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निर्वनीकरण (Deforestation)

1. परिचय (Introduction)

वनों की कटाई (Deforestation) का अर्थ है स्थायी रूप से वनों को हटाकर उस भूमि का अन्य उपयोगों, जैसे कृषि या शहरी विकास, के लिए उपयोग करना। उत्तराखंड एक हिमालयी राज्य है, जहाँ वन न केवल जैव विविधता और अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि वे भूस्खलन और मृदा अपरदन को रोकने तथा जल स्रोतों को बनाए रखने के लिए भी अनिवार्य हैं। इसलिए, यहाँ वनों की कटाई के परिणाम मैदानी क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक गंभीर होते हैं।

2. उत्तराखंड में वनों की कटाई के कारण (Causes of Deforestation in Uttarakhand)

A. मानवजनित कारण (Anthropogenic Causes)

  • बुनियादी ढांचे का विकास: सड़कों (जैसे चार धाम परियोजना), बांधों (जैसे टिहरी बांध), और जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर वनों को काटा गया है।
  • शहरीकरण और पर्यटन: बढ़ते शहरों और पर्यटन के दबाव के कारण होटलों, रिसॉर्ट्स और आवासों के निर्माण के लिए वन भूमि पर अतिक्रमण हुआ है।
  • अवैध कटान: लकड़ी माफिया द्वारा मूल्यवान लकड़ी (जैसे देवदार, साल) का अवैध रूप से काटा जाना एक बड़ी समस्या है।
  • अत्यधिक चराई (Overgrazing): पशुओं द्वारा अत्यधिक चराई से छोटे पौधों और घास का आवरण नष्ट हो जाता है, जिससे नए पेड़ों का विकास बाधित होता है।
  • कृषि का विस्तार: जनसंख्या वृद्धि के कारण खेती के लिए वन भूमि को साफ किया जाता है।

B. प्राकृतिक कारण (Natural Causes)

  • वनाग्नि (Forest Fires): हर साल गर्मियों में, विशेष रूप से चीड़ (Pine) के जंगलों में, आग लगने से हजारों हेक्टेयर वन नष्ट हो जाते हैं। चीड़ की पत्तियां (पिरुल) अत्यधिक ज्वलनशील होती हैं।
  • भूस्खलन और भू-धंसाव: प्राकृतिक भूस्खलन भी वन आवरण को नष्ट कर सकते हैं।

3. वनों की कटाई के प्रभाव (Impacts of Deforestation)

  • मृदा अपरदन और भूस्खलन: पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बांधकर रखती हैं। वनों की कटाई से मिट्टी ढीली हो जाती है, जिससे भूस्खलन (Landslides) और मृदा अपरदन (Soil Erosion) का खतरा बढ़ जाता है।
  • जल स्रोतों का सूखना: वन जल-चक्र को विनियमित करते हैं और भूमिगत जल को रिचार्ज करते हैं। वनों की कटाई से प्राकृतिक जल स्रोत (Springs) सूख रहे हैं, जिससे पहाड़ी गांवों में पीने के पानी का संकट पैदा हो रहा है।
  • जैव विविधता का क्षरण: वनों के नष्ट होने से वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो जाते हैं, जिससे उनकी संख्या में कमी आती है।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष में वृद्धि: जब जानवरों के आवास और भोजन के स्रोत नष्ट हो जाते हैं, तो वे भोजन की तलाश में मानव बस्तियों में प्रवेश करते हैं, जिससे संघर्ष बढ़ता है।
  • बाढ़ का बढ़ता खतरा: वन वर्षा के पानी के प्रवाह को धीमा करते हैं। उनके अभाव में, पानी तेजी से बहकर नदियों में पहुँचता है, जिससे मैदानी इलाकों में बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।

4. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: चिपको आंदोलन (Historical Context: The Chipko Movement)

  • उत्पत्ति: चिपको आंदोलन 1973 में वर्तमान उत्तराखंड के चमोली जिले के रैणी गाँव से शुरू हुआ एक अहिंसक, गांधीवादी आंदोलन था।
  • क्रियाविधि: जब ठेकेदार पेड़ों को काटने आए, तो गौरा देवी के नेतृत्व में स्थानीय ग्रामीण महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर (उन्हें गले लगाकर) उनकी रक्षा की।
  • प्रमुख नेता: सुंदरलाल बहुगुणा और चंडी प्रसाद भट्ट इस आंदोलन के प्रमुख नेता थे, जिन्होंने इसे वैश्विक पहचान दिलाई। सुंदरलाल बहुगुणा का नारा “पारिस्थितिकी स्थायी अर्थव्यवस्था है” (Ecology is the permanent economy) बहुत प्रसिद्ध हुआ।
  • महत्व: यह भारत का एक प्रमुख पर्यावरण आंदोलन था जिसने वन संरक्षण के प्रति राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता पैदा की।

5. वन संरक्षण के प्रयास और प्रबंधन (Forest Conservation Efforts and Management)

  • वन पंचायतें (Van Panchayats): उत्तराखंड में सामुदायिक वन प्रबंधन की एक अनूठी और पारंपरिक प्रणाली है, जहाँ स्थानीय समुदाय अपने आसपास के जंगलों का प्रबंधन और संरक्षण करते हैं।
  • संयुक्त वन प्रबंधन (Joint Forest Management – JFM): यह एक सरकारी कार्यक्रम है जिसमें वन विभाग और स्थानीय समुदाय मिलकर वनों का प्रबंधन करते हैं।
  • कैम्पा (CAMPA – Compensatory Afforestation Fund Management and Planning Authority): जब भी किसी विकास परियोजना के लिए वन भूमि का उपयोग किया जाता है, तो परियोजना प्रस्तावक को प्रतिपूरक वनीकरण के लिए धन जमा करना होता है, जिसका उपयोग नए वन लगाने के लिए किया जाता है।
  • इको-टूरिज्म को बढ़ावा: पर्यटन को इस तरह से बढ़ावा देना जो पर्यावरण को नुकसान न पहुँचाए और स्थानीय समुदायों को लाभान्वित करे।
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