षण प्रयासों की सफलता के लिए स्थानीय समुदायों की भागीदारी महत्वपूर्ण है।
  • मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति: महत्वाकांक्षी नीतियों को लागू करने के लिए सरकारी समर्थन आवश्यक है।
  • आर्थिक प्रोत्साहन: वित्तीय लाभ लोगों और उद्योगों को स्थायी प्रथाओं को अपनाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
ये उदाहरण प्रेरणा का स्रोत हैं और एक ऐसे भविष्य का मार्ग प्रशस्त करते हैं जहाँ मानव विकास और पर्यावरणीय स्वास्थ्य एक साथ चल सकते हैं।
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