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बादल फटना (Cloud Bursts)

1. परिचय (Introduction)

बादल फटना (Cloud Burst) एक मौसम संबंधी घटना है जिसमें एक छोटे से भौगोलिक क्षेत्र (लगभग 20-30 वर्ग किमी) में बहुत कम समय में (आमतौर पर एक घंटे से भी कम) अत्यधिक भारी वर्षा होती है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, जब किसी क्षेत्र में 100 मिमी प्रति घंटे से अधिक वर्षा होती है, तो उसे बादल फटना माना जाता है। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में, यह घटना अचानक बाढ़ और भूस्खलन के कारण अक्सर विनाशकारी साबित होती है।

2. बादल फटने की क्रियाविधि और उत्तराखंड में इसके कारण

A. क्रियाविधि (Mechanism)

बादल फटने की घटना तब होती है जब गर्म, नम हवा का एक पिंड तेजी से ऊपर उठता है और तेजी से ठंडा होता है। इससे जलवाष्प का तीव्र संघनन (Rapid Condensation) होता है, जिससे बहुत बड़ी और भारी पानी की बूंदें बनती हैं। बादल का अपड्राफ्ट (Updraft) – हवा का ऊपर की ओर प्रवाह – इन भारी बूंदों को रोक नहीं पाता है, और वे एक साथ एक छोटे से क्षेत्र में मूसलाधार बारिश के रूप में गिर जाती हैं।

B. उत्तराखंड में प्रमुख कारण (Major Causes in Uttarakhand)

  • पर्वत-कृत वर्षा (Orographic Lift): यह उत्तराखंड में बादल फटने का सबसे प्रमुख कारण है। जब मानसून की नम हवाएं हिमालय की ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं से टकराती हैं, तो उन्हें तेजी से ऊपर उठने के लिए मजबूर होना पड़ता है। तेजी से ऊपर उठने के कारण हवा ठंडी होती है और भारी वर्षा होती है।
  • संकीर्ण घाटियाँ: राज्य की संकीर्ण और खड़ी घाटियाँ हवा को एक सीमित क्षेत्र में केंद्रित करती हैं, जिससे उसके ऊपर उठने की गति और भी तेज हो जाती है।
  • जलवायु परिवर्तन: वैश्विक तापन के कारण, वायुमंडल अधिक नमी धारण कर सकता है, जिससे अत्यधिक वर्षा की घटनाओं की तीव्रता और आवृत्ति बढ़ रही है।

3. उत्तराखंड के प्रमुख प्रभावित क्षेत्र (Major Affected Areas in Uttarakhand)

हालांकि बादल फटना राज्य में कहीं भी हो सकता है, कुछ जिले अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण अधिक संवेदनशील हैं।

  • पिथौरागढ़ जिला
  • चमोली जिला
  • रुद्रप्रयाग जिला (केदारनाथ घाटी)
  • उत्तरकाशी जिला
  • बागेश्वर जिला

4. प्रभाव और खतरे (Impacts and Hazards)

  • अचानक बाढ़ (Flash Floods): बादल फटने से नदियों और नालों में जल स्तर अचानक और विनाशकारी रूप से बढ़ जाता है, जो अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को बहा ले जाता है।
  • भूस्खलन और मलबा प्रवाह (Landslides and Debris Flows): तीव्र वर्षा पहाड़ी ढलानों पर मिट्टी को संतृप्त कर देती है, जिससे बड़े पैमाने पर भूस्खलन होता है। यह मलबा पानी के साथ मिलकर एक घातक कीचड़ का प्रवाह बनाता है।
  • बुनियादी ढांचे का विनाश: अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन सड़कों, पुलों, इमारतों और जलविद्युत परियोजनाओं को नष्ट कर देते हैं, जिससे प्रभावित क्षेत्र बाकी दुनिया से कट जाता है।
  • जान-माल की हानि: ये घटनाएँ अक्सर बड़ी संख्या में मानव जीवन और पशुधन की हानि का कारण बनती हैं।

5. प्रमुख घटना: 2013 की केदारनाथ आपदा

  • जून 2013 में, केदारनाथ मंदिर के ऊपर चोराबारी ग्लेशियर के पास बादल फटने और अत्यधिक वर्षा की एक श्रृंखला हुई।
  • इसके कारण चोराबारी झील (गांधी सरोवर) टूट गई और मंदाकिनी नदी में एक विनाशकारी अचानक बाढ़ आ गई।
  • इस आपदा ने केदारनाथ शहर और रामबाड़ा जैसे कई बस्तियों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया, जिससे हजारों तीर्थयात्रियों और स्थानीय निवासियों की मृत्यु हो गई। यह उत्तराखंड के इतिहास की सबसे विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं में से एक है।

6. प्रबंधन और शमन उपाय (Management and Mitigation)

  • प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली: डॉप्लर रडार (Doppler Radars) (जैसे मुक्तेश्वर में) और स्वचालित मौसम स्टेशनों (AWS) का एक नेटवर्क स्थापित करना ताकि अल्पकालिक, तीव्र वर्षा का पूर्वानुमान लगाया जा सके।
  • गैर-संरचनात्मक उपाय:
    • खतरा क्षेत्र मानचित्रण (Hazard Zone Mapping) करके नदी के किनारों और भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों में निर्माण को प्रतिबंधित करना।
    • वृक्षारोपण को बढ़ावा देना ताकि मिट्टी की जल धारण क्षमता बढ़ाई जा सके।
  • संरचनात्मक उपाय: छोटे चेक डैम बनाना, ढलानों को स्थिर करने के लिए रिटेनिंग वॉल का निर्माण करना, और उचित जल निकासी सुनिश्चित करना।
  • सामुदायिक जागरूकता: स्थानीय समुदायों को खतरों के बारे में शिक्षित करना और उन्हें आपदा की स्थिति में क्या करना है, इसके लिए प्रशिक्षित करना।
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