आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी: एक परिचय
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदी साहित्य के आधुनिक काल के एक प्रमुख निबंधकार, उपन्यासकार, आलोचक और प्रसिद्ध इतिहासकार थे। उनका जन्म 19 अगस्त 1907 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के आरत दुबे का छपरा नामक गाँव में हुआ था। वे संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और हिंदी के प्रकांड विद्वान थे।
द्विवेदी जी का व्यक्तित्व भारतीय संस्कृति और मानवतावाद का अनूठा संगम था। उन्होंने शांतिनिकेतन में रवींद्रनाथ टैगोर के सानिध्य में रहकर अपनी साहित्यिक दृष्टि को व्यापक बनाया। उनका निधन 19 मई 1979 को हुआ।
प्रमुख साहित्यिक विधाएँ और रचनाएँ
महत्वपूर्ण उपन्यास
द्विवेदी जी ने ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित कालजयी उपन्यासों की रचना की है:
- बाणभट्ट की आत्मकथा (1946): यह इनका सबसे प्रसिद्ध उपन्यास है।
- चारु चंद्रलेख (1963)
- पुनर्नवा (1973)
- अनामदास का पोथा (1976): यह उपनिषदिक युग की पृष्ठभूमि पर आधारित है।
निबंध संग्रह
द्विवेदी जी के निबंधों में पांडित्य और मनोरंजन का अद्भुत मिश्रण मिलता है:
- अशोक के फूल (1948)
- कल्पलता (1951)
- कुटज
- विचार और वितर्क
- आलोक पर्व (1972)
- कल्पतरु
आलोचना और इतिहास ग्रंथ
उन्होंने हिंदी साहित्य के इतिहास को एक नई दृष्टि प्रदान की और भक्ति आंदोलन को भारतीय परंपरा का स्वाभाविक विकास माना।
प्रमुख आलोचनात्मक कृतियाँ:
- सूर-साहित्य (1936)
- हिंदी साहित्य की भूमिका (1940)
- कबीर (1942): इस ग्रंथ के माध्यम से उन्होंने कबीर को साहित्य में पुनः प्रतिष्ठित किया।
- हिंदी साहित्य का आदिकाल (1952)
- कालिदास की लालित्य योजना
- हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास
साहित्यिक विशेषताएँ एवं विचारधारा
1. मानवतावादी दृष्टिकोण
द्विवेदी जी का मानना था कि “मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है।” वे साहित्य को केवल कला नहीं बल्कि मानव कल्याण का साधन मानते थे।
2. सांस्कृतिक अन्वेषण
उन्होंने भारतीय संस्कृति के मूल तत्वों को खोजा और जड़ परंपराओं का विरोध करते हुए प्रगतिशील विचारों का समर्थन किया।
3. भाषा शैली
उनकी भाषा तत्सम प्रधान संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी सरल और बोधगम्य है। उन्होंने विचारात्मक, गवेषणात्मक और व्यंग्यात्मक शैलियों का प्रयोग किया है।
पुरस्कार और सम्मान
हजारी प्रसाद द्विवेदी को उनके साहित्यिक योगदान के लिए अनेक महत्वपूर्ण सम्मानों से अलंकृत किया गया:
- पद्म भूषण: भारत सरकार द्वारा 1957 में प्रदान किया गया।
- साहित्य अकादमी पुरस्कार: 1973 में उनके निबंध संग्रह “आलोक पर्व” के लिए प्रदान किया गया।
- डी.लिट.: लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा मानद उपाधि।
- टैगोर पदक: साहित्य अकादमी द्वारा प्रदान किया गया।
महत्वपूर्ण तथ्य (परीक्षा उपयोगी)
- द्विवेदी जी ने “हिंदी साहित्य के आदिकाल” को “अत्यधिक व्याघातों और विरोधों का युग” कहा है।
- इन्होंने कबीर को “वाणी का डिक्टेटर” कहा था।
- वे नागरी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष भी रहे।
- उन्होंने विश्व भारती (शांतिनिकेतन) पत्रिका का संपादन किया।
- द्विवेदी जी को ललित निबंध विधा का प्रवर्तक माना जाता है।