1. परिचय: भूजल क्या है?
भूजल (Groundwater) वह जल है जो वर्षा या अन्य स्रोतों से पृथ्वी की सतह के नीचे मिट्टी, रेत और चट्टानों के कणों के बीच के रिक्त स्थानों (छिद्रों) में रिसकर जमा हो जाता है। यह जलमंडल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और मीठे पानी का सबसे बड़ा सुलभ स्रोत है, जो ग्लेशियरों और बर्फ की चोटियों में जमे पानी से भी अधिक है। यह दुनिया भर में लाखों लोगों के लिए पीने के पानी और सिंचाई का प्राथमिक स्रोत है।
2. भूजल से संबंधित प्रमुख शब्दावली
A. जलभृत (Aquifer)
यह चट्टान, रेत या बजरी की एक पारगम्य (permeable) भूमिगत परत है जिसमें भूजल संग्रहीत होता है और जिससे पानी को कुओं के माध्यम से निकाला जा सकता है। गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान दुनिया के सबसे बड़े और सबसे उत्पादक जलभृतों में से एक है।
B. जल स्तर (Water Table)
यह संतृप्ति क्षेत्र (Zone of Saturation) की ऊपरी सतह है, जिसके नीचे चट्टानों और मिट्टी के सभी छिद्र पानी से भरे होते हैं। जल स्तर मौसम के अनुसार ऊपर-नीचे होता रहता है – वर्षा के बाद यह ऊपर उठता है और सूखे के दौरान या अत्यधिक पंपिंग से नीचे चला जाता है।
C. पारगम्यता और सरंध्रता (Permeability and Porosity)
- सरंध्रता (Porosity): यह चट्टान या मिट्टी में रिक्त स्थानों (छिद्रों) का प्रतिशत है। यह निर्धारित करता है कि चट्टान कितनी मात्रा में पानी धारण कर सकती है।
- पारगम्यता (Permeability): यह चट्टान के भीतर छिद्रों के परस्पर जुड़े होने का माप है, जो यह निर्धारित करता है कि पानी कितनी आसानी से प्रवाहित हो सकता है। एक अच्छा जलभृत होने के लिए चट्टान का सरंध्र और पारगम्य दोनों होना आवश्यक है।
3. जलभृतों के प्रकार (Types of Aquifers)
A. अपरिरुद्ध जलभृत (Unconfined Aquifer)
यह एक ऐसा जलभृत है जिसकी ऊपरी सतह जल स्तर ही होती है और यह सीधे ऊपर से आने वाले पानी से रिचार्ज होता है। ये जलभृत सतह के पास होते हैं और प्रदूषण के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।
B. परिरुद्ध जलभृत (Confined Aquifer)
यह जलभृत ऊपर और नीचे दोनों तरफ से अपारगम्य (impermeable) चट्टानी परतों (जैसे क्ले या शेल) के बीच दबा होता है। इसमें पानी दबाव में रहता है। जब इस जलभृत में कुआं खोदा जाता है, तो दबाव के कारण पानी अपने आप सतह पर आ सकता है, जिसे उत्स्रुत कूप (Artesian Well) कहते हैं।
4. भूजल का महत्व (Significance of Groundwater)
- पेयजल आपूर्ति: दुनिया की अधिकांश ग्रामीण और शहरी आबादी पीने के पानी के लिए भूजल पर निर्भर है। भारत में लगभग 85% ग्रामीण पेयजल आपूर्ति भूजल आधारित है।
- कृषि और खाद्य सुरक्षा: भूजल सिंचाई का सबसे बड़ा स्रोत है, खासकर शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में। भारत की हरित क्रांति काफी हद तक भूजल के उपयोग पर निर्भर थी।
- पारिस्थितिकी तंत्र का समर्थन: भूजल शुष्क मौसमों के दौरान नदियों, झीलों और आर्द्रभूमियों में पानी के प्रवाह को बनाए रखता है, जिससे जलीय पारिस्थितिक तंत्र जीवित रहते हैं।
- औद्योगिक उपयोग: कई उद्योग अपने उत्पादन प्रक्रियाओं के लिए भूजल का उपयोग करते हैं।
5. भूजल से संबंधित चुनौतियाँ और प्रबंधन
- अति-दोहन (Over-exploitation): पुनर्भरण की दर से अधिक तेजी से पानी निकालने से जल स्तर में तेजी से गिरावट आ रही है, जिससे कुएँ सूख रहे हैं और पंपिंग लागत बढ़ रही है।
- भू-धंसाव (Land Subsidence): जब जलभृतों से अत्यधिक पानी निकाला जाता है, तो ऊपर की भूमि धँस सकती है, जिससे इमारतों और बुनियादी ढाँचे को नुकसान पहुँचता है।
- जल प्रदूषण: कृषि से कीटनाशकों और उर्वरकों का रिसाव, औद्योगिक अपशिष्ट और अनुचित सीवेज निपटान भूजल को दूषित कर सकते हैं, जिससे यह पीने के लिए अनुपयुक्त हो जाता है।
- प्राकृतिक संदूषण: कुछ क्षेत्रों में, भूजल स्वाभाविक रूप से आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे हानिकारक तत्वों से दूषित होता है, जैसा कि भारत के कई हिस्सों में देखा गया है।
- प्रबंधन: इन चुनौतियों से निपटने के लिए वर्षा जल संचयन, कृत्रिम पुनर्भरण (Artificial Recharge) और जल के कुशल उपयोग जैसी टिकाऊ प्रबंधन प्रथाओं की आवश्यकता है।