1. परिचय: भारतीय मानसून
‘मानसून’ शब्द अरबी भाषा के शब्द ‘मौसिम’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘ऋतु’। मानसून मूल रूप से वे हवाएँ हैं जो ऋतु के अनुसार अपनी दिशा पूरी तरह से उलट देती हैं। भारतीय मानसून भारतीय उपमहाद्वीप की जलवायु का सबसे महत्वपूर्ण घटक है। यह देश की कृषि, अर्थव्यवस्था और संस्कृति की जीवन रेखा है, क्योंकि भारत की लगभग 70% वार्षिक वर्षा इसी से प्राप्त होती है।
2. भारतीय मानसून की क्रियाविधि (Mechanism)
भारतीय मानसून एक जटिल मौसमी घटना है जो कई कारकों के परस्पर प्रभाव से उत्पन्न होती है:
- स्थल और जल का विभेदी तापन (Differential Heating): गर्मियों में, भारतीय भूभाग समुद्र की तुलना में बहुत अधिक गर्म हो जाता है। इससे उत्तर-पश्चिम भारत पर एक तीव्र निम्न दाब क्षेत्र का निर्माण होता है, जबकि हिंद महासागर पर अपेक्षाकृत उच्च दाब बना रहता है। हवाएँ उच्च दाब से निम्न दाब की ओर चलती हैं, जिससे समुद्र से नमी युक्त हवाएँ भारत की ओर आकर्षित होती हैं।
- अंतःउष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) का विस्थापन: ITCZ वह निम्न दाब वाला क्षेत्र है जहाँ उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध की व्यापारिक पवनें मिलती हैं। गर्मियों में सूर्य के उत्तरायण होने के साथ, ITCZ उत्तर की ओर खिसककर गंगा के मैदान पर स्थित हो जाता है। इसे ‘मानसून गर्त’ (Monsoon Trough) भी कहा जाता है, जो मानसूनी हवाओं को आकर्षित करता है।
- तिब्बत के पठार की भूमिका: गर्मियों में तिब्बत का पठार अत्यधिक गर्म हो जाता है, जिससे वायु ऊपर उठती है और वायुमंडल के ऊपरी स्तर पर एक उच्च दाब का क्षेत्र बनता है। यह उच्च दाब उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम को मजबूत करता है, जो भारतीय मानसून को गति प्रदान करती है।
- जेट स्ट्रीम की भूमिका:
- उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट स्ट्रीम: सर्दियों में यह हिमालय के दक्षिण में बहती है, लेकिन गर्मियों में ITCZ के विस्थापन के साथ यह हिमालय के उत्तर में चली जाती है, जिससे मानसून के लिए रास्ता साफ हो जाता है।
- उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम: यह गर्मियों में प्रायद्वीपीय भारत के ऊपर बहती है और मानसून के प्रस्फोट (burst) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- दक्षिणी दोलन और अल-नीनो/ला-नीना: यह प्रशांत महासागर में दाब की स्थितियों में होने वाला उतार-चढ़ाव है। अल-नीनो (El Niño) के वर्षों में, भारतीय मानसून कमजोर हो जाता है, जिससे सूखे की आशंका बढ़ जाती है। इसके विपरीत, ला-नीना (La Niña) के वर्षों में मानसून सामान्य से अधिक मजबूत होता है।
3. दक्षिण-पश्चिम मानसून (आगमन और प्रगति)
मानसून का प्रस्फोट (Burst of the Monsoon)
जून की शुरुआत में, जब नमी युक्त मानसूनी हवाएँ भारतीय तट से टकराती हैं, तो अचानक गरज और बिजली के साथ भारी वर्षा होती है। इस घटना को ‘मानसून का प्रस्फोट’ कहा जाता है। यह मानसून आमतौर पर 1 जून के आसपास केरल तट पर पहुँचता है।
मानसून की दो शाखाएँ
प्रायद्वीपीय भारत की आकृति के कारण, दक्षिण-पश्चिम मानसून दो शाखाओं में विभाजित हो जाता है:
- अरब सागर शाखा: यह शाखा पश्चिमी घाट से टकराती है और पश्चिमी तट पर भारी वर्षा (250 सेमी से अधिक) करती है। इसके बाद यह मध्य भारत और उत्तर भारत के मैदानों की ओर बढ़ती है।
