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असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement)

असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement) महात्मा गांधी के नेतृत्व में 1920 में शुरू हुआ और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। यह भारत का पहला अखिल भारतीय जन आंदोलन था, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार को भारत में शासन करने के लिए भारतीयों के सहयोग से वंचित करना था, ताकि उसे स्वराज प्रदान करने के लिए मजबूर किया जा सके।

1. पृष्ठभूमि और आंदोलन के कारण (Background and Causes of the Movement)

प्रथम विश्व युद्ध के बाद की घटनाओं और ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों ने असहयोग आंदोलन के लिए मंच तैयार किया।

  • प्रथम विश्व युद्ध के बाद का असंतोष: प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीयों ने ब्रिटिश सरकार का समर्थन किया था, लेकिन युद्ध के बाद उन्हें कोई महत्वपूर्ण संवैधानिक सुधार नहीं मिला। इसके बजाय, आर्थिक कठिनाइयाँ और दमनकारी कानून बढ़ा दिए गए।
  • रॉलेट एक्ट (1919): इस अधिनियम ने सरकार को बिना मुकदमे के किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने और हिरासत में रखने का अधिकार दिया। इसे ‘बिना वकील, बिना अपील, बिना दलील’ का कानून कहा गया और इसने व्यापक विरोध को जन्म दिया।
  • जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919): रॉलेट एक्ट के विरोध में पंजाब के अमृतसर में जलियांवाला बाग में एक शांतिपूर्ण सभा पर जनरल डायर ने गोलीबारी का आदेश दिया, जिसमें सैकड़ों निर्दोष लोग मारे गए। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया और ब्रिटिश शासन के प्रति गहरा आक्रोश पैदा किया।
  • खिलाफत आंदोलन (1919-1924): तुर्की के खलीफा के प्रति ब्रिटिश सरकार के रवैये के खिलाफ भारत में मुसलमानों द्वारा खिलाफत आंदोलन शुरू किया गया था। गांधीजी ने इसे हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए एक अवसर के रूप में देखा और असहयोग आंदोलन के साथ जोड़ दिया।
  • मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार (1919) की अपर्याप्तता: इन सुधारों ने भारतीयों की आकांक्षाओं को पूरा नहीं किया और उन्हें बहुत सीमित अधिकार दिए गए।
  • गांधीजी का नेतृत्व: चंपारण, अहमदाबाद और खेड़ा में गांधीजी के सफल सत्याग्रहों ने उन्हें एक विश्वसनीय जन नेता के रूप में स्थापित किया, जो एक बड़े आंदोलन का नेतृत्व करने में सक्षम थे।

2. आंदोलन का अनुमोदन और कार्यक्रम (Approval and Program of the Movement)

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने विशेष सत्रों में असहयोग आंदोलन के प्रस्ताव को पारित किया और इसके लिए एक विस्तृत कार्यक्रम तैयार किया।

  • कलकत्ता अधिवेशन (सितंबर 1920):
    • लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में हुए इस विशेष अधिवेशन में गांधीजी ने असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव रखा।
    • प्रारंभ में, सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू जैसे कुछ नेताओं ने इसका विरोध किया, लेकिन अंततः इसे पारित कर दिया गया।
  • नागपुर अधिवेशन (दिसंबर 1920):
    • सी. विजयराघवाचारी की अध्यक्षता में हुए इस नियमित अधिवेशन में असहयोग आंदोलन के प्रस्ताव को पुष्टि मिली।
    • कांग्रेस के संविधान में परिवर्तन किए गए ताकि इसे एक जन संगठन बनाया जा सके।
  • आंदोलन का कार्यक्रम:
    • बहिष्कार (Boycott):
      • सरकारी उपाधियों और सम्मानों का त्याग।
      • सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और अदालतों का बहिष्कार।
      • विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और सार्वजनिक रूप से उनकी होली जलाना।
      • विधान परिषदों के चुनावों का बहिष्कार।
      • सरकारी समारोहों का बहिष्कार।
    • रचनात्मक कार्यक्रम (Constructive Program):
      • राष्ट्रीय स्कूलों और कॉलेजों की स्थापना (जैसे जामिया मिलिया इस्लामिया, काशी विद्यापीठ)।
      • स्वदेशी वस्तुओं, विशेषकर खादी और हथकरघा को बढ़ावा देना।
      • अस्पृश्यता का उन्मूलन और हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देना।
      • पंचायतों की स्थापना।
      • चरखा और खादी का प्रचार।

