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हिंदी साहित्य का इतिहास: रीतिकाल

1. रीतिकाल का परिचय

रीतिकाल (17वीं से 18वीं शताब्दी) हिंदी साहित्य का एक महत्वपूर्ण कालखंड है, जो मुख्यतः शृंगारिक काव्य और नायिका-भेद पर केंद्रित था। इस काल में हिंदी काव्यशास्त्र का विकास हुआ और काव्य कला के नियमों के पालन पर विशेष ध्यान दिया गया। रीतिकाल का साहित्य दरबारी संस्कृति और शृंगार रस के चित्रण से प्रभावित था।

  • कालावधि: 17वीं से 18वीं शताब्दी
  • प्रमुख विशेषता: शृंगारिक काव्य और दरबारी जीवन का चित्रण।
  • मुख्य उद्देश्य: काव्यशास्त्र के नियमों के आधार पर साहित्य सृजन और नायिका भेद का विस्तृत वर्णन।
  • धार्मिक एवं सांस्कृतिक प्रभाव: इस काल का साहित्य मुख्यतः दरबारी संस्कृति से प्रभावित था, जिसमें राजाओं और नवाबों के दरबारों का महत्त्वपूर्ण योगदान था।

2. रीतिकाल की प्रमुख विशेषताएँ

  • काव्यशास्त्र और अलंकारवाद: रीतिकाल के कवियों ने काव्यशास्त्र और अलंकारों पर विशेष ध्यान दिया। इस काल में काव्य कला को नियमबद्ध ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया।
  • शृंगार रस की प्रधानता: इस युग में शृंगार रस की प्रधानता रही, जो संयोग और वियोग दोनों रूपों में व्यक्त किया गया।
  • नायिका भेद: नायिकाओं के विभिन्न प्रकारों (स्वाधीनपतिका, अभिसारिका, आदि) का वर्णन करते हुए कवियों ने काव्य में विविधता लाई।
  • राजा और दरबारी संस्कृति का प्रभाव: अधिकांश कवियों ने राजाओं के दरबार में रहकर काव्य रचना की। उनके साहित्य में दरबारी जीवन और विलासिता का चित्रण प्रमुखता से हुआ।
  • भाषा: ब्रज भाषा का प्रयोग मुख्य रूप से हुआ, जो शृंगार और प्रेम के चित्रण के लिए उपयुक्त थी।

3. रीतिकाल के प्रमुख कवि और उनकी रचनाएँ

  • भूषण: वे वीर रस और शृंगार रस दोनों के कवि थे। उनकी प्रमुख रचनाएँ ‘शिवराज भूषण’ और ‘छत्रसाल दशक’ हैं। भूषण ने छत्रपति शिवाजी और बुंदेलखंड के राजा छत्रसाल की वीरता का वर्णन किया है।
  • बिहारी: वे ‘सतसई’ के रचनाकार हैं, जिसमें 700 दोहों का संकलन है। बिहारी ने शृंगार और प्रेम के संयोग और वियोग पक्षों का सुंदर चित्रण किया।
  • केशवदास: उन्होंने ‘रसिकप्रिया’ और ‘कविप्रिया’ जैसे ग्रंथ लिखे। केशवदास ने काव्यशास्त्र को विस्तार से समझाया और नायिका भेद का विश्लेषण किया।
  • रायप्रवीण: वे एक प्रतिभाशाली कवयित्री और नर्तकी थीं। रायप्रवीण ने अपने काव्य में प्रेम और शृंगार का सुंदर वर्णन किया।
  • घनानंद: उनके काव्य में प्रेम का वियोग पक्ष अधिक दिखाई देता है। घनानंद की शैली में भावुकता और सरलता का अद्भुत समन्वय है।

4. रीतिकाल की काव्य शैलियाँ

  • अलंकारिक काव्य: रीतिकाल में अलंकारों का व्यापक प्रयोग हुआ। कवियों ने शब्दालंकार और अर्थालंकार दोनों का कुशलता से प्रयोग किया।
  • शृंगारिक काव्य: शृंगार रस का चित्रण संयोग (प्रेम मिलन) और वियोग (प्रेम की पीड़ा) दोनों रूपों में हुआ। बिहारी के ‘सतसई’ में इसका सुंदर उदाहरण मिलता है।
  • वीर रस: भूषण और अन्य कवियों ने वीर रस का प्रयोग कर शौर्य और वीरता को दर्शाया। यह विशेष रूप से शिवाजी और छत्रसाल जैसे राजाओं के जीवन पर आधारित था।
  • नायिका भेद: रीतिकाल में नायिकाओं के विभिन्न रूपों का विस्तृत वर्णन हुआ। उदाहरणस्वरूप:
    • स्वाधीनपतिका: जो अपने पति से स्वतंत्रता का अनुभव करती है।
    • अभिसारिका: जो अपने प्रिय से मिलने के लिए जाती है।
    • विप्रलब्धा: जिसे अपने प्रिय का मिलन नहीं हो पाता।

