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स्वतंत्रता संग्राम में उत्तराखंड की भूमिका (Role of Uttarakhand in the Freedom Struggle)

उत्तराखंड के निवासियों ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध हुए विभिन्न आंदोलनों, क्रांतिकारी गतिविधियों और जनजागरण अभियानों में यहाँ के वीर सपूतों और वीरांगनाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।

कुछ त्वरित तथ्य (Quick Facts):
  • 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में उत्तराखंड, विशेषकर कुमाऊँ क्षेत्र में, छिटपुट विद्रोह हुए, जिनका नेतृत्व कालू मेहरा जैसे स्थानीय नेताओं ने किया।
  • उत्तराखंड में राष्ट्रीय चेतना का विकास पत्रकारिता, शिक्षा और सामाजिक सुधार आंदोलनों के माध्यम से हुआ।
  • कुली बेगार प्रथा, वन आंदोलन और डोला-पालकी आंदोलन जैसे स्थानीय मुद्दों ने भी राष्ट्रीय आंदोलन को बल प्रदान किया।
  • गांधीजी के विभिन्न आंदोलनों (असहयोग, सविनय अवज्ञा, भारत छोड़ो) में उत्तराखंड की जनता ने सक्रिय भागीदारी की।

1857 का विद्रोह और उत्तराखंड

  • 1857 के विद्रोह का उत्तराखंड पर सीमित प्रभाव रहा, क्योंकि यह क्षेत्र सीधे तौर पर ब्रिटिश नियंत्रण में था और कमिश्नर हेनरी रैमजे ने कठोरता से किसी भी विद्रोह को दबा दिया।
  • हालांकि, कुमाऊँ क्षेत्र में कालू सिंह मेहरा (चम्पावत के बिसुंग गाँव निवासी) ने “क्रान्तिवीर” नामक गुप्त संगठन बनाकर अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का प्रयास किया। उन्हें उत्तराखंड का प्रथम स्वतंत्रता सेनानी माना जाता है।
  • रुड़की में भी कुछ सैनिक विद्रोह की घटनाएँ हुईं।
  • नैनीताल में विद्रोहियों को फांसी दी गई।

राष्ट्रीय चेतना का उदय और प्रारंभिक संगठन

  • 1870 में अल्मोड़ा में डिबेटिंग क्लब की स्थापना हुई, जो राजनीतिक चेतना का प्रारंभिक केंद्र बना।
  • 1871 में बुद्धिबल्लभ पंत के संपादन में “अल्मोड़ा अखबार” का प्रकाशन शुरू हुआ, जिसने जन-जागरूकता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • 1903 में पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने “हैप्पी क्लब” की स्थापना की।
  • 1905 में “गढ़वाल यूनियन” की स्थापना हुई, जिसके तत्वावधान में 1905 में पं. गिरिजा दत्त नैथानी ने “गढ़वाल समाचार” पत्र का प्रकाशन शुरू किया।
  • 1912 में अल्मोड़ा में कांग्रेस की स्थापना हुई।
  • 1913 में शुद्ध साहित्य समिति की स्थापना स्वामी सत्यदेव परिव्राजक ने की।
  • 1914 में मोहन जोशी, चिरंजीलाल, बद्रीदत्त पाण्डेय आदि ने “होमरूल लीग” की स्थापना अल्मोड़ा में की।
  • 1916 में कुमाऊँ परिषद् का गठन हुआ, जिसने कुली बेगार और वन समस्याओं जैसे मुद्दों को उठाया। इसके प्रमुख नेता गोविंद बल्लभ पंत, बद्री दत्त पाण्डेय, हरगोविंद पंत, लक्ष्मी दत्त शास्त्री आदि थे।

प्रमुख आंदोलन और घटनाएँ

1. कुली बेगार आंदोलन (1921)

  • यह ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा स्थानीय लोगों से बिना पारिश्रमिक के सामान ढुलवाने और अन्य सेवाएँ लेने की अन्यायपूर्ण प्रथा के विरुद्ध एक सफल आंदोलन था।
  • 13-14 जनवरी 1921 को बागेश्वर में सरयू नदी के तट पर उत्तरायणी मेले के अवसर पर बद्री दत्त पाण्डेय, हरगोविंद पंत और चिरंजीलाल के नेतृत्व में हजारों लोगों ने कुली बेगार न करने की शपथ ली और संबंधित रजिस्टरों को नदी में बहा दिया।
  • गांधीजी ने इसे “रक्तहीन क्रांति” कहा।

2. असहयोग आंदोलन (1920-22)

  • उत्तराखंड की जनता ने गांधीजी के आह्वान पर असहयोग आंदोलन में सक्रिय भाग लिया।
  • सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और नौकरियों का बहिष्कार किया गया, विदेशी वस्तुओं की होली जलाई गई।
  • बद्री दत्त पाण्डेय, मोहन सिंह मेहता, विक्टर मोहन जोशी जैसे नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

3. सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34)

  • नमक सत्याग्रह: उत्तराखंड में भी नमक कानून तोड़ा गया। नैनीताल, अल्मोड़ा, देहरादून में प्रदर्शन हुए। ज्योतिराम कांडपाल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • डांडी यात्रा: उत्तराखंड से ज्योतिराम कांडपाल, भैरव दत्त जोशी और खड़क बहादुर ने गांधीजी के साथ डांडी यात्रा में भाग लिया।
  • पेशावर कांड (23 अप्रैल 1930): वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में गढ़वाल राइफल्स के सैनिकों ने निहत्थे पठान स्वतंत्रता सेनानियों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया। यह घटना राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुई।
  • दुगड्डा (पौड़ी) में राजनीतिक सम्मेलन आयोजित हुए।

4. व्यक्तिगत सत्याग्रह (1940-41)

  • उत्तराखंड में प्रथम व्यक्तिगत सत्याग्रही जगमोहन सिंह नेगी थे।
  • महिलाओं ने भी इसमें सक्रिय भाग लिया, जैसे भागीरथी देवी, दुर्गा देवी।

5. भारत छोड़ो आंदोलन (1942)

  • उत्तराखंड में यह आंदोलन व्यापक रूप से फैला।
  • सल्ट (खुमाड़, अल्मोड़ा) की घटना (5 सितंबर 1942): यहाँ पुलिस फायरिंग में गंगाराम और खीमादेव नामक दो भाई शहीद हो गए। सल्ट को “कुमाऊँ का बारदोली” कहा जाता है।
  • देघाट (अल्मोड़ा) में भी गोलीकांड हुआ।
  • गरुड़, चनौदा (गांधी आश्रम), ताड़ीखेत आंदोलन के प्रमुख केंद्र रहे।
  • हेमवती नंदन बहुगुणा, श्रीदेव सुमन, बद्री दत्त पाण्डेय, अनुसूया प्रसाद बहुगुणा जैसे नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

6. टिहरी राज्य प्रजामंडल और श्रीदेव सुमन का बलिदान

  • टिहरी रियासत में राजशाही के विरुद्ध और उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिए टिहरी राज्य प्रजामंडल का गठन 1939 में देहरादून में हुआ।
  • श्रीदेव सुमन ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने 84 दिनों की ऐतिहासिक भूख हड़ताल के बाद 25 जुलाई 1944 को प्राण त्याग दिए।
  • उनके बलिदान ने टिहरी में जन आंदोलन को और तीव्र कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप अंततः 1 अगस्त 1949 को टिहरी रियासत का भारत में विलय हुआ।

7. आजाद हिन्द फौज में योगदान

  • उत्तराखंड के कई वीर सपूत नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिन्द फौज (INA) में शामिल हुए।
  • कर्नल पिथौरा शाही, मेजर देव सिंह दानू, कर्नल बुद्धि सिंह रावत, कर्नल चंद्र सिंह नेगी जैसे अधिकारियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • लगभग 2500 सैनिक (12% गढ़वाली) INA में थे, जिनमें से कई शहीद हुए।

स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भूमिका

  • उत्तराखंड की महिलाओं ने स्वतंत्रता संग्राम में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर भाग लिया।
  • बिश्नी देवी शाह: अल्मोड़ा नगरपालिका पर तिरंगा फहराने वाली स्वतंत्रता सेनानी, जेल जाने वाली उत्तराखंड की प्रथम महिला।
  • कुंती वर्मा, दुर्गा देवी, भागीरथी देवी, पद्मा जोशी, तुलसी देवी रावत, जीवंती देवी, मंगला देवी जैसी अनेक महिलाओं ने आंदोलनों में सक्रिय भाग लिया, जेल गईं और यातनाएँ सहीं।
  • “सरला बहन” (कैथरीन मेरी हेल्वमन) और “मीरा बहन” (मैडलिन स्लेड) जैसी गांधीजी की शिष्याओं ने भी उत्तराखंड में सामाजिक और स्वतंत्रता संबंधी कार्यों में योगदान दिया।

निष्कर्ष (Conclusion)

उत्तराखंड का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान अत्यंत गौरवपूर्ण रहा है। यहाँ के लोगों ने न केवल राष्ट्रीय स्तर के आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी की, बल्कि स्थानीय स्तर पर भी ब्रिटिश और सामंती शोषण के विरुद्ध संघर्ष किया। वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का पेशावर कांड, श्रीदेव सुमन का बलिदान और सल्ट की घटना जैसे अध्याय भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित हैं।

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