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 हिंदी साहित्य के आदिकाल का विस्तृत अध्ययन

परिचय

आदिकाल हिंदी साहित्य के प्रारंभिक काल को संदर्भित करता है। यह सामान्यतः 10वीं शताब्दी से 14वीं शताब्दी तक माना जाता है। इस काल में हिंदी साहित्य की नींव रखी गई, जिसमें विभिन्न प्रवृत्तियों और शैलियों का विकास हुआ।

आदिकाल का वर्गीकरण

आदिकाल को मुख्य रूप से वीरगाथा काल के नाम से जाना जाता है क्योंकि इस अवधि में वीर रस की प्रधानता वाले काव्यों की बहुलता थी। हालाँकि, आदिकाल को केवल वीरगाथा काल कहना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि इसमें कई अन्य प्रकार का साहित्य भी रचा गया। आदिकाल के भीतर प्रमुख साहित्यिक धाराएँ इस प्रकार हैं:

  • रासो साहित्य (वीरगाथा काव्य): यह इस काल की सबसे प्रमुख प्रवृत्ति थी, जिसमें राजपूत राजाओं और योद्धाओं की वीरता, शौर्य, युद्धों और प्रेम का वर्णन किया गया।
  • सिद्ध साहित्य: सिद्धों द्वारा रचित काव्य, जिसमें बौद्ध धर्म के वज्रयान शाखा का प्रभाव था। इसमें तंत्र-मंत्र और साधना को महत्व दिया गया।
  • नाथ साहित्य: नाथ पंथ के योगियों द्वारा रचित साहित्य, जिसमें हठयोग, वैराग्य और आडंबरहीनता पर जोर दिया गया।
  • जैन साहित्य: जैन मुनियों द्वारा रचित काव्य, जिसमें जैन धर्म के सिद्धांतों, उपदेशों और पौराणिक कथाओं का वर्णन मिलता है।
  • लौकिक साहित्य: इस श्रेणी में दरबारी कवियों और लोक कवियों द्वारा रचित साहित्य आता है, जिसमें प्रेम, मनोरंजन और आम जनजीवन से संबंधित विषयों को उठाया गया। अमीर खुसरो की पहेलियाँ, मुकरियाँ और दोहे इसी श्रेणी के अंतर्गत आते हैं।

यह समझना महत्वपूर्ण है कि भक्तिकाल (14वीं से 17वीं शताब्दी) और रीतिकाल आदिकाल के अलग और बाद के युग हैं। हालांकि आदिकाल के अंत में भक्ति और सूफी परंपराओं के शुरुआती संकेत मिलते हैं, पर ये स्वयं में अलग साहित्यिक काल हैं।

आदिकाल की प्रमुख विशेषताएँ

  • वीरता और शौर्य की प्रधानता: इस काल की अधिकांश रचनाओं में युद्धों का सजीव चित्रण और योद्धाओं की वीरता का गुणगान किया गया है।
  • ऐतिहासिकता का अभाव: यद्यपि रचनाएँ ऐतिहासिक पात्रों पर आधारित थीं, फिर भी उनमें कल्पना का पुट अधिक था, जिससे ऐतिहासिक घटनाओं की सटीकता संदिग्ध रहती है।
  • सामूहिक राष्ट्रीय चेतना का अभाव: उस समय भारत छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था, इसलिए राष्ट्रीय भावना की जगह क्षेत्रीय राजाओं की प्रशंसा अधिक मिलती है।
  • डिंगल और पिंगल भाषाओं का प्रयोग: रचनाएँ मुख्य रूप से अपभ्रंश और अवहट्ट भाषाओं में लिखी गई थीं। डिंगल (राजस्थानी मिश्रित अपभ्रंश) और पिंगल (ब्रजभाषा मिश्रित अपभ्रंश) शैलियाँ विशेष रूप से प्रचलित थीं।
  • छंदों का विविध प्रयोग: दोहा, सोरठा, चौपाई, छप्पय, कवित्त जैसे अनेक छंदों का प्रयोग मिलता है।
  • आश्रयदाताओं की प्रशंसा: कवि अपने आश्रयदाता राजाओं की वीरता और यश का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करते थे।

प्रमुख रचनाएँ और रचनाकार

  • चंदबरदाई: हिंदी साहित्य के आदिकाल के सबसे महत्वपूर्ण कवि। इनकी कालजयी रचना “पृथ्वीराज रासो” है, जो पृथ्वीराज चौहान के जीवन और वीरता का विस्तृत वर्णन करती है। यह वीर रस का एक उत्तम महाकाव्य है।
  • दलपति विजय: इनकी रचना “खुमान रासो” है, जिसमें मेवाड़ के राजा खुमान सिंह की वीरता का चित्रण है।
  • नरपति नाल्ह: इनकी प्रसिद्ध रचना “बीसलदेव रासो” है। यह एक शृंगारिक रचना है जो अजमेर के राजा बीसलदेव (विग्रहराज चतुर्थ) और उनकी रानी राजमती की प्रेम कथा पर आधारित है।
  • जगनिक: इनकी प्रसिद्ध रचना “परमाल रासो” है, जिसे ‘आल्हा-खण्ड’ के नाम से भी जाना जाता है। इसमें महोबा के दो वीर योद्धाओं, आल्हा और ऊदल की वीरता का ओजस्वी वर्णन है।
  • अमीर खुसरो: ये आदिकाल के महत्वपूर्ण कवि हैं, जिन्होंने खड़ी बोली (हिंदवी) के प्रारंभिक रूप में पहेलियाँ, मुकरियाँ, दोहे और गजलें लिखीं। ये सूफी प्रभाव वाले लौकिक कवि थे।
  • विद्यापति: ये मैथिली के प्रसिद्ध कवि थे, जिनकी रचनाओं में भक्ति और शृंगार का अद्भुत मिश्रण मिलता है। इनकी पदावली अत्यधिक लोकप्रिय है।

आदिकाल का महत्व

आदिकाल हिंदी साहित्य का आधारस्तंभ है। इस काल ने हिंदी साहित्य को एक मजबूत नींव प्रदान की, जिससे आगे चलकर भक्तिकाल और रीतिकाल में साहित्यिक समृद्धि आई। इस समय की रचनाएँ न केवल साहित्यिक धरोहर हैं, बल्कि तत्कालीन भारतीय समाज, संस्कृति और ऐतिहासिक परिस्थितियों को समझने के लिए भी अमूल्य स्रोत हैं। यद्यपि कुछ विद्वान इसकी भाषा और शैली को लेकर आलोचना करते हैं, फिर भी इसकी ऐतिहासिक और साहित्यिक महत्ता निर्विवाद है।

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