उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्वपूर्ण स्थान है, और राज्य की विविध भौगोलिक तथा जलवायु परिस्थितियाँ विभिन्न प्रकार की फसलों के उत्पादन के लिए अनुकूल हैं। मैदानी क्षेत्रों से लेकर ऊँचे पर्वतीय ढलानों तक, उत्तराखंड में अनाज, दालें, तिलहन, फल, सब्जियाँ और नकदी फसलें उगाई जाती हैं। राज्य की कृषि मुख्यतः जीवनयापन प्रकृति की है, हालांकि वाणिज्यिक कृषि को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।
- उत्तराखंड की कृषि मुख्यतः वर्षा आधारित है, विशेषकर पर्वतीय क्षेत्रों में। राज्य के कुल कृषि योग्य भूमि का एक बड़ा हिस्सा असिंचित है।
- राज्य में सीढ़ीदार खेती (Terrace Farming) पर्वतीय ढलानों पर कृषि का प्रमुख तरीका है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘कंटूर फार्मिंग’ भी कहते हैं।
- प्रमुख खाद्यान्न फसलों में गेहूँ, चावल, मक्का, जौ और पारंपरिक मोटे अनाज जैसे मंडुआ (रागी), झंगोरा (साँवा) शामिल हैं।
- गन्ना तराई क्षेत्रों की प्रमुख नकदी फसल है और राज्य की कई चीनी मिलों का आधार है।
- राज्य में फलों (विशेषकर समशीतोष्ण फल) और सब्जियों (विशेषकर बेमौसमी) के उत्पादन की भी अपार संभावनाएँ हैं।
- कृषि विविधीकरण और जैविक खेती को राज्य सरकार द्वारा विशेष रूप से बढ़ावा दिया जा रहा है।
- राज्य के कुल प्रतिवेदित क्षेत्रफल का लगभग 12.5% भाग ही शुद्ध बोया गया क्षेत्र है, जिसमें से अधिकांश मैदानी क्षेत्रों (ऊधम सिंह नगर, हरिद्वार, देहरादून का मैदानी भाग, नैनीताल का तराई क्षेत्र) में केंद्रित है।
- पर्वतीय क्षेत्रों में स्थानांतरण कृषि (झूम खेती) का प्रचलन लगभग समाप्त हो चुका है।
खाद्यान्न फसलें (Food Grain Crops)
क. रबी की फसलें (Rabi Crops) – बुवाई: अक्टूबर-नवंबर, कटाई: मार्च-अप्रैल
- गेहूँ (Wheat):
- यह राज्य की प्रमुख रबी फसल है और कुल कृषि योग्य भूमि के लगभग 33% भाग पर उगाई जाती है।
- प्रमुख उत्पादक क्षेत्र: देहरादून (सर्वाधिक), ऊधम सिंह नगर, हरिद्वार, नैनीताल (मैदानी भाग), पौड़ी गढ़वाल। पर्वतीय क्षेत्रों में भी सीढ़ीदार खेतों पर पारंपरिक किस्मों का उत्पादन होता है।
- राज्य में सिंचित और असिंचित दोनों प्रकार के गेहूँ का उत्पादन होता है।
- जौ (Barley):
- यह भी एक महत्वपूर्ण रबी फसल है, विशेषकर ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में जहाँ सिंचाई की सुविधा कम होती है और जलवायु ठंडी होती है।
- इसका उपयोग अनाज और पशुओं के चारे के रूप में होता है। सत्तू बनाने में भी इसका प्रयोग होता है।
- चना (Gram) और मसूर (Lentil):
- ये प्रमुख रबी दलहन फसलें हैं, जो मैदानी और निचले पर्वतीय क्षेत्रों में उगाई जाती हैं। ये मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में भी सहायक हैं।
ख. खरीफ की फसलें (Kharif Crops) – बुवाई: जून-जुलाई, कटाई: सितंबर-अक्टूबर
- चावल/धान (Rice/Paddy):
- यह राज्य की प्रमुख खरीफ फसल है।
- प्रमुख उत्पादक क्षेत्र: ऊधम सिंह नगर (सर्वाधिक), देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल (तराई क्षेत्र)। पर्वतीय घाटियों (जैसे रामगंगा घाटी, कोसी घाटी) में भी इसकी खेती होती है।
- बासमती चावल देहरादून और ऊधम सिंह नगर में विशेष रूप से प्रसिद्ध है। पर्वतीय क्षेत्रों में लाल चावल भी उगाया जाता है।
- मंडुआ/रागी (Finger Millet):
- यह पर्वतीय क्षेत्रों की एक महत्वपूर्ण पारंपरिक खरीफ फसल है। यह कम वर्षा और कम उपजाऊ भूमि में भी सफलतापूर्वक उग सकता है।
- यह पोषक तत्वों (कैल्शियम, आयरन) से भरपूर होता है और स्थानीय आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इससे रोटी, दलिया, लड्डू आदि बनाए जाते हैं।
- उत्तराखंड मंडुआ उत्पादन में देश में अग्रणी राज्यों में से है। अल्मोड़ा जिला मंडुआ उत्पादन में प्रमुख है।
- झंगोरा/साँवा (Barnyard Millet):
- यह भी पर्वतीय क्षेत्रों की एक पारंपरिक खरीफ फसल है, जो सूखा प्रतिरोधी होती है।
