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पशुपालन (Animal Husbandry)

उत्तराखंड में पशुपालन (UPSC/PCS केंद्रित नोट्स)

उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था में कृषि के साथ-साथ पशुपालन का भी महत्वपूर्ण स्थान है। यह न केवल ग्रामीण परिवारों की आय का एक प्रमुख स्रोत है, बल्कि पोषण सुरक्षा, जैविक खाद की उपलब्धता और परंपरागत कृषि प्रणालियों को बनाए रखने में भी सहायक है। राज्य की विविध भौगोलिक परिस्थितियाँ विभिन्न प्रकार के पशुधन के पालन के लिए अवसर प्रदान करती हैं।

उत्तराखंड में पशुपालन: एक सिंहावलोकन

कुछ त्वरित तथ्य (Quick Facts):
  • उत्तराखंड में पशुपालन मुख्यतः मिश्रित कृषि प्रणाली का एक अभिन्न अंग है।
  • प्रमुख पालतू पशुओं में गाय, भैंस, बकरी, भेड़, घोड़े, खच्चर और मुर्गीपालन शामिल हैं।
  • राज्य में डेयरी विकास, ऊन उत्पादन, मांस उत्पादन और मत्स्य पालन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
  • उत्तराखंड पशुधन विकास बोर्ड (ULDB) और पशुपालन विभाग राज्य में पशुधन विकास के लिए प्रमुख एजेंसियां हैं।
  • पर्वतीय क्षेत्रों में ऋतु-प्रवास (Transhumance) करने वाले पशुपालक (जैसे भोटिया जनजाति) भी पाए जाते हैं।
  • राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में पशुपालन का योगदान लगभग 3% है। (आंकड़े भिन्न हो सकते हैं)

1. प्रमुख पशुधन एवं उनका वितरण

क. गौवंशीय पशु (Cattle)

  • गाय:
    • राज्य में गायों का पालन दूध, गोबर (जैविक खाद) और कृषि कार्यों (बैल) के लिए किया जाता है।
    • पर्वतीय क्षेत्रों में स्थानीय नस्लें (जैसे बद्री गाय – उत्तराखंड की पहली पंजीकृत पशुधन नस्ल) अधिक पाई जाती हैं जो कठोर परिस्थितियों के अनुकूल होती हैं।
    • मैदानी क्षेत्रों में साहीवाल, हरियाणवी, जर्सी, होल्स्टीन फ्रीजियन जैसी उन्नत नस्लों का पालन बढ़ा है।
    • प्रमुख जिले: हरिद्वार, ऊधम सिंह नगर, देहरादून, नैनीताल।
  • भैंस (Buffalo):
    • मुख्यतः दूध उत्पादन के लिए पाली जाती हैं।
    • मुर्रा नस्ल की भैंसें अधिक लोकप्रिय हैं।
    • प्रमुख जिले: ऊधम सिंह नगर, हरिद्वार, देहरादून (मैदानी भाग), नैनीताल (तराई)।

ख. भेड़ एवं बकरी पालन (Sheep and Goat Rearing)

  • भेड़:
    • मुख्यतः ऊन और मांस के लिए पाली जाती हैं।
    • पर्वतीय और उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में भेड़ पालन अधिक प्रचलित है।
    • स्थानीय नस्लों के साथ-साथ मेरिनो, रैम्बुले जैसी विदेशी नस्लों से संकरण द्वारा ऊन की गुणवत्ता सुधारने के प्रयास किए जा रहे हैं।
    • प्रमुख जिले: पिथौरागढ़, चमोली, उत्तरकाशी, बागेश्वर।
    • ऋतु-प्रवासी पशुपालक (जैसे भोटिया) बड़े झुंडों में भेड़ पालते हैं।
  • बकरी:
    • दूध और मांस दोनों के लिए पाली जाती हैं। ये कम संसाधनों में भी पाली जा सकती हैं।
    • पर्वतीय और मैदानी दोनों क्षेत्रों में बकरी पालन होता है।
    • प्रमुख नस्लें: स्थानीय नस्लों के अतिरिक्त बरबरी, जमुनापारी।

ग. अश्ववर्गीय पशु (Equines)

  • घोड़े एवं खच्चर:
    • पर्वतीय क्षेत्रों में भार वहन और परिवहन के लिए इनका महत्वपूर्ण स्थान है, विशेषकर दुर्गम पर्यटन और तीर्थ स्थलों पर।
    • चमोली, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़, रुद्रप्रयाग जिलों में इनकी उपयोगिता अधिक है।

घ. सूकर पालन (Piggery)

  • राज्य के कुछ क्षेत्रों में, विशेषकर तराई और कुछ जनजातीय समुदायों में, मांस उत्पादन के लिए सूकर पालन किया जाता है।

ङ. कुक्कुट पालन (Poultry Farming)

  • अंडे और मांस की बढ़ती मांग को देखते हुए व्यावसायिक कुक्कुट पालन में वृद्धि हुई है।
  • मैदानी और अर्ध-पर्वतीय क्षेत्रों में यह अधिक प्रचलित है।
  • सरकारी योजनाओं के तहत छोटे किसानों को भी कुक्कुट पालन के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।

2. पशुधन उत्पाद एवं संबंधित उद्योग

क. दुग्ध उत्पादन एवं डेयरी विकास

  • राज्य में दुग्ध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए उत्तराखंड सहकारी डेयरी फेडरेशन लिमिटेड (UCDF) कार्यरत है, जो “आँचल” ब्रांड नाम से दुग्ध और दुग्ध उत्पादों का विपणन करता है।
  • प्रमुख दुग्धशालाएँ (Dairy Plants): देहरादून, हरिद्वार, ऊधम सिंह नगर, हल्द्वानी।
  • राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रम और राज्य सरकार की योजनाओं के माध्यम से नस्ल सुधार, पशु स्वास्थ्य और विपणन सुविधाओं को बेहतर बनाया जा रहा है।
  • गंगा गाय महिला डेयरी योजना जैसी पहलें महिला सशक्तिकरण और डेयरी विकास को जोड़ती हैं।

