परिचय: भारतीय कृषि की प्रकृति
भारतीय कृषि को अक्सर ‘मानसून का जुआ’ कहा जाता है, जो इसकी प्राकृतिक कारकों पर अत्यधिक निर्भरता को दर्शाता है। हालाँकि, स्वतंत्रता के बाद, सिंचाई, प्रौद्योगिकी और सरकारी नीतियों जैसे मानव निर्मित कारकों ने कृषि परिदृश्य को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन कारकों के प्रभाव सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रहे हैं, जिन्होंने भारतीय कृषि को वर्तमान स्वरूप प्रदान किया है।
1. कृषि पर सकारात्मक प्रभाव
A. विभिन्न सिंचाई विधियों का प्रभाव
- नहर सिंचाई और नदी घाटी परियोजनाएँ:
- इन परियोजनाओं ने हरित क्रांति की नींव रखी। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में नहरों के व्यापक नेटवर्क ने गेहूं और चावल जैसी अधिक पानी की आवश्यकता वाली HYV फसलों की खेती को संभव बनाया।
- बहुउद्देशीय परियोजनाओं ने न केवल सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराया, बल्कि जलविद्युत का उत्पादन भी किया, जिसने नलकूपों को चलाने के लिए ऊर्जा प्रदान की।
- इनसे फसल प्रतिरूप में बदलाव आया, जिससे किसान नकदी फसलों की ओर आकर्षित हुए और उनकी आय में वृद्धि हुई।
- नलकूप (Tube well) और कुआँ सिंचाई:
- इसने किसानों को पानी की आपूर्ति पर अधिक नियंत्रण और लचीलापन प्रदान किया। वे अपनी फसल की आवश्यकता के अनुसार सही समय पर सिंचाई कर सकते हैं, जो नहर के पानी के निर्धारित रोटेशन पर निर्भर नहीं होता।
- इससे बहु-फसली (Multiple Cropping) को बढ़ावा मिला, क्योंकि किसान मानसून का इंतजार किए बिना जायद (गर्मी) की फसलें भी उगाने में सक्षम हुए।
- इसने उन क्षेत्रों में भी गहन कृषि को संभव बनाया जहाँ नहरों की पहुँच नहीं थी, जिससे कृषि का विस्तार हुआ।
- खाद्य सुरक्षा: इन सभी सिंचाई विधियों के संयुक्त प्रभाव से देश के खाद्यान्न उत्पादन में भारी वृद्धि हुई, जिससे भारत आत्मनिर्भर बना और अकाल का खतरा कम हुआ।
B. प्रौद्योगिकी का प्रभाव
- मशीनीकरण: ट्रैक्टर, थ्रेशर और हार्वेस्टर जैसी मशीनों के उपयोग ने कृषि कार्यों को तेज और अधिक कुशल बना दिया है, जिससे श्रम लागत में कमी आई है।
- उन्नत बीज और उर्वरक: उच्च उपज वाले, रोग प्रतिरोधी और जल्दी पकने वाले बीजों ने उत्पादकता में भारी वृद्धि की है।
2. कृषि पर नकारात्मक प्रभाव
A. प्राकृतिक आपदाओं का प्रभाव
- बाढ़ (Floods): बाढ़ से खड़ी फसलें पूरी तरह नष्ट हो जाती हैं, खेतों में गाद जमा हो जाती है और पशुधन की हानि होती है। गंगा-ब्रह्मपुत्र के मैदानों में यह एक आवर्ती समस्या है।
- सूखा (Droughts): अपर्याप्त वर्षा के कारण सूखा पड़ता है, जिससे फसलें सूख जाती हैं, चारा संकट उत्पन्न होता है और बड़े पैमाने पर किसान कर्ज में डूब जाते हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान और बुंदेलखंड क्षेत्र इससे अक्सर प्रभावित होते हैं।
- चक्रवात (Cyclones): तटीय राज्यों (ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु) में चक्रवात तेज हवाओं, भारी वर्षा और खारे पानी के भराव से फसलों, बागानों और मत्स्य पालन को भारी नुकसान पहुंचाते हैं।
B. गहन कृषि और सिंचाई के नकारात्मक प्रभाव
- जलाक्रांति और लवणता (मुख्य रूप से नहर सिंचाई से): नहरों से लगातार पानी के रिसाव के कारण आस-पास के क्षेत्रों में भूमि दलदली (waterlogging) हो जाती है। केशिका क्रिया (capillary action) द्वारा भूमिगत नमक सतह पर आ जाता है, जिससे मिट्टी लवणीय या क्षारीय हो जाती है और उसकी उर्वरता समाप्त हो जाती है।
- भूजल का अत्यधिक दोहन (मुख्य रूप से नलकूपों से): नलकूपों के माध्यम से सिंचाई पर बढ़ती निर्भरता ने, विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में, भूजल स्तर में खतरनाक गिरावट ला दी है, जिससे ‘डार्क जोन’ बन रहे हैं।
- रासायनिक उर्वरकों का दुष्प्रभाव: उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग ने मिट्टी के स्वास्थ्य को खराब कर दिया है, सूक्ष्मजीवों को नष्ट कर दिया है और जल स्रोतों को प्रदूषित किया है।
- फसल विविधता में कमी: गेहूं और चावल पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित करने से दालों और मोटे अनाजों जैसी पारंपरिक, पौष्टिक फसलों की खेती में कमी आई है।
3. प्रभाव कम करने और सुधार के उपाय
इन नकारात्मक प्रभावों को कम करने और कृषि को टिकाऊ बनाने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं:
- सूक्ष्म सिंचाई (Micro-irrigation): ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ के सिद्धांत पर आधारित ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि पानी की बर्बादी को कम किया जा सके।
- फसल विविधीकरण (Crop Diversification): सरकार किसानों को पानी की अधिक खपत वाली फसलों से हटकर दालों, तिलहन और बागवानी फसलों की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रही है।
- जैविक खेती (Organic Farming): रासायनिक आदानों के बिना खेती को बढ़ावा देना ताकि मिट्टी के स्वास्थ्य को पुनर्जीवित किया जा सके।
- सरकारी योजनाएँ: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (फसल नुकसान से सुरक्षा), मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना (मिट्टी की पोषक तत्वों की स्थिति बताने के लिए), और प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (सिंचाई कवरेज बढ़ाने के लिए) जैसी योजनाएं कृषि क्षेत्र को समर्थन प्रदान कर रही हैं।