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प्रतिहार ( Pratiharas)

हर्षवर्धन के साम्राज्य के विघटन और पाल वंश के उदय के साथ ही, पश्चिमी भारत में एक और महत्वपूर्ण शक्ति का उदय हुआ – गुर्जर-प्रतिहार वंश। इन्होंने लगभग 8वीं शताब्दी ईस्वी से 11वीं शताब्दी ईस्वी तक उत्तरी भारत के एक बड़े हिस्से पर शासन किया। प्रतिहारों ने कन्नौज पर नियंत्रण के लिए पाल और राष्ट्रकूटों के साथ त्रिपक्षीय संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अरब आक्रमणकारियों के खिलाफ भारत के ‘द्वारपाल’ के रूप में कार्य किया।

1. उद्भव और प्रमुख शासक (Origin and Prominent Rulers)

  • क्षेत्र: मुख्य रूप से राजस्थान और मध्य भारत, बाद में विस्तार कर कन्नौज को भी शामिल किया।
  • राजधानी: प्रारंभिक राजधानी अवन्ति (उज्जैन) थी, जिसे बाद में कन्नौज में स्थानांतरित कर दिया गया।
  • संस्थापक: नागभट्ट प्रथम (लगभग 730-756 ईस्वी)।
    • ग्वालियर प्रशस्ति के अनुसार, उसने अरब आक्रमणकारियों की विशाल सेना को नष्ट किया।
    • कुछ स्रोतों के अनुसार, हरिश्चंद्र को इस वंश का प्रारंभिक संस्थापक माना जाता है।
  • प्रमुख शासक:
    • वत्सराज (लगभग 775-800 ईस्वी):
      • प्रतिहार साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
      • उसने कन्नौज पर अधिकार करने के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लिया और पाल शासक धर्मपाल को पराजित किया, लेकिन राष्ट्रकूट शासक ध्रुव से पराजित हुआ।
    • नागभट्ट द्वितीय (लगभग 800-833 ईस्वी):
      • वत्सराज का पुत्र।
      • उसने कन्नौज पर पुनः अधिकार किया और पाल शासक धर्मपाल को पराजित किया।
      • उसने सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया, जिसे 725 ईस्वी में अरब सेनाओं ने नष्ट कर दिया था।
    • मिहिरभोज (भोज प्रथम) (लगभग 836-885 ईस्वी):
      • गुर्जर-प्रतिहार वंश का सबसे महान और शक्तिशाली शासक।
      • उपाधियाँ: ‘आदिवराह’ और ‘प्रभास’।
      • उसने अपने साम्राज्य का व्यापक विस्तार किया, जिसमें गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश के अधिकांश हिस्से शामिल थे।
      • उसने पालों और राष्ट्रकूटों के साथ संघर्ष जारी रखा।
      • उसके शासनकाल में अरब यात्री सुलेमान भारत आया, जिसने प्रतिहारों की सैन्य शक्ति की प्रशंसा की।
    • महेन्द्रपाल प्रथम (लगभग 885-910 ईस्वी):
      • मिहिरभोज का पुत्र।
      • उसने अपने साम्राज्य की सीमाओं को बनाए रखा और कुछ क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की।
      • उसके दरबार में प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान राजशेखर रहते थे।
    • महिपाल प्रथम (लगभग 912-944 ईस्वी):
      • उसके शासनकाल में राष्ट्रकूट शासक इंद्र तृतीय ने कन्नौज पर आक्रमण किया और उसे लूटा।

2. प्रशासन (Administration)

प्रतिहार प्रशासन राजतंत्रात्मक था, जिसमें राजा सर्वोच्च होता था, लेकिन सामंती व्यवस्था भी प्रचलित थी।

  • राजा: राजा ‘महाराजाधिराज’, ‘परमभट्टारक’ जैसी उपाधियाँ धारण करते थे।
  • केंद्रीय प्रशासन: राजा को मंत्रियों और अधिकारियों की एक परिषद द्वारा सहायता प्रदान की जाती थी, जो राजस्व संग्रह, न्याय प्रशासन और सैन्य मामलों के लिए जिम्मेदार थे।
  • प्रांतीय प्रशासन: साम्राज्य को ‘भुक्ति’ (प्रांत), ‘विषय’ (जिले) और ‘ग्राम’ (गाँव) में विभाजित किया गया था।
  • सैन्य: प्रतिहारों के पास एक शक्तिशाली घुड़सवार सेना थी, और वे मध्य एशियाई और अरब घोड़ों का आयात करते थे। उन्हें भारत के ‘द्वारपाल’ के रूप में जाना जाता था क्योंकि उन्होंने अरब आक्रमणों से भारत की रक्षा की।
  • राजस्व: भूमि राजस्व राज्य की आय का मुख्य स्रोत था।