5. रीतिकाल के सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव

  • दरबारी संस्कृति: रीतिकाल का साहित्य मुख्यतः दरबारी संस्कृति से प्रभावित था। कवियों ने राजाओं और दरबारियों की विलासिता और शृंगारिक जीवन का वर्णन किया।
  • स्त्रियों का चित्रण: रीतिकाल के साहित्य में नायिकाओं के विभिन्न रूपों और उनकी भावनाओं को प्रमुखता से चित्रित किया गया। इसमें स्त्रियों की सुंदरता, प्रेम और भावनाओं का उत्कृष्ट चित्रण है।
  • भाषा का प्रयोग: इस काल में ब्रज भाषा का प्रचलन हुआ, जो प्रेम और शृंगार के चित्रण के लिए उपयुक्त मानी गई। कवियों ने इसे सजावटी और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।

6. रीतिकाल का वर्गीकरण

रीतिकाल को प्रमुख रूप से तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है:

  • a) प्रारंभिक रीतिकाल:
    • इस काल में अलंकार और शृंगारिकता की प्रधानता थी।
    • केशवदास और उनके जैसे कवियों ने काव्यशास्त्र के नियमों का पालन करते हुए साहित्य रचना की।
  • b) मध्य रीतिकाल:
    • इस काल में बिहारी और भूषण जैसे कवियों ने शृंगार और वीर रस पर ध्यान केंद्रित किया।
    • बिहारी का ‘सतसई’ और भूषण का वीर काव्य इस काल की प्रमुख रचनाएँ हैं।
  • c) उत्तर रीतिकाल:
    • इस समय में कवियों ने दरबारी संस्कृति और प्रेम के वियोग पक्ष पर ध्यान दिया।
    • घनानंद और अन्य कवियों ने प्रेम की पीड़ा और दरबारी जीवन का वर्णन किया।

7. रीतिकाल के महत्वपूर्ण तथ्य (MCQ में पूछे जा सकने वाले)

  • रीतिकाल का समय 17वीं से 18वीं शताब्दी तक फैला है।
  • बिहारी ने ‘सतसई’ की रचना की, जिसमें 700 दोहे संकलित हैं।
  • भूषण ने ‘शिवराज भूषण’ की रचना की और शिवाजी की वीरता का वर्णन किया।
  • घनानंद ने प्रेम के वियोग पक्ष पर ध्यान दिया, और उनके काव्य में भावुकता प्रमुख है।
  • केशवदास ने ‘रसिकप्रिया’ में नायिका भेद का विस्तार से वर्णन किया।
  • रीतिकाल के साहित्य में मुख्यतः ब्रज भाषा का प्रयोग हुआ।
  • रीतिकाल के साहित्य में शृंगार रस की प्रधानता है।

8. रीतिकाल की काव्य शैलियाँ (संक्षिप्त विवरण)

  • अलंकारिक काव्य:
    • कवि: केशवदास
    • विषय: नायिका भेद, अलंकार
  • वीर रस:
    • कवि: भूषण
    • विषय: शौर्य, वीरता
  • शृंगारिक काव्य:
    • कवि: बिहारी
    • विषय: प्रेम का संयोग और वियोग
  • वियोग काव्य:
    • कवि: घनानंद
    • विषय: प्रेम की पीड़ा और दरबारी जीवन

9. निष्कर्ष

रीतिकाल हिंदी साहित्य का एक महत्वपूर्ण काल है, जिसने शृंगार और अलंकारों के माध्यम से काव्य कला को ऊँचाई दी। इस युग के कवियों ने प्रेम, शृंगार, और दरबारी जीवन को प्रमुखता से चित्रित किया। रीतिकाल का साहित्य आज भी हिंदी काव्यशास्त्र में अपनी विशेष पहचान बनाए हुए है और इसकी रचनाएँ साहित्य प्रेमियों के बीच लोकप्रिय हैं।

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