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उत्तराखंड के प्रमुख वन आंदोलन

उत्तराखंड का इतिहास वन संरक्षण और स्थानीय समुदायों के वन अधिकारों के लिए हुए आंदोलनों से भरा पड़ा है। इन आंदोलनों ने न केवल राज्य की वन संपदा को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, बल्कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण चेतना को भी जागृत किया है।

उत्तराखंड के प्रमुख वन आंदोलन

कुछ त्वरित तथ्य (Quick Facts):
  • उत्तराखंड के वन आंदोलन स्थानीय निवासियों के जल, जंगल और जमीन पर पारंपरिक अधिकारों की रक्षा के लिए केंद्रित रहे हैं।
  • ब्रिटिश काल में वनों के व्यावसायिक दोहन और वन कानूनों ने स्थानीय लोगों के अधिकारों को सीमित कर दिया, जिससे असंतोष उत्पन्न हुआ।
  • चिपको आंदोलन विश्व प्रसिद्ध पर्यावरण संरक्षण आंदोलन बन गया।
  • इन आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।
  • वन पंचायतों का गठन इन आंदोलनों का एक महत्वपूर्ण परिणाम रहा है।

प्रारंभिक वन संघर्ष एवं नीतियाँ

ब्रिटिश शासन के दौरान, वनों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ने और व्यावसायिक कटाई के कारण स्थानीय लोगों में असंतोष व्याप्त था।

  • 1893: सभी बेनाप भूमि को संरक्षित वन घोषित किया गया।
  • 1903-04: कुंजणी वन आंदोलन (टिहरी रियासत) – राजस्व करों में वृद्धि और वन अधिकारों के हनन के विरुद्ध अमर सिंह के नेतृत्व में।
  • 1906-07: खास पट्टी वन आंदोलन (गढ़वाल क्षेत्र) – वन अधिकारों के लिए, इस आंदोलन में जनता ने वन अधिकारी सदानंद गैरोला को रस्सी में बांध दिया था।
  • 1911-1917: स्टिफी व नेल्सन द्वारा वन बंदोबस्त किया गया, जिससे स्थानीय लोगों के अधिकार और सीमित हुए।
  • 1916: कुमाऊँ संघ की स्थापना, वन समस्याओं के निराकरण हेतु, सचिव गोविन्द बल्लभ पंत।
  • 1921: फॉरेस्ट ग्रीवेन्स कमेटी का गठन (अध्यक्ष: पी. विंढम) – जनता के वन कष्टों को दूर करने हेतु। इसने 1926 में रिपोर्ट दी।
  • 1930-31: वन पंचायतों का गठन – फॉरेस्ट ग्रीवेन्स कमेटी की सिफारिश पर, मद्रास प्रेसीडेंसी के कम्युनिटी फॉरेस्ट के तर्ज पर। कैलाश गैरोला ने मद्रास का दौरा किया था। 1932 में चमोली में वन पंचायतों का गठन हुआ।
  • कवि गौर्दा ने “वृक्षन को विलाप” जैसी कविताओं से वन चेतना जगाई।
  • हर्षदेव ओली को ‘शक्ति’ पत्रिका में “काली कुमाऊँ का मुसोलिनी” कहा गया, संभवतः वन आंदोलन में उनकी भूमिका के कारण।

तिलाड़ी कांड / रंवाई वन आंदोलन (30 मई 1930)

यह आंदोलन टिहरी रियासत में रंवाई घाटी के किसानों द्वारा उनके पारंपरिक वन अधिकारों (जैसे- लकड़ी, चारागाह) की बहाली के लिए किया गया था।

  • पृष्ठभूमि: टिहरी रियासत द्वारा वन कानूनों को कड़ा करने और किसानों के अधिकारों को सीमित करने के विरोध में।
  • घटना: 30 मई 1930 को तिलाड़ी (बड़कोट के पास, यमुना तट पर) नामक स्थान पर शांतिपूर्ण सभा कर रहे आंदोलनकारियों पर रियासत के दीवान चक्रधर जुयाल के आदेश पर सैनिकों ने गोली चला दी, जिसमें सैकड़ों लोग शहीद हो गए।
  • परिणाम: इस घटना को “उत्तराखंड का जलियांवाला बाग” भी कहा जाता है। इसने रियासत के खिलाफ असंतोष को और बढ़ाया।

चिपको आंदोलन (1973-74)

यह विश्व प्रसिद्ध पर्यावरण संरक्षण आंदोलन था, जिसका मुख्य उद्देश्य पेड़ों की कटाई को रोकना था। इसकी शुरुआत चमोली जिले के रैणी गाँव से हुई।

