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देवनागरी लिपि: इसका विकास, गुण-दोष और इसमें सुधार के प्रयास।

देवनागरी लिपि: एक ऐतिहासिक एवं विश्लेषणात्मक परिचय

देवनागरी लिपि विश्व की सबसे वैज्ञानिक और सुव्यवस्थित लिपियों में से एक मानी जाती है। यह भारतीय उपमहाद्वीप की अनेक भाषाओं जैसे हिंदी, संस्कृत, मराठी, नेपाली, कोंकणी और भोजपुरी की मुख्य लिपि है। देवनागरी का उद्भव और विकास भारत की प्राचीनतम लिपि ब्राह्मी लिपि से हुआ है। यह एक अक्षरात्मक (Syllabic) लिपि है, जिसमें स्वर और व्यंजन का वैज्ञानिक संयोजन पाया जाता है।

देवनागरी लिपि का ऐतिहासिक विकास

देवनागरी का विकास यात्रा अचानक नहीं हुई, बल्कि यह सदियों के क्रमिक परिवर्तन का परिणाम है। ब्राह्मी से देवनागरी तक के सफर को निम्नलिखित चरणों में विभाजित किया जा सकता है:

1. ब्राह्मी लिपि (प्राचीन काल)

भारत की अधिकांश लिपियों की जननी ब्राह्मी लिपि है। सम्राट अशोक के शिलालेखों में इसके प्रमाण मिलते हैं। ईसा पूर्व 5वीं सदी से लेकर ईसा की तीसरी सदी तक ब्राह्मी का वर्चस्व रहा।

2. गुप्त लिपि (4थी – 5वीं शताब्दी)

गुप्त साम्राज्य के दौरान ब्राह्मी लिपि के स्वरूप में परिवर्तन आया, जिसे गुप्त लिपि कहा गया। इसके अक्षरों के शीर्ष भाग में छोटे त्रिकोण या रेखाएं बनने लगी थीं।

3. कुटिल लिपि (6ठी – 9वीं शताब्दी)

इसे सिद्धमात्रिका लिपि भी कहा जाता है। इसमें अक्षरों के आकार अधिक वक्र (Curvy) हो गए, जिसके कारण इसे ‘कुटिल’ नाम दिया गया। इसी से आगे चलकर उत्तर भारत में ‘नागरी’ और ‘शारदा’ लिपियों का विकास हुआ।

4. प्राचीन नागरी लिपि (8वीं – 10वीं शताब्दी)

8वीं शताब्दी के आसपास उत्तर भारत में नागरी लिपि का प्रयोग प्रारंभ हुआ। दक्षिण भारत में इसे ‘नंदिनागरी’ कहा जाता था। 10वीं शताब्दी के बाद से यह लिपि परिपक्व होने लगी और वर्तमान देवनागरी के स्वरूप के निकट पहुँच गई।

नामकरण के विभिन्न मत:
  • देवनगर सिद्धांत: कुछ विद्वानों का मानना है कि गुजरात के नागर ब्राह्मणों द्वारा प्रयुक्त होने के कारण इसे ‘नागरी’ कहा गया।
  • तांत्रिक मत: तांत्रिक चिह्नों को ‘देवनगर’ कहा जाता था और उनके समान स्वरूप के कारण इसे ‘देवनागरी’ नाम मिला।
  • काशी सिद्धांत: काशी को ‘देवनगर’ कहा जाता था और वहाँ इस लिपि के विशेष प्रचार के कारण यह ‘देवनागरी’ कहलाई।

देवनागरी लिपि के वैज्ञानिक गुण (Merits)

देवनागरी अपनी संरचनात्मक विशिष्टता के कारण संसार की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि मानी जाती है। इसके मुख्य गुण इस प्रकार हैं:

1. ध्वन्यात्मकता (Phonetic System)

देवनागरी में जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखा जाता है। रोमन लिपि की तरह इसमें ‘Silent Letters’ (जैसे ‘Knife’ में ‘k’) की समस्या नहीं होती। प्रत्येक ध्वनि के लिए एक निश्चित चिह्न निर्धारित है।

2. वर्णमाला का वैज्ञानिक वर्गीकरण

इसकी वर्णमाला उच्चारण स्थान (Articulation) के आधार पर व्यवस्थित है:

  • कंठ्य (Guttural): क, ख, ग, घ, ङ
  • तालव्य (Palatal): च, छ, ज, झ, ञ
  • मूर्धन्य (Cerebral): ट, ठ, ड, ढ, ण
  • दंत्य (Dental): त, थ, द, ध, न
  • ओष्ठ्य (Labial): प, फ, ब, भ, म

3. अक्षरात्मकता (Syllabic Nature)

यह लिपि वर्णानुक्रम की तुलना में अक्षरात्मक है, जिससे हस्तलेखन में प्रवाह बना रहता है और कम स्थान में अधिक सामग्री लिखी जा सकती है।

4. स्वरों की मात्रा व्यवस्था

व्यंजनों के साथ स्वरों का संयोग ‘मात्राओं’ के माध्यम से होता है, जो इसे अत्यंत संक्षिप्त और स्पष्ट बनाता है।

5. अनुनासिकता का अंकन

चंद्रबिंदु और अनुस्वार के माध्यम से नासिक्य ध्वनियों का जितना स्पष्ट अंकन देवनागरी में है, उतना अन्य किसी लिपि में नहीं मिलता।