- इसका उपयोग अनाज के रूप में और विशेष रूप से व्रत के भोजन (फलाहार) के रूप में होता है। इससे खीर, भात आदि बनाए जाते हैं।
- मक्का (Maize):
- यह पर्वतीय और मैदानी दोनों क्षेत्रों में उगाई जाती है। देहरादून, नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ प्रमुख उत्पादक जिले हैं।
- इसका उपयोग अनाज, भुट्टे और पशुओं के चारे के रूप में होता है।
- सोयाबीन (Soybean):
- यह एक महत्वपूर्ण तिलहन और दलहन फसल है, जिसका उत्पादन नैनीताल (सर्वाधिक) और ऊधम सिंह नगर जिलों में प्रमुखता से होता है।
- इससे तेल, बड़ी, दूध आदि बनाए जाते हैं।
- अन्य खरीफ दालें: उड़द, मूँग, अरहर, भट्ट (काला सोयाबीन), गहत (कुलथ) आदि। गहत पथरी के इलाज में उपयोगी मानी जाती है।
ग. जायद की फसलें (Zaid Crops) – बुवाई: मार्च-अप्रैल, कटाई: जून-जुलाई
इनमें मुख्यतः तरबूज, खरबूजा, खीरा, ककड़ी, लौकी, तोरई और कुछ अन्य शीघ्र पकने वाली सब्जियाँ शामिल हैं, जो सिंचित क्षेत्रों, विशेषकर नदी घाटियों और मैदानी भागों में उगाई जाती हैं।
नकदी फसलें (Cash Crops)
- गन्ना (Sugarcane):
- यह राज्य की सबसे महत्वपूर्ण नकदी फसल है।
- प्रमुख उत्पादक क्षेत्र: ऊधम सिंह नगर (सर्वाधिक), हरिद्वार, देहरादून (मैदानी भाग), नैनीताल (तराई क्षेत्र)।
- राज्य में कई चीनी मिलें (जैसे बाजपुर, किच्छा, नादेही, डोईवाला, इकबालपुर, लक्सर) स्थित हैं।
- आलू (Potato):
- यह पर्वतीय और मैदानी दोनों क्षेत्रों में उगाया जाता है।
- नैनीताल, अल्मोड़ा, देहरादून, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़, टिहरी के पर्वतीय क्षेत्र आलू उत्पादन के लिए जाने जाते हैं। पर्वतीय आलू (जैसे नैनीताल का पहाड़ी आलू) की गुणवत्ता अच्छी मानी जाती है।
- राज्य में आलू की खेती की शुरुआत का श्रेय मेजर यंग को (देहरादून, 1823) जाता है। हेनरी रैम्जे ने भी कुमाऊँ में आलू की खेती को प्रसारित किया।
- चाय (Tea):
- उत्तराखंड में चाय उत्पादन की अच्छी संभावनाएँ हैं। ब्रिटिश काल में चाय बागान स्थापित किए गए थे।
- प्रमुख क्षेत्र: कौसानी (बागेश्वर), चौकोड़ी (पिथौरागढ़), ग्वालदम (चमोली), नैनीताल, भीमताल, बेरीनाग के कुछ क्षेत्र।
- 1824 में बिशप हेबर ने कुमाऊँ में चाय की खेती का सुझाव दिया था। 1835 में अल्मोड़ा के लक्ष्मेश्वर और भीमताल में पहली खेप लगाई गई। डॉ. फॉल्कनर ने लक्ष्मेश्वर में बगीचा बनाया।
- पौड़ी में कैप्टन हडलस्टन ने गडोलिया में चाय बागान बनाया।
- तिलहन (Oilseeds): सरसों, तोरिया/लाही, सोयाबीन, मूँगफली, सूरजमुखी, अलसी आदि।
- मसाले (Spices): अदरक, हल्दी, मिर्च, धनिया, लहसुन, तेजपत्ता। उत्तराखंड तेजपत्ता को जीआई टैग प्राप्त है।
फल उत्पादन (Fruit Production)
उत्तराखंड की जलवायु विभिन्न प्रकार के समशीतोष्ण और उपोष्णकटिबंधीय फलों के उत्पादन के लिए उपयुक्त है।
- सेब (Apple):
- राज्य का एक प्रमुख फल। उत्तरकाशी (हर्षिल क्षेत्र), नैनीताल (रामगढ़, मुक्तेश्वर), अल्मोड़ा (जैसे चौबटिया), चमोली, पिथौरागढ़ जिलों में सेब के बागान हैं।
- चौबटिया (रानीखेत) में 1860 में सरकारी उद्यान की स्थापना के बाद सेब की खेती को बढ़ावा मिला। डब्ल्यू. क्रा इसके प्रथम सुपरिटेंडेंट थे।
- नाशपाती (Pear), आड़ू (Peach), खुबानी (Apricot), पुलम (Plum), चेरी (Cherry): ये प्रमुख समशीतोष्ण फल हैं जो पर्वतीय क्षेत्रों में उगाए जाते हैं।
- नींबू वर्गीय फल (Citrus Fruits): संतरा, माल्टा, नींबू, गलगल आदि निचले पर्वतीय और घाटी क्षेत्रों में उगाए जाते हैं।
- आम (Mango) और लीची (Litchi): देहरादून, ऊधम सिंह नगर और नैनीताल के मैदानी और घाटी क्षेत्रों में। देहरादून की लीची प्रसिद्ध है।
- अन्य फल: अखरोट, काफल (जंगली फल), हिसालू (जंगली बेरी), किवी, स्ट्रॉबेरी, अनार, अमरूद आदि।
- राज्य को “फ्रूट बाउल ऑफ इंडिया” बनाने का लक्ष्य रखा गया है। नॉर्मन गिल को कुमाऊँ में बागवानी विकास का स्वर्णयुग लाने का श्रेय जाता है।