3. कला और स्थापत्य (Art and Architecture)

प्रतिहार काल में मंदिर स्थापत्य और मूर्तिकला का विकास हुआ, जिसमें गुप्तकालीन कला की विशेषताओं का प्रभाव देखा जा सकता है।

  • मंदिर स्थापत्य:
    • इन्होंने नागर शैली के मंदिरों का निर्माण करवाया।
    • उदाहरण:
      • ग्वालियर किले में स्थित तेली का मंदिर (मिहिरभोज द्वारा निर्मित)।
      • ओसियां (राजस्थान) में सूर्य मंदिर और अन्य मंदिर।
      • बरौली (राजस्थान) में घाटेश्वर महादेव मंदिर परिसर।
      • मोढेरा (गुजरात) का सूर्य मंदिर (हालांकि कुछ हद तक सोलंकी प्रभाव भी है)।
  • मूर्तिकला:
    • प्रतिमाओं में प्रसन्नता का भाव और गुप्तकालीन कला की सूक्ष्मता दिखाई देती है।
    • धातु और पत्थर, विशेषकर काले और भूरे रंग के पाषाण का उपयोग किया गया।
    • जैन धर्म से संबंधित गुफा स्मारकों और मूर्तियों को भी संरक्षण मिला (जैसे ग्वालियर किले के अंदर सिद्धांचल गुफाएँ)।

4. साहित्य और धर्म (Literature and Religion)

प्रतिहार शासकों ने संस्कृत साहित्य को संरक्षण दिया।

  • साहित्य:
    • राजशेखर: महेन्द्रपाल प्रथम का दरबारी कवि।
      • प्रमुख कृतियाँ: ‘काव्यमीमांसा’, ‘कर्पूरमंजरी’ (प्राकृत नाटक), ‘बाल रामायण’, ‘बाल भारत’।
    • वत्सराज के काल में संस्कृत भाषा में ‘बली प्रबंध’ नामक लेख की रचना हुई, जिसमें सती प्रथा की जानकारी मिलती है।
  • धर्म:
    • प्रतिहार शासक मुख्य रूप से ब्राह्मणवादी धर्म (हिंदू धर्म) के अनुयायी थे, विशेषकर वैष्णव संप्रदाय के (मिहिरभोज ‘आदिवराह’ की उपाधि से)।
    • उन्होंने जैन धर्म को भी संरक्षण दिया (जैसे ओसियां में महावीर स्वामी का मंदिर)।
    • धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई गई।

5. पतन (Decline)

प्रतिहार वंश का पतन 10वीं शताब्दी ईस्वी के अंत तक शुरू हो गया था।

  • त्रिपक्षीय संघर्ष: पालों और राष्ट्रकूटों के साथ लगातार संघर्षों ने प्रतिहार शक्ति को कमजोर किया। विशेषकर राष्ट्रकूट शासक इंद्र तृतीय के आक्रमणों ने उन्हें भारी नुकसान पहुंचाया।
  • आंतरिक कमजोरियाँ और सामंतों का उदय: कमजोर उत्तराधिकारियों और सामंतों की बढ़ती शक्ति ने केंद्रीय सत्ता को कमजोर कर दिया।
  • क्षेत्रीय शक्तियों का उदय: 10वीं शताब्दी के मध्य तक, प्रतिहारों ने राजस्थान पर अपना नियंत्रण अपने सामंतों (जैसे चौहान, चंदेल, परमार) के हाथों खो दिया, जिन्होंने अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी।
  • तुर्की आक्रमण:
    • 11वीं शताब्दी की शुरुआत में महमूद गजनवी के आक्रमणों ने प्रतिहार साम्राज्य को और कमजोर कर दिया।
    • 1018 ईस्वी में महमूद गजनवी ने कमजोर प्रतिहार शासक राज्यपाल को हराकर अपने अधीन कर लिया।
    • इस वंश का अंतिम शासक यशपाल (1036 ईस्वी) था।

6. निष्कर्ष (Conclusion)

गुर्जर-प्रतिहार वंश प्रारंभिक मध्यकालीन भारत में एक महत्वपूर्ण शक्ति था, जिसने उत्तरी भारत में राजनीतिक स्थिरता प्रदान की और लगभग तीन शताब्दियों तक अरब आक्रमणकारियों से देश की रक्षा की। कन्नौज पर नियंत्रण के लिए उनका संघर्ष और कला-साहित्य में उनका योगदान उल्लेखनीय है। हालांकि, आंतरिक कमजोरियों और लगातार बाहरी आक्रमणों के कारण अंततः उनका पतन हो गया, जिससे उत्तर भारत में नए क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ।

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