1. बाढ़: परिभाषा एवं प्रकार
बाढ़ एक ऐसी प्राकृतिक घटना है जिसमें जल अपने सामान्य प्रवाह मार्ग या तटबंधों को पार कर शुष्क भूमि को जलमग्न कर देता है। उत्तराखंड, अपनी पर्वतीय स्थलाकृति और मानसूनी जलवायु के कारण, नदीय बाढ़ (Riverine Floods) और आकस्मिक बाढ़ (Flash Floods) के प्रति अत्यंत संवेदनशील है।
उत्तराखंड में बाढ़ के प्रमुख प्रकार:
- नदीय बाढ़ (Riverine Floods): यह तब आती है जब लंबे समय तक भारी वर्षा से नदियों में जल की मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है।
- आकस्मिक बाढ़ (Flash Floods): यह बहुत कम समय में अत्यधिक तीव्र वर्षा (जैसे बादल फटने से) या किसी प्राकृतिक बांध के अचानक टूटने से उत्पन्न होती है। यह अत्यंत तीव्र और विनाशकारी होती है।
- हिमनदीय झील के फटने से बाढ़ (GLOF – Glacial Lake Outburst Flood): हिमनदों के पिघलने से बनी झीलों के अस्थिर प्राकृतिक बांधों के टूटने से भारी मात्रा में जल और मलबा तेजी से नीचे की ओर बहता है।
2. उत्तराखंड में बाढ़ के कारण
A. प्राकृतिक कारण
- अत्यधिक मानसूनी वर्षा: जून से सितंबर के मध्य भारी और निरंतर वर्षा नदियों का जलस्तर बढ़ा देती है।
- बादल फटना: पर्वतीय क्षेत्रों में स्थानीयकृत तीव्र वर्षा (100 मिमी/घंटा से अधिक) से अचानक बाढ़ और भूस्खलन होते हैं।
- हिमनदों का पिघलना एवं GLOF: जलवायु परिवर्तन के कारण हिमनदों के तेजी से पिघलने से GLOF का खतरा उत्पन्न होता है।
- भूस्खलन द्वारा नदी मार्ग में अवरोध: भूस्खलन से नदियों का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है, जिससे अस्थायी झीलें बनती हैं, जिनके टूटने से अचानक बाढ़ आती है।
B. मानवजनित कारण
- वनों की कटाई: वनों के विनाश से मृदा अपरदन बढ़ता है और सतही अपवाह (runoff) तेज होता है।
- अवैज्ञानिक भूमि उपयोग: नदी तटों और बाढ़ संभावित क्षेत्रों में अतिक्रमण और निर्माण गतिविधियाँ।
- अनियोजित अवसंरचना: सड़कों और बांधों का अवैज्ञानिक निर्माण प्राकृतिक जल निकासी प्रणालियों को बाधित करता है।
3. बाढ़ के दुष्प्रभाव (उत्तराखंड के संदर्भ में)
- जान-माल की हानि: आकस्मिक बाढ़ में यह खतरा अधिक होता है।
- आधारभूत संरचना को क्षति: सड़कें, पुल, संचार लाइनें, और जलविद्युत परियोजनाएं बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाती हैं।
- कृषि भूमि एवं फसलों का विनाश: उपजाऊ मिट्टी बह जाती है और खड़ी फसलें नष्ट हो जाती हैं।
- पर्यावरणीय क्षति: मृदा अपरदन, जैव विविधता की हानि, और जल स्रोतों का दूषित होना।
- स्वास्थ्य समस्याएँ: बाढ़ के बाद जलजनित बीमारियाँ (जैसे हैजा, टाइफाइड) फैलने का खतरा बढ़ जाता है।
4. प्रमुख बाढ़ प्रवण क्षेत्र एवं घटनाएँ
- संवेदनशील नदियाँ: गंगा, यमुना, अलकनंदा, मंदाकिनी, भागीरथी, पिंडर, काली (शारदा)।
- संवेदनशील जिले: चमोली, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़, बागेश्वर, टिहरी, पौड़ी, हरिद्वार।
- प्रमुख घटनाएँ:
- 2013 केदारनाथ आपदा: मंदाकिनी नदी में चौराबाड़ी ताल फटने और बादल फटने से आई प्रलयंकारी बाढ़।
- 2021 चमोली आपदा: ऋषिगंगा/धौलीगंगा घाटी में GLOF/हिमस्खलन के कारण आकस्मिक बाढ़।
5. बाढ़ प्रबंधन, न्यूनीकरण एवं तैयारी के उपाय
A. संरचनात्मक उपाय
- तटबंधों (Embankments) एवं बाढ़ दीवारों का निर्माण।
- चेक डैम एवं जलसंभर प्रबंधन संरचनाओं का निर्माण।
B. गैर-संरचनात्मक उपाय
- बाढ़ मैदान क्षेत्रीकरण (Flood Plain Zoning): संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण को प्रतिबंधित करना।
- प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early Warning System): डॉप्लर रडार, स्वचालित मौसम स्टेशन, और जल स्तर सेंसर का उपयोग कर समय पर चेतावनी जारी करना।
- वनीकरण एवं वाटरशेड विकास कार्यक्रम: जलग्रहण क्षेत्रों में व्यापक वृक्षारोपण।
- जन जागरूकता एवं सामुदायिक तैयारी: स्थानीय समुदायों को शिक्षित करना और मॉक ड्रिल का आयोजन।