3. आंदोलन का प्रसार और जन भागीदारी (Spread and Mass Participation)

असहयोग आंदोलन ने समाज के सभी वर्गों को एकजुट किया और एक अभूतपूर्व जन भागीदारी देखी गई।

  • छात्रों की भागीदारी: हजारों छात्रों ने सरकारी स्कूलों और कॉलेजों को छोड़ दिया और राष्ट्रीय संस्थानों में शामिल हो गए।
  • वकीलों का त्याग: मोतीलाल नेहरू, सी.आर. दास, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, राजेंद्र प्रसाद, आसफ अली जैसे कई प्रमुख वकीलों ने अपनी वकालत छोड़ दी।
  • महिलाओं की भूमिका: महिलाओं ने शराब की दुकानों और विदेशी कपड़ों की दुकानों पर धरना दिया और आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया।
  • किसानों और मजदूरों की भागीदारी: विभिन्न क्षेत्रों में किसान और मजदूर आंदोलन में शामिल हुए, अक्सर स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ते हुए।
  • हिंदू-मुस्लिम एकता: खिलाफत आंदोलन के साथ असहयोग आंदोलन के विलय ने हिंदू और मुसलमानों के बीच अभूतपूर्व एकता का प्रदर्शन किया।
  • विभिन्न क्षेत्रों में प्रसार: आंदोलन शहरों से निकलकर ग्रामीण क्षेत्रों तक फैल गया, जिसमें अवध किसान आंदोलन, मोपला विद्रोह (केरल) और आंध्र प्रदेश में वन सत्याग्रह जैसे स्थानीय आंदोलन शामिल थे।
  • स्वदेशी और खादी का प्रचार: खादी राष्ट्रीय आंदोलन का प्रतीक बन गई और स्वदेशी वस्तुओं की बिक्री में वृद्धि हुई।

4. आंदोलन की समाप्ति (Withdrawal of the Movement)

चौरी-चौरा की घटना के कारण गांधीजी ने असहयोग आंदोलन को अचानक समाप्त करने का निर्णय लिया।

  • चौरी-चौरा की घटना (फरवरी 1922):
    • 5 फरवरी, 1922 को, उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा नामक स्थान पर, एक हिंसक भीड़ ने एक पुलिस थाने में आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मी मारे गए।
    • यह घटना तब हुई जब पुलिस ने असहयोग आंदोलन के एक शांतिपूर्ण जुलूस पर गोलीबारी की थी।
  • गांधीजी का निर्णय:
    • गांधीजी, जो अहिंसा के कट्टर समर्थक थे, इस घटना से बहुत दुखी हुए। उन्हें लगा कि आंदोलन हिंसक होता जा रहा है और जनता अभी तक सत्याग्रह के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं है।
    • 12 फरवरी, 1922 को, गांधीजी ने असहयोग आंदोलन को तत्काल समाप्त करने की घोषणा की।
  • प्रतिक्रिया: गांधीजी के इस निर्णय से कई नेता (जैसे मोतीलाल नेहरू, सी.आर. दास, सुभाष चंद्र बोस) निराश हुए, क्योंकि उन्हें लगा कि आंदोलन अपनी चरम सीमा पर था।

5. आंदोलन का महत्व और परिणाम (Significance and Consequences of the Movement)

असहयोग आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर गहरा और स्थायी प्रभाव डाला।

