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पर्वत श्रृंखलाओं का पर्यावरणीय महत्व (Environmental Significance of Mountain Ranges)

1. परिचय (Introduction)

पर्वत केवल विशाल भू-आकृतियाँ नहीं हैं, बल्कि ये पृथ्वी की पारिस्थितिक प्रणालियों के प्रमुख नियामक भी हैं। वे वैश्विक और क्षेत्रीय जलवायु को नियंत्रित करने, जल संसाधनों को बनाए रखने, जैव विविधता का पोषण करने और मानव समाजों को आवश्यक संसाधन प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनका पर्यावरणीय महत्व स्थानीय से लेकर वैश्विक स्तर तक फैला हुआ है।

[Image of orographic rainfall diagram]

2. पर्वतों की प्रमुख पर्यावरणीय भूमिकाएँ

A. जलवायु पर प्रभाव (Influence on Climate)

  • पवनाभिमुख ढाल और पर्वतीय वर्षा: जब आर्द्र हवाएं किसी पर्वत से टकराती हैं, तो उन्हें ऊपर उठने के लिए मजबूर होना पड़ता है। ऊपर उठने पर हवा ठंडी होती है, संघनन होता है और वर्षा होती है। इसे पर्वतीय वर्षा (Orographic Rainfall) कहते हैं। उदाहरण: पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढलानों पर भारी वर्षा होती है।
  • पवनविमुख ढाल और वृष्टि-छाया क्षेत्र: पर्वत के दूसरी तरफ (पवनविमुख ढाल) उतरती हुई हवा गर्म और शुष्क हो जाती है, जिससे बहुत कम वर्षा होती है। यह क्षेत्र वृष्टि-छाया क्षेत्र (Rain Shadow Area) कहलाता है। उदाहरण: पश्चिमी घाट के पूर्व में स्थित दक्कन का पठार।
  • वायु राशियों के लिए अवरोध: पर्वत ठंडी या गर्म हवाओं के लिए एक प्राकृतिक अवरोध के रूप में कार्य करते हैं। उदाहरण: हिमालय मध्य एशिया से आने वाली अत्यधिक ठंडी ध्रुवीय हवाओं को भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवेश करने से रोकता है, जिससे यहाँ की जलवायु अपेक्षाकृत गर्म रहती है।

B. जल संसाधनों के स्रोत (Source of Water Resources)

  • ‘विश्व के जल मीनार’ (Water Towers of the World): पर्वत अपनी ऊंचाई के कारण वर्षा और हिमपात के रूप में बड़ी मात्रा में अवक्षेपण प्राप्त करते हैं। वे इस पानी को हिमनदों (Glaciers) और हिम क्षेत्रों (Snowfields) के रूप में संग्रहीत करते हैं।
  • सदाबहार नदियों का उद्गम: गर्मियों में बर्फ पिघलने से नदियों को निरंतर पानी मिलता है, जिससे वे सदाबहार (Perennial) बनी रहती हैं। उदाहरण: हिमालय से निकलने वाली गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र नदियाँ। इसी प्रकार आल्प्स से राइन और डेन्यूब नदियाँ निकलती हैं।
  • भूजल पुनर्भरण: पहाड़ों से निकलने वाला पानी मैदानों में भूजल के पुनर्भरण में भी मदद करता है।

C. जैव विविधता के केंद्र (Hubs of Biodiversity)

  • ऊंचाई आधारित वनस्पति क्षेत्र (Altitudinal Zonation): पहाड़ों पर ऊंचाई के साथ तापमान और वर्षा में परिवर्तन होता है, जिससे विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों की अलग-अलग परतें (क्षेत्र) बनती हैं। इसे ऊर्ध्वाधर क्षेत्रीकरण (Vertical Zonation) कहते हैं।
  • स्थानिक प्रजातियाँ (Endemic Species): पहाड़ों की अलग-थलग घाटियों और ढलानों में अक्सर ऐसी प्रजातियाँ विकसित होती हैं जो दुनिया में और कहीं नहीं पाई जाती हैं। इन्हें स्थानिक प्रजातियाँ कहा जाता है।
  • जैव विविधता हॉटस्पॉट: अपनी उच्च प्रजाति समृद्धि और स्थानिकता के कारण, कई पर्वत श्रृंखलाओं को वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट के रूप में पहचाना जाता है। उदाहरण: हिमालय, पश्चिमी घाट, और एंडीज के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र।

D. अन्य महत्व (Other Significance)

  • मृदा निर्माण: पहाड़ों पर चट्टानों के अपरदन से प्राप्त तलछट नदियों द्वारा मैदानों में ले जाया जाता है, जिससे अत्यधिक उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil) का निर्माण होता है।
  • प्राकृतिक संसाधन: पर्वत लकड़ी, औषधीय जड़ी-बूटियों, और खनिजों जैसे संसाधनों के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
  • पर्यटन और मनोरंजन: पर्वतीय परिदृश्य अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण पर्यटन और साहसिक खेलों के लिए आकर्षण का केंद्र होते हैं।

3. सारांश: पर्वतों का पर्यावरणीय महत्व

पर्यावरणीय भूमिका प्रक्रिया/तंत्र उदाहरण
जलवायु नियंत्रक पर्वतीय वर्षा, वृष्टि-छाया प्रभाव, वायु राशियों को रोकना। मानसून पर हिमालय का प्रभाव, पश्चिमी घाट।
जल सुरक्षा ‘वाटर टावर्स’ के रूप में कार्य करना, हिमनदों में जल भंडारण, सदाबहार नदियों को जन्म देना। हिमालय से गंगा/सिंधु का उद्गम।
जैव विविधता संरक्षण ऊर्ध्वाधर वनस्पति क्षेत्र, स्थानिक प्रजातियों का विकास, जैव विविधता हॉटस्पॉट। पश्चिमी घाट, हिमालय।
संसाधन प्रदाता उपजाऊ मिट्टी का निर्माण, वन उत्पाद, खनिज, जलविद्युत क्षमता। उत्तरी भारत के जलोढ़ मैदान, पर्वतीय वन।
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