परिचय: भूकंप क्या है?
भूकंप का अर्थ है पृथ्वी की सतह का हिलना या कांपना। यह पृथ्वी के स्थलमंडल (लिथोस्फीयर) में ऊर्जा के अचानक मुक्त होने के कारण होता है, जिससे भूकंपीय तरंगें उत्पन्न होती हैं।
- उद्गम केंद्र (Focus or Hypocenter): पृथ्वी के अंदर वह स्थान जहाँ ऊर्जा मुक्त होती है, उसे भूकंप का उद्गम केंद्र कहते हैं।
- अधिकेंद्र (Epicenter): पृथ्वी की सतह पर उद्गम केंद्र के ठीक ऊपर (90° पर) स्थित बिंदु को अधिकेंद्र कहते हैं। सबसे अधिक विनाश अधिकेंद्र के पास ही होता है।
1. भूकंप के कारण
भूकंप आने के कई कारण हो सकते हैं, जिनमें सबसे प्रमुख प्लेट विवर्तनिकी है।
- प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics): पृथ्वी की सतह विभिन्न प्लेटों में विभाजित है। जब ये प्लेटें एक-दूसरे से टकराती हैं, दूर जाती हैं, या एक-दूसरे के समानांतर खिसकती हैं, तो चट्टानों में तनाव उत्पन्न होता है। जब यह तनाव चट्टानों की सहनशक्ति से अधिक हो जाता है, तो वे टूट जाती हैं, जिससे ऊर्जा तरंगों के रूप में निकलती है।
- ज्वालामुखी गतिविधियाँ: ज्वालामुखी विस्फोट के समय भी पृथ्वी की सतह पर कंपन होता है।
- मानव-जनित कारण: परमाणु परीक्षण, बांधों के निर्माण (जलाशय प्रेरित भूकंप), और खनन जैसी मानवीय गतिविधियाँ भी स्थानीय स्तर पर भूकंप का कारण बन सकती हैं।
2. भूकंपीय तरंगें (Seismic Waves)
भूकंप के दौरान उत्पन्न होने वाली ऊर्जा तरंगों के रूप में फैलती है, जिन्हें भूकंपीय तरंगें कहते हैं। इन्हें दो मुख्य प्रकारों में बांटा गया है:
A. भूगर्भीय तरंगें (Body Waves)
ये तरंगें पृथ्वी के आंतरिक भाग से होकर गुजरती हैं।
- P-तरंगें (प्राथमिक तरंगें):
- ये सबसे तेज गति वाली तरंगें हैं और सिस्मोग्राफ पर सबसे पहले पहुँचती हैं।
- ये ध्वनि तरंगों की तरह अनुदैर्ध्य (longitudinal) होती हैं, जिससे कणों में संकुचन और फैलाव होता है।
- ये ठोस, तरल और गैस तीनों माध्यमों से गुजर सकती हैं।
- S-तरंगें (द्वितीयक तरंगें):
- इनकी गति P-तरंगों से कम होती है।
- ये प्रकाश तरंगों की तरह अनुप्रस्थ (transverse) होती हैं, जिसमें कण तरंग की दिशा के समकोण पर ऊपर-नीचे गति करते हैं।
- ये केवल ठोस माध्यम से ही गुजर सकती हैं। इनका तरल माध्यम में लुप्त हो जाना पृथ्वी के बाहरी कोर के तरल होने का प्रमाण देता है।
B. धरातलीय तरंगें (Surface Waves)
जब भूगर्भीय तरंगें सतह पर पहुँचती हैं, तो वे धरातलीय तरंगों में परिवर्तित हो जाती हैं। ये सबसे अधिक विनाशकारी होती हैं।
- L-तरंगें (लव तरंगें): ये सतह पर क्षैतिज रूप से (side-to-side) कंपन करती हैं और इमारतों को गिराने के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार होती हैं।
- R-तरंगें (रैले तरंगें): ये सतह पर एक लहरदार, अंडाकार गति (rolling motion) उत्पन्न करती हैं, जैसे समुद्र की लहरें।
3. भूकंप का मापन
भूकंप को मापने के लिए दो मुख्य पैमानों का उपयोग किया जाता है:
- रिक्टर स्केल (Richter Scale): यह भूकंप के परिमाण (Magnitude) को मापता है, यानी भूकंप के दौरान मुक्त हुई ऊर्जा की मात्रा को। यह एक लघुगणकीय (logarithmic) पैमाना है, जिसका अर्थ है कि रिक्टर स्केल पर प्रत्येक अगली संख्या पिछले की तुलना में 10 गुना अधिक कंपन और लगभग 32 गुना अधिक ऊर्जा दर्शाती है।
- मरकेली स्केल (Mercalli Scale): यह भूकंप की तीव्रता (Intensity) को मापता है, यानी भूकंप से हुए नुकसान और विनाश के स्तर को। यह अवलोकन पर आधारित है और 1 से 12 तक की रोमन संख्याओं में व्यक्त किया जाता है।
4. भारत के भूकंपीय क्षेत्र (Seismic Zones of India)
भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने देश को भूकंपीयता के आधार पर चार मुख्य क्षेत्रों में विभाजित किया है।
| क्षेत्र | जोखिम स्तर | तीव्रता (मरकेली स्केल) | प्रमुख क्षेत्र |
|---|---|---|---|
| जोन V | बहुत अधिक जोखिम | IX और अधिक | उत्तर-पूर्व भारत, जम्मू और कश्मीर के कुछ हिस्से, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात में कच्छ का रण, और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह। |
| जोन IV | अधिक जोखिम | VIII | जम्मू-कश्मीर और हिमाचल के शेष हिस्से, दिल्ली, सिक्किम, उत्तर प्रदेश के उत्तरी हिस्से, बिहार और पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र के कुछ हिस्से। |
| जोन III | मध्यम जोखिम | VII | केरल, गोवा, लक्षद्वीप, उत्तर प्रदेश और गुजरात के शेष हिस्से, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक। |
| जोन II | कम जोखिम | VI या कम | देश के शेष हिस्से, विशेषकर प्रायद्वीपीय पठार का बड़ा भाग। |