  • जन आंदोलन का उदय: यह भारत का पहला अखिल भारतीय जन आंदोलन था, जिसने स्वतंत्रता संग्राम को शिक्षित वर्ग से निकालकर आम जनता तक पहुँचाया।
  • गांधीजी का नेतृत्व स्थापित: इसने महात्मा गांधी को एक अविवादित राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित किया।
  • ब्रिटिश शासन की नींव हिलाई: आंदोलन ने ब्रिटिश प्रशासन को हिला दिया और ब्रिटिश सरकार को यह एहसास कराया कि भारत पर शासन करना अब आसान नहीं होगा।
  • आत्म-विश्वास और आत्म-निर्भरता: इसने भारतीयों में आत्म-विश्वास और आत्म-निर्भरता की भावना जगाई।
  • हिंदू-मुस्लिम एकता: खिलाफत आंदोलन के साथ इसके विलय ने अल्पकालिक लेकिन मजबूत हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रदर्शन किया।
  • स्वदेशी और खादी का प्रचार: इसने स्वदेशी उद्योगों और खादी को बढ़ावा दिया, जिससे आर्थिक राष्ट्रवाद को बल मिला।
  • भविष्य के आंदोलनों के लिए नींव: इसने सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन जैसे भविष्य के बड़े आंदोलनों के लिए एक मजबूत नींव तैयार की।

6. निष्कर्ष (Conclusion)

असहयोग आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक युगांतरकारी घटना थी, जिसने महात्मा गांधी के नेतृत्व में ब्रिटिश शासन के खिलाफ पहली बार एक संगठित और अखिल भारतीय जन प्रतिरोध देखा। रॉलेट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड और खिलाफत आंदोलन जैसे कारणों से प्रेरित होकर, इस आंदोलन ने ब्रिटिश संस्थाओं का बहिष्कार किया और स्वदेशी तथा राष्ट्रीय शिक्षा को बढ़ावा दिया। यद्यपि चौरी-चौरा की घटना के कारण इसे अचानक समाप्त कर दिया गया, असहयोग आंदोलन ने भारतीयों में आत्म-विश्वास जगाया, गांधीजी को एक राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित किया, और भविष्य के बड़े आंदोलनों के लिए एक मजबूत नींव तैयार की। यह भारतीय राष्ट्रवाद के विकास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बना रहेगा।

असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement) महात्मा गांधी के नेतृत्व में 1920 में शुरू हुआ और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। यह भारत का पहला अखिल भारतीय जन आंदोलन था, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार को भारत में शासन करने के लिए भारतीयों के सहयोग से वंचित करना था, ताकि उसे स्वराज प्रदान करने के लिए मजबूर किया जा सके।

1. पृष्ठभूमि और आंदोलन के कारण (Background and Causes of the Movement)

प्रथम विश्व युद्ध के बाद की घटनाओं और ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों ने असहयोग आंदोलन के लिए मंच तैयार किया।

  • प्रथम विश्व युद्ध के बाद का असंतोष: प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीयों ने ब्रिटिश सरकार का समर्थन किया था, लेकिन युद्ध के बाद उन्हें कोई महत्वपूर्ण संवैधानिक सुधार नहीं मिला। इसके बजाय, आर्थिक कठिनाइयाँ और दमनकारी कानून बढ़ा दिए गए।
  • रॉलेट एक्ट (1919): इस अधिनियम ने सरकार को बिना मुकदमे के किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने और हिरासत में रखने का अधिकार दिया। इसे ‘बिना वकील, बिना अपील, बिना दलील’ का कानून कहा गया और इसने व्यापक विरोध को जन्म दिया।
  • जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919): रॉलेट एक्ट के विरोध में पंजाब के अमृतसर में जलियांवाला बाग में एक शांतिपूर्ण सभा पर जनरल डायर ने गोलीबारी का आदेश दिया, जिसमें सैकड़ों निर्दोष लोग मारे गए। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया और ब्रिटिश शासन के प्रति गहरा आक्रोश पैदा किया।
  • खिलाफत आंदोलन (1919-1924): तुर्की के खलीफा के प्रति ब्रिटिश सरकार के रवैये के खिलाफ भारत में मुसलमानों द्वारा खिलाफत आंदोलन शुरू किया गया था। गांधीजी ने इसे हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए एक अवसर के रूप में देखा और असहयोग आंदोलन के साथ जोड़ दिया।
  • मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार (1919) की अपर्याप्तता: इन सुधारों ने भारतीयों की आकांक्षाओं को पूरा नहीं किया और उन्हें बहुत सीमित अधिकार दिए गए।
  • गांधीजी का नेतृत्व: चंपारण, अहमदाबाद और खेड़ा में गांधीजी के सफल सत्याग्रहों ने उन्हें एक विश्वसनीय जन नेता के रूप में स्थापित किया, जो एक बड़े आंदोलन का नेतृत्व करने में सक्षम थे।

