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Dialects of Uttarakhand

उत्तराखंड की भाषाई संरचना: एक वृहद अवलोकन

उत्तराखंड राज्य की भाषाई पहचान मुख्य रूप से मध्य पहाड़ी हिंदी के अंतर्गत आती है। ऐतिहासिक और भौगोलिक विविधताओं के कारण यहाँ की बोलियों का विकास विशिष्ट सांस्कृतिक परिवेश में हुआ है। उत्तराखंड की बोलियों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता है: कुमाऊँनी, गढ़वाली और जौनसारी। ये बोलियाँ न केवल संवाद का माध्यम हैं, बल्कि इस हिमालयी क्षेत्र की लोक गाथाओं, रीति-रिवाजों और सामाजिक ताने-बाने की संवाहक भी हैं।

कुमाऊँनी बोली: उद्भव और वर्गीकरण

कुमाऊँनी बोली का विकास शौरसेनी अपभ्रंश से माना जाता है, जिस पर ‘खस’ जाति की भाषा का गहरा प्रभाव है। यह मुख्य रूप से कुमाऊँ मंडल के 06 जनपदों में बोली जाती है। ग्रियर्सन और अन्य भाषाविदों ने इसे भौगोलिक आधार पर चार मुख्य वर्गों और कई उप-बोलियों में विभाजित किया है।

1. मध्य कुमाऊँनी (Central Kumaoni)

इसे कुमाऊँनी का मानक रूप माना जाता है, जो अल्मोड़ा के आसपास के क्षेत्रों में प्रचलित है।

  • खसपर्जिया: यह अल्मोड़ा के बारहमंडल परगने की प्रमुख बोली है।
  • फाल्दाकोटी: यह अल्मोड़ा के दक्षिणी भाग और फाल्दाकोट क्षेत्र में बोली जाती है।

2. पूर्वी कुमाऊँनी (Eastern Kumaoni)

यह नेपाल सीमा से सटे क्षेत्रों और पिथौरागढ़ जनपद के विभिन्न हिस्सों में बोली जाती है।

  • कुमैय्या: यह चम्पावत के काली कुमाऊँ क्षेत्र की बोली है।
  • सोर्याली: पिथौरागढ़ के ‘सोर’ घाटी क्षेत्र में बोली जाने वाली प्रमुख बोली।
  • सीराली: पिथौरागढ़ के ‘सीरा’ क्षेत्र (डीडीहाट के आसपास) में प्रचलित।
  • अस्कोटी: यह पिथौरागढ़ के अस्कोट क्षेत्र की विशिष्ट बोली है।

3. पश्चिमी कुमाऊँनी (Western Kumaoni)

इसमें गढ़वाल सीमा के समीपवर्ती क्षेत्रों की बोलियाँ सम्मिलित हैं।

  • पछाईं: यह अल्मोड़ा के पश्चिमी भाग (रानीखेत, भिकियासैंण) में बोली जाती है।
  • चौगर्ख्या: अल्मोड़ा के चौगर्खा क्षेत्र की बोली।
  • गंगोली: पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट क्षेत्र की बोली।
  • दानपुरिया: बागेश्वर के दानपुर परगने में बोली जाने वाली बोली।

4. उत्तरी कुमाऊँनी (Northern Kumaoni)

  • जोहारी: यह पिथौरागढ़ के भोटिया जनजाति बाहुल्य जोहार क्षेत्र में प्रचलित है।

गढ़वाली बोली: भाषाई संरचना और क्षेत्रीय विस्तार

गढ़वाली बोली का विकास भी शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है। गढ़वाल क्षेत्र की भौगोलिक विषमता के कारण इसकी बोलियों में अल्प दूरी पर ही परिवर्तन देखने को मिलता है। डॉ. ग्रियर्सन ने गढ़वाली को 08 मुख्य बोलियों में विभाजित किया है।

