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जैव विविधता को खतरे (Threats to Biodiversity)

पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व जैव विविधता की समृद्धि पर निर्भर करता है, लेकिन वर्तमान में मानवीय गतिविधियों के कारण यह अभूतपूर्व दर से संकट में है। प्रजातियों का विलोपन एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन वर्तमान विलोपन दर प्राकृतिक दर से 100 से 1,000 गुना अधिक अनुमानित है। इस तीव्र गिरावट के पीछे मुख्य रूप से मानव-जनित कारण हैं जो पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को बिगाड़ रहे हैं और उन सेवाओं को खतरे में डाल रहे हैं जिन पर हमारा अस्तित्व निर्भर करता है। इन खतरों को समझना और उनका समाधान करना संरक्षण प्रयासों की आधारशिला है।
प्रारंभिक परीक्षाओं के लिए त्वरित तथ्य (Quick Facts for Prelims)
  • द एविल क्वार्टेट (The Evil Quartet): जैव विविधता हानि के चार प्रमुख कारणों का समूह – आवासीय क्षति, अति-दोहन, विदेशी प्रजातियों का आक्रमण, और सह-विलुप्तता।
  • आवासीय क्षति (Habitat Loss): जैव विविधता के लिए सबसे बड़ा खतरा माना जाता है।
  • आक्रामक विदेशी प्रजाति (Invasive Alien Species): वह गैर-देशी प्रजाति जो नए वातावरण में स्थापित होकर पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाती है। उदाहरण: जलकुंभी।
  • CITES (साइट्स): वन्यजीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन। यह अति-दोहन को नियंत्रित करता है।
  • बायोमैग्निफिकेशन (Biomagnification): खाद्य श्रृंखला के माध्यम से प्रदूषकों (जैसे DDT) की सांद्रता में वृद्धि, जो शीर्ष परभक्षियों को प्रभावित करती है।

द एविल क्वार्टेट: जैव विविधता हानि के चार प्रमुख कारण

जीव विज्ञानी जेरेड डायमंड (Jared Diamond) ने जैव विविधता के विनाश के चार मुख्य मानव-जनित कारणों को “द एविल क्वार्टेट” का नाम दिया।

1. आवासीय क्षति और विखंडन (Habitat Loss and Fragmentation)

यह प्रजातियों के विलुप्त होने का सबसे प्रमुख कारण है। जब जंगलों, आर्द्रभूमियों या घास के मैदानों को कृषि, शहरीकरण, खनन या बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए साफ किया जाता है, तो वहां रहने वाले जीवों के घर नष्ट हो जाते हैं।
  • उदाहरण: अमेज़ॅन वर्षावन को सोयाबीन की खेती और पशुपालन के लिए काटा जा रहा है। भारत में, पश्चिमी घाट में विकास परियोजनाओं के कारण आवासों का गंभीर विखंडन हुआ है।
  • विखंडन (Fragmentation): जब एक बड़े आवास को छोटे, अलग-थलग टुकड़ों में तोड़ दिया जाता है, तो यह जानवरों के प्रवास मार्गों को बाधित करता है और आनुवंशिक विविधता को कम करता है, जिससे प्रजातियां बीमारियों और अन्य खतरों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती हैं।

2. अति-दोहन (Over-exploitation)

जब मानव किसी प्रजाति का उपयोग उसकी आबादी को बनाए रखने की क्षमता से अधिक तेजी से करता है, तो इसे अति-दोहन कहा जाता है।
  • समुद्री जीवन: अत्यधिक मछली पकड़ने से स्टेलर की समुद्री गाय और पैसेंजर पिजन जैसी प्रजातियां विलुप्त हो गईं और कई अन्य जैसे ब्लूफिन टूना संकट में हैं।
  • अवैध शिकार: बाघों को उनकी हड्डियों और खाल के लिए, गैंडों को उनके सींगों के लिए, और हाथियों को उनके दांतों के लिए अवैध रूप से मारा जाता है, जिससे उनकी आबादी गंभीर रूप से घट गई है।

3. विदेशी प्रजातियों का आक्रमण (Alien Species Invasion)