2. आंदोलन का अनुमोदन और कार्यक्रम (Approval and Program of the Movement)

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने विशेष सत्रों में असहयोग आंदोलन के प्रस्ताव को पारित किया और इसके लिए एक विस्तृत कार्यक्रम तैयार किया।

  • कलकत्ता अधिवेशन (सितंबर 1920):
    • लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में हुए इस विशेष अधिवेशन में गांधीजी ने असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव रखा।
    • प्रारंभ में, सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू जैसे कुछ नेताओं ने इसका विरोध किया, लेकिन अंततः इसे पारित कर दिया गया।
  • नागपुर अधिवेशन (दिसंबर 1920):
    • सी. विजयराघवाचारी की अध्यक्षता में हुए इस नियमित अधिवेशन में असहयोग आंदोलन के प्रस्ताव को पुष्टि मिली।
    • कांग्रेस के संविधान में परिवर्तन किए गए ताकि इसे एक जन संगठन बनाया जा सके।
  • आंदोलन का कार्यक्रम:
    • बहिष्कार (Boycott):
      • सरकारी उपाधियों और सम्मानों का त्याग।
      • सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और अदालतों का बहिष्कार।
      • विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और सार्वजनिक रूप से उनकी होली जलाना।
      • विधान परिषदों के चुनावों का बहिष्कार।
      • सरकारी समारोहों का बहिष्कार।
    • रचनात्मक कार्यक्रम (Constructive Program):
      • राष्ट्रीय स्कूलों और कॉलेजों की स्थापना (जैसे जामिया मिलिया इस्लामिया, काशी विद्यापीठ)।
      • स्वदेशी वस्तुओं, विशेषकर खादी और हथकरघा को बढ़ावा देना।
      • अस्पृश्यता का उन्मूलन और हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देना।
      • पंचायतों की स्थापना।
      • चरखा और खादी का प्रचार।

3. आंदोलन का प्रसार और जन भागीदारी (Spread and Mass Participation)

असहयोग आंदोलन ने समाज के सभी वर्गों को एकजुट किया और एक अभूतपूर्व जन भागीदारी देखी गई।

  • छात्रों की भागीदारी: हजारों छात्रों ने सरकारी स्कूलों और कॉलेजों को छोड़ दिया और राष्ट्रीय संस्थानों में शामिल हो गए।
  • वकीलों का त्याग: मोतीलाल नेहरू, सी.आर. दास, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, राजेंद्र प्रसाद, आसफ अली जैसे कई प्रमुख वकीलों ने अपनी वकालत छोड़ दी।
  • महिलाओं की भूमिका: महिलाओं ने शराब की दुकानों और विदेशी कपड़ों की दुकानों पर धरना दिया और आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया।
  • किसानों और मजदूरों की भागीदारी: विभिन्न क्षेत्रों में किसान और मजदूर आंदोलन में शामिल हुए, अक्सर स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ते हुए।
  • हिंदू-मुस्लिम एकता: खिलाफत आंदोलन के साथ असहयोग आंदोलन के विलय ने हिंदू और मुसलमानों के बीच अभूतपूर्व एकता का प्रदर्शन किया।
  • विभिन्न क्षेत्रों में प्रसार: आंदोलन शहरों से निकलकर ग्रामीण क्षेत्रों तक फैल गया, जिसमें अवध किसान आंदोलन, मोपला विद्रोह (केरल) और आंध्र प्रदेश में वन सत्याग्रह जैसे स्थानीय आंदोलन शामिल थे।
  • स्वदेशी और खादी का प्रचार: खादी राष्ट्रीय आंदोलन का प्रतीक बन गई और स्वदेशी वस्तुओं की बिक्री में वृद्धि हुई।