देवनागरी लिपि के दोष (Demerits)

अत्यधिक वैज्ञानिक होने के बावजूद, व्यावहारिक धरातल और तकनीकी प्रयोग में देवनागरी के कुछ दोष भी सामने आए हैं:

1. शिरोरेखा की समस्या

प्रत्येक शब्द के ऊपर शिरोरेखा (Horizontal Line) खींचने से लिखने की गति धीमी हो जाती है। यह मुद्रण (Printing) के समय भी अतिरिक्त श्रम और स्थान की मांग करती है।

2. द्विरूप वर्ण (Variant Shapes)

कुछ वर्णों के दो-दो रूप प्रचलित रहे हैं, जिससे भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। उदाहरण के लिए: ‘अ’, ‘झ’, ‘ण’, और ‘ध’ के पुराने और नए स्वरूपों में भिन्नता।

3. संयुक्त वर्णों की जटिलता

देवनागरी में क्ष, त्र, ज्ञ, श्र जैसे संयुक्त वर्णों और ‘र’ के विभिन्न रूपों (प्र, र्ग, ट्र) को सीखना और टाइप करना चुनौतीपूर्ण होता है।

4. इ-कार की मात्रा का नियम

छोटी ‘इ’ की मात्रा व्यंजन से पहले लगाई जाती है जबकि बोली बाद में जाती है। यह इसके ध्वन्यात्मक स्वरूप के विरुद्ध है और कम्प्यूटरीकरण में कोडिंग संबंधी जटिलता पैदा करती है।

5. समरूप वर्ण

कुछ वर्ण देखने में इतने समान हैं कि शीघ्रता में पढ़ने पर भ्रम हो सकता है, जैसे: ख (र-व जैसा), घ-ध, म-भ।

देवनागरी लिपि में सुधार के प्रयास (Reform Efforts)

मुद्रण, टंकण (Typing) और वर्तमान समय में सूचना प्रौद्योगिकी की आवश्यकताओं को देखते हुए देवनागरी में सुधार के कई महत्वपूर्ण प्रयास किए गए हैं:

1. बाल गंगाधर तिलक का प्रयास (1904-1926)

लोकमान्य तिलक ने ‘केसरी’ पत्र के लिए तिलक फॉन्ट तैयार किया, जिसमें टाइप की संख्या घटाने का प्रयास किया गया। उन्होंने 190 वर्णों के टाइप सेट को 1926 में प्रस्तुत किया।

2. सावरकर बंधुओं का योगदान

वीर सावरकर ने ‘अ’ की बाराखड़ी का सुझाव दिया, ताकि मात्राओं के लिए अलग-अलग स्वर चिह्नों की आवश्यकता न रहे (जैसे इ के स्थान पर अि, उ के स्थान पर अु)।

3. डॉ. गोरख प्रसाद का सुझाव

इन्होंने सुझाव दिया कि मात्राओं को व्यंजन के बाद ही लगाया जाना चाहिए, ताकि वर्णों का क्रम लिखने और बोलने में समान रहे।

4. आचार्य नरेंद्र देव समिति (1947)

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित इस समिति ने महत्वपूर्ण सुझाव दिए:

  • ‘ख’ का स्वरूप सुधारा जाए ताकि वह ‘रव’ न लगे।
  • अनुस्वार और पंचमाक्षर (ङ, ञ, ण, न, म) के स्थान पर बिंदु का प्रयोग बढ़े।
  • शिरोरेखा का प्रयोग बना रहे लेकिन टाइपिंग में इसे हटाया जा सकता है।
5. लखनऊ सम्मेलन (1953)

विभिन्न राज्यों के मंत्रियों और विद्वानों की बैठक में मानकीकरण पर बल दिया गया। इसमें ‘अ’ की बाराखड़ी को अस्वीकार कर दिया गया लेकिन वर्णों के मानक स्वरूप तय किए गए।

6. केंद्रीय हिंदी निदेशालय का मानकीकरण (1966)

शिक्षा मंत्रालय के तहत निदेशालय ने ‘मानक देवनागरी वर्णमाला’ प्रकाशित की। इसमें संयुक्त वर्णों को लिखने का मानक तरीका, ‘क’ और ‘फ’ के नुक्ते वाले रूप, और अंतरराष्ट्रीय अंकों (1, 2, 3…) के प्रयोग की संस्तुति की गई।

सूचना प्रौद्योगिकी और देवनागरी

आधुनिक युग में कंप्यूटर पर देवनागरी के प्रयोग को सरल बनाने के लिए निम्नलिखित तकनीकें विकसित की गई हैं:

यूनिकोड (Unicode) का प्रभाव

यूनिकोड के आने से देवनागरी के वर्णों को वैश्विक डिजिटल पहचान मिली। इससे पहले अलग-अलग फोंट (जैसे कृतिदेव, चाणक्य) के कारण डेटा शेयरिंग में समस्या होती थी। यूनिकोड ने लिपि की मानक संरचना को डिजिटल रूप में सुरक्षित कर दिया है।

इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड (Inscript Keyboard)

भारत सरकार द्वारा स्वीकृत यह की-बोर्ड लेआउट पूर्णतः वैज्ञानिक है। इसमें बाईं ओर स्वर और दाईं ओर व्यंजनों को रखा गया है, जो टाइपिंग की गति और सटीकता को बढ़ाता है।

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