श्रीनगरिया: मानक गढ़वाली

इसे गढ़वाली की परिनिष्ठित या मानक बोली माना जाता है। यह श्रीनगर (पौड़ी) और उसके आसपास के क्षेत्रों में बोली जाती है। राज्य का अधिकांश गढ़वाली साहित्य इसी बोली में रचा गया है।

गढ़वाली की प्रमुख क्षेत्रीय बोलियाँ
  • सलानी: पौड़ी गढ़वाल के तटीय और दक्षिण-पूर्वी भाग (कोटद्वार के आसपास) में बोली जाती है।
  • नागपुरिया: यह चमोली जनपद के नागपुर परगने और रुद्रप्रयाग के कुछ भागों में प्रचलित है।
  • दशौल्या: चमोली के दशोली ब्लॉक के आसपास की बोली।
  • बधाणी: चमोली के बधाण क्षेत्र और पिंडर घाटी के आसपास बोली जाती है, जिसमें कुमाऊँनी का प्रभाव स्पष्ट दिखता है।
  • राठी: पौड़ी के राठ क्षेत्र (थलीसैंण, बीरोंखाल) में बोली जाने वाली बोली।
  • टहरीयाली: टिहरी गढ़वाल के मध्य भाग में प्रचलित बोली।
  • माझ-कुमैय्या: अल्मोड़ा और गढ़वाल की सीमा पर स्थित क्षेत्रों में बोली जाती है, जो कुमाऊँनी और गढ़वाली का मिश्रण है।
सीमावर्ती और मिश्रित बोलियाँ
  • जाढ़ी: उत्तरकाशी के जाँध क्षेत्र में निवास करने वाली ‘जाड़’ जनजाति द्वारा बोली जाती है। इसमें तिब्बती भाषा का मिश्रण पाया जाता है।
  • मारछी: चमोली के सीमावर्ती क्षेत्रों में मारछा लोगों द्वारा बोली जाती है।

जौनसारी बोली: एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान

जौनसारी बोली उत्तराखंड के देहरादून जनपद के पश्चिमी भाग, जिसे जौनसार-बावर क्षेत्र कहा जाता है, में बोली जाती है। यह बोली गढ़वाली और हिमाचल की सिरमौर बोलियों के मध्य की एक कड़ी के रूप में देखी जाती है।

क्षेत्र और सीमाएँ

जौनसारी का मुख्य क्षेत्र चकराता, कालसी और त्यूणी तहसीलें हैं। इसके उत्तर में उत्तरकाशी की ‘रंवाई’ बोली, दक्षिण में विकासनगर, पूर्व में गढ़वाली और पश्चिम में हिमाचल की पहाड़ी बोलियाँ स्थित हैं।

जौनसारी की विशेषताएं
  • यह बोली संस्कृतनिष्ठ और प्राचीन पहाड़ी शब्दों को अपने मूल रूप में संजोए हुए है।
  • जौनसारी में सर्वनामों और क्रियाओं का प्रयोग गढ़वाली और कुमाऊँनी से भिन्न होता है।
  • स्थानीय स्तर पर इसे भामरी या पछाई के नामों से भी जाना जाता है (क्षेत्र विशेष के अनुसार)।
  • जौनसारी लोकगीत (जैसे हारुल, मांगल) इस बोली की समृद्धि का प्रमाण हैं।

बोलियों का तुलनात्मक विश्लेषण

ध्वन्यात्मक अंतर

कुमाऊँनी में ‘ण’ और ‘ल’ ध्वनियों का बाहुल्य है, जबकि गढ़वाली में ‘ळ’ (मूर्धन्य पाश्विक) ध्वनि का प्रयोग विशेष रूप से पाया जाता है। जौनसारी में घोष ध्वनियों की प्रधानता रहती है।

वर्तमान स्थिति

इन सभी बोलियों को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग लंबे समय से की जा रही है। वर्तमान में ‘कुमाऊँनी’ और ‘गढ़वाली’ को यूनेस्को ने ‘असुरक्षित’ (Unsafe) भाषाओं की श्रेणी में रखा है, जो इनके संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

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