- बंगाल की खाड़ी शाखा: यह शाखा तेजी से उत्तर-पूर्व की ओर बढ़ती है और म्यांमार के अराकान योमा पर्वतों से टकराकर पश्चिम की ओर मुड़ जाती है। यह खासी पहाड़ियों के गारो-खासी-जयंतिया कीप में भारी वर्षा करती है (उदाहरण: मौसिनराम)। इसके बाद यह गंगा के मैदानों में पश्चिम की ओर बढ़ती है।
ये दोनों शाखाएँ अंततः गंगा के मैदानों में एक-दूसरे से मिल जाती हैं।
4. मानसून का निवर्तन (उत्तर-पूर्व मानसून)
सितंबर के अंत तक, सूर्य के दक्षिणायन होने के साथ, भारतीय भूभाग पर बना निम्न दाब क्षेत्र कमजोर पड़ने लगता है और धीरे-धीरे उच्च दाब में बदल जाता है। इसके परिणामस्वरूप, हवा की दिशा उलट जाती है और पवनें स्थल से समुद्र की ओर बहने लगती हैं। इसे ‘मानसून का निवर्तन’ या ‘लौटता हुआ मानसून’ कहा जाता है।
- यह अवधि साफ आसमान और तापमान में वृद्धि की विशेषता है, जिसे ‘अक्टूबर की गर्मी’ (October Heat) भी कहते हैं।
- जब ये हवाएँ बंगाल की खाड़ी से गुजरती हैं, तो वे नमी ग्रहण कर लेती हैं और तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और दक्षिणी कर्नाटक के तटों पर भारी वर्षा करती हैं। तमिलनाडु का अधिकांश भाग अपनी वर्षा इसी उत्तर-पूर्व मानसून से प्राप्त करता है।
5. ENSO चक्र: अल-नीनो और ला-नीना का प्रभाव
ENSO (El Niño-Southern Oscillation) चक्र प्रशांत महासागर में होने वाली एक प्राकृतिक घटना है, जिसका भारतीय मानसून पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इसमें दो मुख्य चरण होते हैं: अल-नीनो और ला-नीना।
दक्षिणी दोलन (Southern Oscillation)
यह प्रशांत महासागर के पूर्वी और पश्चिमी भागों के बीच वायुमंडलीय दाब में होने वाले उतार-चढ़ाव को संदर्भित करता है। जब दाब की स्थिति सामान्य से उलट जाती है, तो यह अल-नीनो या ला-नीना की घटनाओं को जन्म देता है।
अल-नीनो (El Niño) और मानसून पर इसका प्रभाव
अल-नीनो एक ऐसी घटना है जिसमें पूर्वी प्रशांत महासागर (पेरू के तट के पास) का सतही जल असामान्य रूप से गर्म हो जाता है।
- प्रभाव: पूर्वी प्रशांत में गर्म जल के कारण वहां निम्न दाब का क्षेत्र बनता है, जबकि पश्चिमी प्रशांत (इंडोनेशिया और भारतीय उपमहाद्वीप के पास) में उच्च दाब विकसित हो जाता है।
- भारतीय मानसून पर असर: पश्चिमी प्रशांत में उच्च दाब बनने से भारत की ओर आने वाली मानसूनी हवाएँ कमजोर पड़ जाती हैं। इससे भारत में वर्षा सामान्य से कम होती है और सूखे की आशंका बढ़ जाती है।
ला-नीना (La Niña) और मानसून पर इसका प्रभाव
ला-नीना, अल-नीनो के विपरीत घटना है। इसमें पूर्वी प्रशांत महासागर का सतही जल असामान्य रूप से ठंडा हो जाता है।
- प्रभाव: पूर्वी प्रशांत में ठंडे जल के कारण वहां उच्च दाब और मजबूत हो जाता है, जबकि पश्चिमी प्रशांत में निम्न दाब और गहरा हो जाता है।
- भारतीय मानसून पर असर: पश्चिमी प्रशांत में मजबूत निम्न दाब बनने से भारत की ओर आने वाली मानसूनी हवाएँ और अधिक शक्तिशाली हो जाती हैं। इससे भारत में सामान्य से अधिक वर्षा होने की संभावना रहती है।
6. निष्कर्ष
भारतीय मानसून एक जीवनदायिनी शक्ति है, लेकिन इसकी प्रकृति अत्यधिक परिवर्तनशील है। इसकी अनिश्चितता—कभी देरी से आना, कभी जल्दी चले जाना, और वर्षा का असमान वितरण—इसे भारतीय किसानों और नीति निर्माताओं के लिए एक निरंतर चुनौती बनाती है। यह भारत की जलवायु प्रणाली का हृदय है जो देश की rythms of life को नियंत्रित करता है।