  • पृष्ठभूमि: सरकार द्वारा बाहरी ठेकेदारों को वनों की कटाई का ठेका देना और स्थानीय लोगों को उनके पारंपरिक वनोपज अधिकारों से वंचित करना।
  • नेतृत्व: गौरा देवी के नेतृत्व में रैणी गाँव की महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर उन्हें कटने से बचाया। बाद में सुंदरलाल बहुगुणा और चंडी प्रसाद भट्ट ने इस आंदोलन को व्यापक रूप दिया।
  • नारा: “क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार। मिट्टी, पानी और बयार, जिंदा रहने के आधार।”
  • परिणाम: इस आंदोलन ने सरकार को वनों की कटाई पर पुनर्विचार करने और वन संरक्षण नीतियां बनाने के लिए मजबूर किया। इसने विश्व स्तर पर पर्यावरण चेतना को प्रेरित किया। 1981 में सुंदरलाल बहुगुणा को पद्मश्री (अस्वीकार किया) और 1982 में चंडी प्रसाद भट्ट को रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला।

डूंगी-पैंतोली आंदोलन (1980 का दशक)

यह आंदोलन चमोली जिले के डूंगी-पैंतोली गाँव में बांज (ओक) के जंगल को काटने के विरोध में हुआ था। सरकार ने महिलाओं के चारागाह और ईंधन की लकड़ी के पारंपरिक स्रोत, बांज के जंगल को काटकर उसके स्थान पर व्यावसायिक महत्व के चीड़ के पेड़ लगाने का निर्णय लिया था। महिलाओं ने इसका जोरदार विरोध किया और अंततः सरकार को अपना फैसला बदलना पड़ा।

पाणी राखो आंदोलन (1980 का दशक के अंत में)

यह आंदोलन पौड़ी गढ़वाल के उफरैंखाल क्षेत्र में पानी की कमी को दूर करने और जल संरक्षण के लिए शुरू हुआ था।

  • नेतृत्व: सच्चिदानंद भारती।
  • कार्य: युवाओं ने मिलकर छोटे-छोटे चाल-खाल (जल तलैया) बनाए, वृक्षारोपण किया और पारंपरिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित किया।
  • परिणाम: इस आंदोलन से क्षेत्र में जल स्तर में सुधार हुआ और यह जल संरक्षण का एक सफल मॉडल बना।

रक्षा सूत्र आंदोलन (1994)

यह आंदोलन टिहरी के भिलंगना नदी क्षेत्र में पेड़ों की कटाई को रोकने के लिए किया गया था।

  • नेतृत्व: सुरेश भाई।
  • कार्य: लोगों ने पेड़ों पर रक्षा सूत्र (पवित्र धागा) बांधकर उन्हें कटने से बचाने का संकल्प लिया, जो चिपको आंदोलन की भावना का प्रतीक था।

मैती आंदोलन (1995 से प्रारंभ)

यह एक अनूठा आंदोलन है जो पर्यावरण संरक्षण को सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़ता है। इसकी शुरुआत चमोली जिले के ग्वालदम क्षेत्र से हुई।

  • प्रणेता: कल्याण सिंह रावत।
  • अवधारणा: विवाह के अवसर पर वर-वधू द्वारा एक पौधा लगाया जाता है, जिसकी देखभाल मायके पक्ष (मैती बहनें) द्वारा की जाती है। “मैती” का अर्थ मायका होता है।
  • उद्देश्य: भावनात्मक जुड़ाव के माध्यम से वृक्षारोपण और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना। यह आंदोलन उत्तराखंड से बाहर भी लोकप्रिय हुआ है।

झपटो-छीनो आंदोलन (नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क क्षेत्र, 1998)

यह आंदोलन चमोली जिले के लाता गाँव और आसपास के क्षेत्रों में नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क के बनने के बाद स्थानीय लोगों के पारंपरिक वन अधिकारों (जैसे चारागाह, जड़ी-बूटी संग्रहण) पर लगे प्रतिबंधों के विरोध में हुआ था। 21 जून 1998 को ग्रामीणों ने पार्क क्षेत्र में प्रवेश कर अपने अधिकारों का दावा किया था।

निष्कर्ष (Conclusion)

उत्तराखंड के वन आंदोलनों ने यह सिद्ध किया है कि स्थानीय समुदाय पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं यदि उनके पारंपरिक अधिकारों का सम्मान किया जाए और उन्हें निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाए। इन आंदोलनों ने न केवल वनों को बचाया है बल्कि सतत विकास और पर्यावरण न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण मिसाल भी कायम की है।

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