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शहरीकरण और इसके पर्यावरणीय प्रभाव

शहरीकरण (Urbanization) ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों में जनसंख्या के स्थानांतरण और इन शहरी क्षेत्रों के विस्तार की प्रक्रिया है। यह आर्थिक विकास का एक प्रमुख चालक है, जो रोजगार, शिक्षा और बेहतर जीवन स्तर के अवसर प्रदान करता है। हालांकि, अनियोजित और तीव्र शहरीकरण अपने साथ गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियाँ भी लाता है। प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव, प्रदूषण में वृद्धि, और पारिस्थितिक तंत्र का क्षरण आधुनिक शहरों की प्रमुख समस्याएं हैं। इसलिए, सतत शहरीकरण (Sustainable Urbanization) आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है, जो आर्थिक विकास और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच संतुलन स्थापित कर सके।
प्रारंभिक परीक्षाओं के लिए त्वरित तथ्य (Quick Facts for Prelims)
  • भारत में शहरीकरण: 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत की 31.16% आबादी शहरी थी। 2036 तक इसके 39% तक पहुंचने का अनुमान है।
  • शहरी ऊष्मा द्वीप (Urban Heat Island – UHI): वह घटना जिसके द्वारा शहरी क्षेत्र अपने आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में काफी गर्म हो जाते हैं।
  • प्रमुख शहरी मिशन: स्मार्ट सिटीज मिशन, कायाकल्प और शहरी परिवर्तन के लिए अटल मिशन (AMRUT), और प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी)।
  • शहरी बाढ़ (Urban Flooding): अपर्याप्त जल निकासी प्रणाली और सतह के कंक्रीटीकरण के कारण कम समय में हुई भारी वर्षा से शहरों में बाढ़ आना।

शहरीकरण के पर्यावरणीय प्रभाव (Environmental Impacts of Urbanization)

1. भूमि उपयोग परिवर्तन और आवास विनाश

शहरों के विस्तार के लिए कृषि भूमि, वनों, आर्द्रभूमि (wetlands) और अन्य प्राकृतिक आवासों का अधिग्रहण किया जाता है। इससे न केवल खाद्य उत्पादन प्रभावित होता है, बल्कि जैव विविधता का भी भारी नुकसान होता है और वन्यजीवों के आवास खंडित हो जाते हैं।

2. वायु प्रदूषण

शहरी केंद्र वायु प्रदूषण के हॉटस्पॉट होते हैं। इसके मुख्य स्रोत हैं:
  • वाहनों का उत्सर्जन: वाहनों की उच्च सघनता से PM2.5, नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx), और कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) का उच्च स्तर होता है।
  • औद्योगिक उत्सर्जन: शहरों के आसपास केंद्रित उद्योग सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) और अन्य प्रदूषक उत्सर्जित करते हैं।
  • निर्माण गतिविधियाँ: निर्माण स्थलों से उड़ने वाली धूल कण प्रदूषण का एक प्रमुख स्रोत है।

3. जल संसाधनों पर दबाव

  • जल की कमी: बढ़ती शहरी आबादी की पानी की मांग को पूरा करने के लिए भूजल का अत्यधिक दोहन होता है, जिससे जल स्तर तेजी से गिरता है।
  • जल प्रदूषण: अधिकांश शहरों में उत्पन्न होने वाले सीवेज का एक बड़ा हिस्सा बिना उपचार के नदियों और झीलों में छोड़ दिया जाता है, जिससे जल निकाय गंभीर रूप से प्रदूषित हो जाते हैं।
  • शहरी बाढ़: सड़कों और इमारतों के कंक्रीटीकरण के कारण वर्षा का पानी जमीन में रिस नहीं पाता है। इससे सतह का अपवाह बढ़ जाता है और थोड़ी सी भी भारी बारिश में शहरी बाढ़ की स्थिति बन जाती है।

4. अपशिष्ट प्रबंधन संकट

शहर बड़ी मात्रा में नगरपालिका ठोस अपशिष्ट (Municipal Solid Waste – MSW) उत्पन्न करते हैं। स्रोत पर पृथक्करण की कमी, अपर्याप्त संग्रह प्रणाली और वैज्ञानिक लैंडफिल की कमी के कारण अधिकांश कचरा खुले में फेंक दिया जाता है, जो मिट्टी और भूजल को प्रदूषित करता है और मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करता है।

5. शहरी ऊष्मा द्वीप (Urban Heat Island – UHI) प्रभाव

शहरों में कंक्रीट और डामर जैसी सामग्रियाँ दिन के दौरान सूर्य की गर्मी को अवशोषित करती हैं और रात में धीरे-धीरे छोड़ती हैं। इसके अलावा, वाहनों और एयर कंडीशनरों से निकलने वाली गर्मी और हरित आवरण की कमी के कारण, शहरी क्षेत्र अपने आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में कई डिग्री अधिक गर्म हो जाते हैं। इससे ऊर्जा की खपत बढ़ती है और गर्मी से संबंधित स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न होती हैं।

सतत शहरीकरण: आगे की राह

इन चुनौतियों से निपटने के लिए एक एकीकृत और टिकाऊ दृष्टिकोण की आवश्यकता है।
  • कॉम्पैक्ट और हरित शहर: शहरों के अनियंत्रित फैलाव को रोकने के लिए कॉम्पैक्ट सिटी प्लानिंग और मिश्रित-भूमि उपयोग को बढ़ावा देना। पार्कों, शहरी वनों और हरित छतों जैसे हरित स्थानों का संरक्षण और विकास करना।
  • सतत परिवहन: सार्वजनिक परिवहन (मेट्रो, बस) में निवेश करना और पैदल चलने तथा साइकिल चलाने के लिए सुरक्षित बुनियादी ढाँचा बनाना।
  • जल प्रबंधन: वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाना और अपशिष्ट जल के उपचार और पुनर्चक्रण को बढ़ावा देना।
  • चक्रीय अर्थव्यवस्था: अपशिष्ट को एक संसाधन के रूप में देखना और 3R (Reduce, Reuse, Recycle) के सिद्धांतों पर आधारित अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों को लागू करना।
  • हरित भवन: ऊर्जा-कुशल और पानी की बचत करने वाली भवन डिजाइन (जैसे GRIHA रेटिंग) को प्रोत्साहित करना।
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