सब्जी उत्पादन (Vegetable Production)
उत्तराखंड में मौसमी और बेमौसमी दोनों प्रकार की सब्जियों का उत्पादन होता है।
- प्रमुख सब्जियाँ: आलू, टमाटर, मटर, गोभी (पत्तागोभी, फूलगोभी), शिमला मिर्च, प्याज, लहसुन, गाजर, मूली, बैंगन, भिंडी, सेम, पालक, मेथी आदि।
- पर्वतीय क्षेत्रों में बेमौसमी सब्जियों (जैसे टमाटर, मटर, शिमला मिर्च) का उत्पादन किसानों की आय का अच्छा स्रोत है।
- जैविक सब्जी उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है।
अन्य महत्वपूर्ण फसलें एवं कृषि पद्धतियाँ
- औषधीय एवं सगंध पौधे (Medicinal and Aromatic Plants – MAPs): उत्तराखंड जैव विविधता से संपन्न है और यहाँ कई महत्वपूर्ण औषधीय पौधे (जैसे कुटकी, अतीस, जटामांसी, सर्पगंधा, तेजपत्ता, ब्राह्मी, गिलोय) और सगंध पौधे (जैसे लैवेंडर, जेरेनियम, कैमोमाइल, डेमस्क गुलाब, मिंट) पाए जाते हैं या उगाए जाते हैं। इनके संग्रहण और खेती को बढ़ावा देने के लिए जड़ी-बूटी शोध एवं विकास संस्थान (गोपेश्वर) और सगंध पौधा केंद्र (सेलाकुई) कार्यरत हैं।
- मशरूम उत्पादन: राज्य में मशरूम उत्पादन की अच्छी संभावनाएँ हैं, विशेषकर बटन मशरूम, ऑयस्टर मशरूम और शिटाके मशरूम।
- पुष्प उत्पादन (Floriculture): कट फ्लावर (जैसे गुलाब, जरबेरा, कारनेशन, लिलियम, ग्लेडियोलस) और अन्य सजावटी पौधों की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है।
- जैविक खेती (Organic Farming): उत्तराखंड को “जैविक प्रदेश” बनाने का लक्ष्य है। कई विकासखंडों को जैविक घोषित किया जा चुका है। जैविक कृषि अधिनियम 2019 भी पारित किया गया है।
- मिश्रित खेती (Mixed Farming) और समेकित कृषि प्रणाली (Integrated Farming System): आय बढ़ाने और जोखिम कम करने के लिए इन्हें प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिसमें कृषि के साथ पशुपालन, मत्स्य पालन, वानिकी आदि को जोड़ा जाता है।
- मृदा स्वास्थ्य: विभिन्न प्रकार की मृदाएँ पाई जाती हैं, जैसे पर्वतीय वनीय मिट्टी, लाल-पीली मिट्टी, भाबर मिट्टी, तराई मिट्टी। मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के माध्यम से मृदा परीक्षण और संतुलित उर्वरक प्रयोग को बढ़ावा।
निष्कर्ष
उत्तराखंड की कृषि अपनी विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों के कारण चुनौतियों और अवसरों दोनों से युक्त है। परंपरागत फसलों के साथ-साथ उच्च मूल्य वाली नकदी फसलों, फलों, सब्जियों और औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देकर तथा सिंचाई सुविधाओं का विस्तार एवं आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाकर राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था को और मजबूत किया जा सकता है। जैविक खेती और कृषि विविधीकरण इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं, जो न केवल किसानों की आय बढ़ाएंगे बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी सहायक होंगे।
Hi everyone, it’s my first go to see at this site, and article is really fruitful designed for me, keep up posting these content.
What’s up, after reading this amazing post i am as well
cheerful to share my familiarity here with friends.
I like what you guys are up too. Such clever work and reporting!
Keep up the very good works guys I’ve you guys to my blogroll.
Hey I know this is off topic but I was wondering if you knew of any widgets I could add to my blog that automatically tweet my newest twitter updates.
I’ve been looking for a plug-in like this for quite
some time and was hoping maybe you would have some
experience with something like this. Please let me know if you run into anything.
I truly enjoy reading your blog and I look forward
to your new updates.