ख. ऊन उत्पादन

  • उत्तराखंड में भेड़ पालन से प्राप्त ऊन का उपयोग पारंपरिक ऊनी वस्त्र (जैसे शॉल, पंखी, थुलमा, दन) बनाने में किया जाता है।
  • भेड़ एवं ऊन विकास बोर्ड ऊन की गुणवत्ता सुधारने और विपणन में सहायता करता है।
  • मुनस्यारी (पिथौरागढ़) उच्च गुणवत्ता वाले ऊनी उत्पादों के लिए प्रसिद्ध है।

ग. मांस उत्पादन

  • बकरी, भेड़, सूकर और कुक्कुट मांस के प्रमुख स्रोत हैं।
  • आधुनिक बूचड़खानों और मांस प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना पर जोर दिया जा रहा है।

3. मत्स्य पालन (Fisheries)

  • उत्तराखंड में नदियों, झीलों और तालाबों में मत्स्य पालन की अच्छी संभावनाएँ हैं।
  • प्रमुख मत्स्य प्रजातियाँ:
    • ट्राउट (Trout): ठंडे पानी की यह मछली पर्वतीय नदियों और विशेष रूप से बनाए गए तालाबों में पाली जाती है। चमोली, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ ट्राउट पालन के लिए जाने जाते हैं।
    • महसीर (Mahseer): राज्य की प्रमुख खेल मछली।
    • अन्य: कार्प (रोहू, कतला, मृगल), कॉमन कार्प, ग्रास कार्प आदि।
  • मत्स्य विभाग द्वारा मत्स्य बीज उत्पादन, प्रशिक्षण और विपणन में सहायता प्रदान की जाती है।
  • एक्वाकल्चर (Aquaculture) और सजावटी मछली पालन (Ornamental Fisheries) को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।
  • राज्य में 2003 में मत्स्य नीति लागू की गई थी।

4. पशुधन विकास हेतु सरकारी प्रयास एवं योजनाएँ

  • उत्तराखंड पशुधन विकास बोर्ड (ULDB): नस्ल सुधार, कृत्रिम गर्भाधान, पशु स्वास्थ्य और चारा विकास के लिए कार्यरत।
  • पशुपालन विभाग: पशु चिकित्सा सेवाएँ, टीकाकरण, रोग नियंत्रण और विभिन्न विकास योजनाओं का क्रियान्वयन।
  • नस्ल सुधार कार्यक्रम: कृत्रिम गर्भाधान (AI) और भ्रूण प्रत्यारोपण (Embryo Transfer) तकनीक का उपयोग। पशुलोक (ऋषिकेश) में अतिहिमीकृत वीर्य उत्पादन केंद्र।
  • पशु स्वास्थ्य सेवाएँ: पशु चिकित्सालयों और सचल पशु चिकित्सा इकाइयों का नेटवर्क। राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम।
  • चारा विकास योजनाएँ: चारागाह विकास, साइलेज निर्माण और संतुलित पशु आहार को बढ़ावा।
  • राष्ट्रीय गोकुल मिशन: देशी गौवंशीय नस्लों के संरक्षण और विकास के लिए।
  • पशुधन बीमा योजना: पशुपालकों को पशुओं की मृत्यु से होने वाले आर्थिक नुकसान से सुरक्षा।
  • समन्वित डेयरी विकास परियोजना और गंगा गाय महिला डेयरी योजना।
  • राज्य में 1992 से पशुओं की गणना का कार्य राजस्व विभाग द्वारा किया जा रहा है।

5. पशुपालन क्षेत्र की प्रमुख समस्याएँ

  • चारे की कमी: विशेषकर पर्वतीय क्षेत्रों में और शुष्क मौसम में हरे चारे की उपलब्धता एक बड़ी समस्या है। चारागाह भूमि में कमी आ रही है।
  • पशुओं की निम्न उत्पादकता: स्थानीय नस्लों की दूध और ऊन उत्पादन क्षमता कम होना।
  • पशु स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव: दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में पशु चिकित्सालयों और प्रशिक्षित कर्मियों की कमी।
  • नस्ल सुधार कार्यक्रमों की धीमी गति: कृत्रिम गर्भाधान सेवाओं की पहुँच सभी क्षेत्रों तक न होना।
  • विपणन सुविधाओं की कमी: दुग्ध, ऊन और अन्य पशुधन उत्पादों के लिए संगठित बाजार और उचित मूल्य का अभाव।
  • प्राकृतिक आपदाएँ: भूस्खलन, बाढ़ और अत्यधिक बर्फबारी से पशुधन को नुकसान।
  • पशुपालकों में जागरूकता और प्रशिक्षण की कमी: आधुनिक पशुपालन तकनीकों और सरकारी योजनाओं की जानकारी का अभाव।
  • ऋण सुविधाओं की कमी: पशु खरीदने और पशुशाला निर्माण के लिए आसान ऋण उपलब्ध न होना।

निष्कर्ष (Conclusion)

उत्तराखंड में पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आजीविका का एक महत्वपूर्ण आधार है। इस क्षेत्र में विद्यमान चुनौतियों का समाधान करके और आधुनिक तकनीकों तथा सरकारी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन करके पशुधन उत्पादकता में वृद्धि की जा सकती है। इससे न केवल पशुपालकों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी, बल्कि राज्य की समग्र अर्थव्यवस्था को भी बल मिलेगा। डेयरी विकास, ऊन उद्योग और मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों में विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

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