4. आंदोलन की समाप्ति (Withdrawal of the Movement)

चौरी-चौरा की घटना के कारण गांधीजी ने असहयोग आंदोलन को अचानक समाप्त करने का निर्णय लिया।

  • चौरी-चौरा की घटना (फरवरी 1922):
    • 5 फरवरी, 1922 को, उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा नामक स्थान पर, एक हिंसक भीड़ ने एक पुलिस थाने में आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मी मारे गए।
    • यह घटना तब हुई जब पुलिस ने असहयोग आंदोलन के एक शांतिपूर्ण जुलूस पर गोलीबारी की थी।
  • गांधीजी का निर्णय:
    • गांधीजी, जो अहिंसा के कट्टर समर्थक थे, इस घटना से बहुत दुखी हुए। उन्हें लगा कि आंदोलन हिंसक होता जा रहा है और जनता अभी तक सत्याग्रह के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं है।
    • 12 फरवरी, 1922 को, गांधीजी ने असहयोग आंदोलन को तत्काल समाप्त करने की घोषणा की।
  • प्रतिक्रिया: गांधीजी के इस निर्णय से कई नेता (जैसे मोतीलाल नेहरू, सी.आर. दास, सुभाष चंद्र बोस) निराश हुए, क्योंकि उन्हें लगा कि आंदोलन अपनी चरम सीमा पर था।

5. आंदोलन का महत्व और परिणाम (Significance and Consequences of the Movement)

असहयोग आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर गहरा और स्थायी प्रभाव डाला।

  • जन आंदोलन का उदय: यह भारत का पहला अखिल भारतीय जन आंदोलन था, जिसने स्वतंत्रता संग्राम को शिक्षित वर्ग से निकालकर आम जनता तक पहुँचाया।
  • गांधीजी का नेतृत्व स्थापित: इसने महात्मा गांधी को एक अविवादित राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित किया।
  • ब्रिटिश शासन की नींव हिलाई: आंदोलन ने ब्रिटिश प्रशासन को हिला दिया और ब्रिटिश सरकार को यह एहसास कराया कि भारत पर शासन करना अब आसान नहीं होगा।
  • आत्म-विश्वास और आत्म-निर्भरता: इसने भारतीयों में आत्म-विश्वास और आत्म-निर्भरता की भावना जगाई।
  • हिंदू-मुस्लिम एकता: खिलाफत आंदोलन के साथ इसके विलय ने अल्पकालिक लेकिन मजबूत हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रदर्शन किया।
  • स्वदेशी और खादी का प्रचार: इसने स्वदेशी उद्योगों और खादी को बढ़ावा दिया, जिससे आर्थिक राष्ट्रवाद को बल मिला।
  • भविष्य के आंदोलनों के लिए नींव: इसने सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन जैसे भविष्य के बड़े आंदोलनों के लिए एक मजबूत नींव तैयार की।

6. निष्कर्ष (Conclusion)

असहयोग आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक युगांतरकारी घटना थी, जिसने महात्मा गांधी के नेतृत्व में ब्रिटिश शासन के खिलाफ पहली बार एक संगठित और अखिल भारतीय जन प्रतिरोध देखा। रॉलेट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड और खिलाफत आंदोलन जैसे कारणों से प्रेरित होकर, इस आंदोलन ने ब्रिटिश संस्थाओं का बहिष्कार किया और स्वदेशी तथा राष्ट्रीय शिक्षा को बढ़ावा दिया। यद्यपि चौरी-चौरा की घटना के कारण इसे अचानक समाप्त कर दिया गया, असहयोग आंदोलन ने भारतीयों में आत्म-विश्वास जगाया, गांधीजी को एक राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित किया, और भविष्य के बड़े आंदोलनों के लिए एक मजबूत नींव तैयार की। यह भारतीय राष्ट्रवाद के विकास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बना रहेगा।

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