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अकबर शाह द्वितीय (Akbar Shah II)

अकबर शाह द्वितीय, जिसे अकबर द्वितीय के नाम से भी जाना जाता है, मुगल साम्राज्य का तेरहवां शासक था। उसका शासनकाल (1806-1837 ईस्वी) मुगल साम्राज्य के अंतिम चरण का प्रतिनिधित्व करता है, जब मुगल बादशाह केवल नाममात्र के शासक रह गए थे और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी भारत की वास्तविक शक्ति बन चुकी थी।

1. प्रारंभिक जीवन और राज्याभिषेक (Early Life and Accession)

  • जन्म: 22 अप्रैल 1760 ईस्वी को मुकुंदपुर में।
  • पिता: शाह आलम द्वितीय।
  • राज्याभिषेक: अपने पिता शाह आलम द्वितीय की मृत्यु के बाद, वह 1806 ईस्वी में दिल्ली की गद्दी पर बैठा।
  • स्थिति: उसके राज्याभिषेक के समय तक, मुगल साम्राज्य का अधिकार केवल दिल्ली के लाल किले तक सीमित रह गया था, और वह अंग्रेजों के संरक्षण में एक पेंशनभोगी मात्र था।

2. शासनकाल की चुनौतियाँ (Challenges of the Reign)

अकबर शाह द्वितीय का शासनकाल अत्यंत सीमित शक्ति और ब्रिटिश प्रभुत्व की विशेषता थी।

  • नाममात्र का शासक: वह केवल नाममात्र का सम्राट था, जिसके पास कोई वास्तविक राजनीतिक या सैन्य शक्ति नहीं थी।
  • ब्रिटिश नियंत्रण: ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत के अधिकांश हिस्सों पर नियंत्रण कर लिया था और मुगल बादशाह को केवल एक पेंशनभोगी के रूप में देखा जाता था।
  • प्रतिष्ठा का क्षरण: मुगल बादशाह की प्रतिष्ठा लगभग समाप्त हो चुकी थी, और उसे ब्रिटिश गवर्नर-जनरल के समकक्ष भी नहीं माना जाता था।
  • वित्तीय संकट: शाही खजाना खाली था, और बादशाह अपनी दैनिक जरूरतों के लिए भी अंग्रेजों की पेंशन पर निर्भर था।

3. अंग्रेजों से संबंध और संघर्ष (Relations and Conflicts with the British)

अकबर शाह द्वितीय ने अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा और पेंशन को बढ़ाने के लिए अंग्रेजों से संघर्ष किया।

  • ‘राजा’ की उपाधि:
    • उसने राजा राम मोहन राय को ‘राजा’ की उपाधि प्रदान की।
    • उन्हें 1830 ईस्वी में ब्रिटेन भेजा ताकि वे ब्रिटिश सम्राट से मुगल बादशाह की पेंशन बढ़ाने और उसकी प्रतिष्ठा को बहाल करने के लिए बातचीत कर सकें।
    • हालांकि, राम मोहन राय इस मिशन में पूरी तरह से सफल नहीं हो सके।
  • मुगल सिक्कों का बंद होना: 1835 ईस्वी में, ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने सिक्कों पर मुगल सम्राट का नाम हटा दिया, जिससे मुगल संप्रभुता का अंतिम प्रतीक भी समाप्त हो गया।
  • शाही उपाधियों का त्याग: ब्रिटिश गवर्नर-जनरलों ने मुगल बादशाह को ‘सम्राट’ के रूप में संबोधित करना बंद कर दिया।

4. व्यक्तित्व और विरासत (Personality and Legacy)

  • व्यक्तित्व: अकबर शाह द्वितीय एक कमजोर और असहाय शासक था, जो बदलती परिस्थितियों में अपनी शक्ति को पुनः प्राप्त करने में असमर्थ था।
  • कला और संस्कृति का संरक्षक:
    • हालांकि उसकी राजनीतिक शक्ति नगण्य थी, उसने कला, साहित्य और संस्कृति को संरक्षण दिया।
    • उसने ‘फूल वालों की सैर’ नामक एक धर्मनिरपेक्ष त्योहार की शुरुआत की, जो दिल्ली में हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक था।
  • विरासत:
    • उसका शासनकाल मुगल साम्राज्य के पूरी तरह से पतन और भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के पूर्ण प्रभुत्व का प्रतीक है।
    • वह अंतिम मुगल सम्राट था जिसने नाममात्र की शाही उपाधि धारण की, जिसके बाद उसका पुत्र बहादुर शाह ज़फर अंतिम मुगल सम्राट बना।

5. मृत्यु (Death)

  • मृत्यु: 28 सितंबर 1837 ईस्वी को दिल्ली के लाल किले में।

6. निष्कर्ष (Conclusion)

अकबर शाह द्वितीय का शासनकाल मुगल साम्राज्य के इतिहास में एक दुखद अंत की ओर बढ़ते कदम का प्रतिनिधित्व करता है। वह एक ऐसे समय में गद्दी पर बैठा जब मुगल सत्ता केवल एक स्मृति बन चुकी थी और ब्रिटिश साम्राज्य भारत का वास्तविक शासक बन गया था। उसकी असहाय स्थिति और अंग्रेजों पर निर्भरता ने यह स्पष्ट कर दिया कि मुगल युग अब समाप्त हो चुका था, और भारत में एक नए औपनिवेशिक अध्याय की शुरुआत हो चुकी थी।

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