जब किसी बाहरी या गैर-देशी प्रजाति को जानबूझकर या अनजाने में किसी नए पारिस्थितिकी तंत्र में लाया जाता है, तो उनमें से कुछ आक्रामक हो सकती हैं। वे संसाधनों के लिए स्थानीय प्रजातियों के साथ प्रतिस्पर्धा करती हैं, उनका शिकार करती हैं, या बीमारियाँ फैलाती हैं।
  • लैंटाना कमारा (Lantana Camara): यह सजावटी पौधा अब भारत के कई जंगलों में फैल गया है, जो स्थानीय वनस्पतियों को उगने नहीं देता।
  • जलकुंभी (Water Hyacinth): इसे ‘बंगाल का आतंक’ (Terror of Bengal) भी कहा जाता है, यह जलाशयों को तेजी से ढक लेती है, जिससे जलीय जीवन के लिए ऑक्सीजन की कमी हो जाती है।

4. सह-विलुप्तता (Co-extinctions)

जब एक प्रजाति विलुप्त हो जाती है, तो उस पर पूरी तरह से निर्भर दूसरी प्रजाति भी विलुप्त हो जाती है। यह एक श्रृंखला अभिक्रिया (chain reaction) की तरह है।
  • उदाहरण: यदि एक विशेष प्रकार का परागण करने वाला कीट विलुप्त हो जाता है, तो वह पौधा भी विलुप्त हो सकता है जो परागण के लिए केवल उसी कीट पर निर्भर था।

अन्य महत्वपूर्ण खतरे

जलवायु परिवर्तन (Climate Change)

वैश्विक तापमान में वृद्धि, वर्षा पैटर्न में बदलाव और चरम मौसम की घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति प्रजातियों और पारिस्थितिकी तंत्रों को बुरी तरह प्रभावित कर रही है।
  • प्रवाल विरंजन (Coral Bleaching): समुद्र का तापमान बढ़ने से शैवाल, जो प्रवाल को रंग और भोजन प्रदान करते हैं, उन्हें छोड़ देते हैं, जिससे प्रवाल सफेद हो जाते हैं और मर सकते हैं।
  • प्रवासन पैटर्न में बदलाव: प्रजातियां ठंडे क्षेत्रों की ओर या अधिक ऊंचाई पर स्थानांतरित हो रही हैं, जिससे मौजूदा पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ रहा है।

प्रदूषण (Pollution)

प्रदूषण हवा, पानी और मिट्टी की गुणवत्ता को खराब करता है, जिससे जीवन के सभी रूपों को नुकसान होता है।
  • प्लास्टिक प्रदूषण: समुद्री जीव प्लास्टिक को भोजन समझकर खा लेते हैं या उसमें फंस जाते हैं।
  • कीटनाशक: DDT जैसे कीटनाशक जैव-आवर्धन (Biomagnification) के माध्यम से खाद्य श्रृंखला में जमा हो जाते हैं, जिससे बाज जैसे शीर्ष शिकारी पक्षियों के अंडों के कवच पतले हो गए और उनकी आबादी में भारी गिरावट आई।

चुनौतियाँ और आगे की राह

जैव विविधता का क्षरण केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक आर्थिक, सामाजिक और नैतिक संकट भी है। इससे पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं (जैसे स्वच्छ हवा, पानी, परागण) में गिरावट आती है, जो मानव कल्याण को सीधे तौर पर प्रभावित करती है।
  • कानूनों का प्रभावी कार्यान्वयन: वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और जैव विविधता अधिनियम, 2002 जैसे कानूनों को सख्ती से लागू करने की आवश्यकता है।
  • सतत विकास: विकास को इस तरह से नियोजित किया जाना चाहिए कि वह पर्यावरण को न्यूनतम नुकसान पहुंचाए।
  • सामुदायिक भागीदारी: संरक्षण प्रयासों में स्थानीय समुदायों को शामिल करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे अक्सर जैव विविधता के सबसे तत्काल संरक्षक होते हैं।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: जलवायु परिवर्तन और अवैध वन्यजीव व्यापार जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए राष्ट्रों के बीच सहयोग आवश्यक है।
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