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सतत प्रथाएं: सिद्धांत और अनुप्रयोग-सतत कृषि, सतत ऊर्जा, सतत जल प्रबंधन 

सतत प्रथाएं (Sustainable Practices) सतत विकास के सिद्धांतों को रोजमर्रा की जिंदगी, व्यावसायिक संचालन और शासन में लागू करने का व्यावहारिक तरीका हैं। इनका उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करना, पर्यावरणीय प्रभाव को कम करना, और वर्तमान तथा भविष्य की पीढ़ियों के लिए सामाजिक-आर्थिक कल्याण सुनिश्चित करना है। ये प्रथाएं केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये आर्थिक दक्षता और सामाजिक समानता को भी बढ़ावा देती हैं, जिससे एक अधिक लचीला और न्यायसंगत समाज बनता है।
प्रारंभिक परीक्षाओं के लिए त्वरित तथ्य (Quick Facts for Prelims)
  • LiFE मिशन (पर्यावरण के लिए जीवन शैली): भारत द्वारा COP26 में लॉन्च किया गया एक वैश्विक आंदोलन, जो सचेत और विवेकपूर्ण उपभोग को प्रोत्साहित करता है।
  • जैविक खेती (Organic Farming): रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बिना खेती की एक विधि। सिक्किम भारत का पहला पूर्ण जैविक राज्य है।
  • GRIHA (समग्र आवास मूल्यांकन के लिए ग्रीन रेटिंग): भारत में विकसित एक राष्ट्रीय ग्रीन बिल्डिंग रेटिंग प्रणाली।
  • सतत कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन (NMSA): यह जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPCC) के तहत 8 मिशनों में से एक है।
  • परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY): भारत में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए एक प्रमुख योजना।

सतत प्रथाओं के प्रमुख क्षेत्र

1. सतत कृषि (Sustainable Agriculture)

इसका उद्देश्य पर्यावरण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और पशु कल्याण की रक्षा करते हुए खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करना है।
  • जैविक खेती: यह सिंथेटिक आदानों के उपयोग से बचती है और फसल चक्र, हरी खाद और जैविक कीट नियंत्रण पर निर्भर करती है।
  • शून्य-बजट प्राकृतिक खेती (ZBNF): यह बाहरी आदानों को खत्म करने और स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों (जैसे गाय का गोबर, गोमूत्र) का उपयोग करके खेती की लागत को लगभग शून्य करने पर केंद्रित है।
  • एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM): इसमें कीटों को नियंत्रित करने के लिए जैविक और सांस्कृतिक प्रथाओं को प्राथमिकता दी जाती है और रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग अंतिम उपाय के रूप में किया जाता है।

2. सतत ऊर्जा (Sustainable Energy)

यह ऊर्जा दक्षता और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों पर केंद्रित है।
  • नवीकरणीय ऊर्जा: जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने के लिए सौर ऊर्जा (जैसे अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन), पवन ऊर्जा और बायोमास को बढ़ावा देना।
  • ऊर्जा दक्षता: ऊर्जा की खपत को कम करने के लिए LED बल्बों (UJALA योजना) और ऊर्जा-कुशल उपकरणों (BEE स्टार रेटिंग) के उपयोग को प्रोत्साहित करना।

3. सतत जल प्रबंधन (Sustainable Water Management)

इसका उद्देश्य सभी के लिए पानी की उपलब्धता और सतत प्रबंधन सुनिश्चित करना है।
  • वर्षा जल संचयन: वर्षा जल को संग्रहीत और पुन: उपयोग करके भूजल पर दबाव कम करना।
  • कुशल सिंचाई: ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी तकनीकों का उपयोग करके पानी की बर्बादी को कम करना।
  • जल पुनर्चक्रण: अपशिष्ट जल का उपचार करके उसे सिंचाई या औद्योगिक उपयोग जैसे गैर-पीने योग्य उद्देश्यों के लिए पुन: उपयोग करना।

4. हरित भवन और सतत शहर (Green Buildings and Sustainable Cities)

यह निर्माण और शहरी नियोजन में पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने पर केंद्रित है।
  • हरित भवन: ऐसी इमारतें जो ऊर्जा, पानी और सामग्रियों का कुशलतापूर्वक उपयोग करती हैं, और रहने वालों के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डालती हैं। वे अक्सर नवीकरणीय ऊर्जा और पुनर्नवीनीकरण सामग्री का उपयोग करते हैं।
  • सतत शहरी नियोजन: इसमें सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता देना, पैदल चलने योग्य और साइकिल-अनुकूल बुनियादी ढाँचे का निर्माण करना, और हरित स्थानों का संरक्षण करना शामिल है।

चुनौतियाँ और आगे की राह

सतत प्रथाओं को व्यापक रूप से अपनाने में कई बाधाएँ हैं, जिनमें उच्च प्रारंभिक लागत, जागरूकता की कमी, और नीतिगत कार्यान्वयन में अंतराल शामिल हैं। इसके अलावा, उपभोक्ताओं और उद्योगों के व्यवहार में बदलाव लाना एक धीमी प्रक्रिया है।

आगे की राह एक समग्र दृष्टिकोण में निहित है जो सरकार, उद्योग और नागरिकों को एक साथ लाता है।
  • नीतिगत प्रोत्साहन: सरकार स्वच्छ प्रौद्योगिकियों को अपनाने के लिए कर छूट और सब्सिडी प्रदान कर सकती है।
  • चक्रीय अर्थव्यवस्था को अपनाना: ‘लेने-बनाने-फेंकने’ के रैखिक मॉडल से हटकर एक ऐसी प्रणाली की ओर बढ़ना जहाँ संसाधनों का पुन: उपयोग और पुनर्चक्रण किया जाता है।
  • शिक्षा और जागरूकता: सतत जीवन शैली के लाभों के बारे में सार्वजनिक जागरूकता अभियान चलाना। LiFE मिशन इस दिशा में एक महत्वपूर्ण वैश्विक पहल है।
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